Sarso Ki Kheti 2026: नवंबर का महीना शुरू होते ही उत्तर भारत के खेतों में रबी फसलों की बुवाई तेज हो जाती है। इस दौरान किसान गेहूं, चना, मटर और सरसों जैसी फसलों की खेती की तैयारी करते हैं। खासकर सरसों की खेती किसानों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण साधन है। इसकी वजह यह है कि सरसों से खाद्य तेल प्राप्त होता है, जबकि इसकी खली पशु आहार और अन्य कृषि कार्यों में इस्तेमाल की जाती है। यही कारण है कि राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब के कई इलाकों में किसान सरसों को प्रमुख नकदी फसल के रूप में उगाते हैं। हालांकि sarso ki kheti की अच्छी पैदावार हासिल करना केवल बीज बोने तक सीमित नहीं है। कई बार किसान उन्नत किस्मों की बुवाई करने के बाद भी उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं ले पाते। इसके पीछे बुवाई का गलत समय, खेत में नमी की कमी, पोषक तत्वों का असंतुलन और स्थानीय मौसम के अनुकूल किस्म नहीं चुनना जैसे कारण हो सकते हैं।
रबी सीजन 2026-27 में सरसों की खेती की योजना बना रहे किसानों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे अपने क्षेत्र की मिट्टी, सिंचाई की सुविधा और बुवाई के समय को ध्यान में रखकर बीज का चुनाव करें। कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसी कई किस्में विकसित की हैं जो उपयुक्त परिस्थितियों में अच्छा उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं। इनमें गिरिराज, RH-749, BPM 1825, BPM (Q) 172, BPM 11 और राधिका जैसी किस्में शामिल हैं।
sarso ki kheti में सही किस्म का चुनाव क्यों जरूरी?
किसान जब बाजार से सरसों का बीज खरीदने जाते हैं, तो अक्सर अधिक पैदावार देने वाली किस्म की तलाश करते हैं। लेकिन खेती में एक ही किस्म हर जगह समान परिणाम नहीं देती। उदाहरण के लिए, जिस किस्म से सिंचित क्षेत्रों में अच्छा उत्पादन मिलता है, जरूरी नहीं कि वह कम वर्षा वाले खेतों में भी उतनी ही पैदावार दे। इसी तरह कुछ किस्मों को सामान्य बुवाई के लिए विकसित किया गया है, जबकि कुछ किस्में देर से बुवाई वाली परिस्थितियों में बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं। सरसों की नई किस्मों के विकास में अब उत्पादन के साथ तेल की मात्रा, गुणवत्ता और रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को भी महत्व दिया जा रहा है। इसलिए किसानों के लिए जरूरी है कि वे केवल बीज की संभावित पैदावार न देखें, बल्कि यह भी समझें कि किस किस्म को किस क्षेत्र के लिए अनुशंसित किया गया है।
सरसों की 7 उन्नत किस्में, जिनके बारे में किसानों को जानना चाहिए
1. गिरिराज सरसों: अच्छी पैदावार और तेल की मात्रा के लिए पहचान
sarso ki kheti की उन्नत किस्मों में गिरिराज (DRMRIJ-31) का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत विकसित किया गया है। यह अपने बड़े दानों और अच्छी तेल मात्रा के लिए जानी जाती है। अनुसंधान परीक्षणों में गिरिराज की औसत उत्पादन क्षमता लगभग 22 से 27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के बीच दर्ज की गई है। इसमें तेल की मात्रा करीब 39 से 42 प्रतिशत तक पाई गई है। इस किस्म को पकने में सामान्यतः 137 से 153 दिन लग सकते हैं। हालांकि, फसल तैयार होने की अवधि मौसम और खेती की परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है। जिन किसानों के पास समय पर बुवाई और सिंचाई की सुविधा है, वे अपने जिले की कृषि सिफारिशों के अनुसार इस किस्म पर विचार कर सकते हैं।
2. BPM 1825: रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण महत्वपूर्ण किस्म
Sarso ki kheti में कई बार सफेद रतुआ जैसी बीमारियां फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। ऐसी स्थिति में रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्मों का चुनाव किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है। BPM 1825, जिसे DRMR 2018-25 के नाम से भी जाना जाता है, ऐसी ही एक उन्नत किस्म है। संस्थागत परीक्षणों में इसकी औसत उपज लगभग 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इस किस्म की महत्वपूर्ण विशेषता White Rust के प्रति प्रतिरोधक क्षमता है। इसे समय पर बुवाई और सिंचित खेती की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त बताया गया है। हालांकि, रोग प्रतिरोधक होने का अर्थ यह नहीं कि फसल में कभी बीमारी नहीं आएगी। किसानों को खेत की नियमित निगरानी करते रहना चाहिए।
3. RH-749: बेहतर कृषि प्रबंधन के साथ अच्छी उपज की संभावना
RH-749 सरसों की एक उन्नत किस्म है, जिसे उत्तर भारत की कुछ कृषि परिस्थितियों के लिए अनुशंसित किया गया है। यह किस्म विशेष रूप से उन किसानों के लिए विचार करने योग्य है, जो समय पर बुवाई करते हैं और फसल को जरूरत के अनुसार सिंचाई उपलब्ध करा सकते हैं। इस किस्म की खेती से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से यह जरूर पता करें कि आपके जिले में इसकी अनुशंसा है या नहीं। इसके अलावा किसानों को प्रमाणित बीज खरीदने पर ध्यान देना चाहिए। बिना पहचान वाला बीज कम कीमत पर मिल सकता है, लेकिन उसमें अंकुरण और किस्म की शुद्धता की समस्या होने का जोखिम रहता है।
4. BPM (Q) 172: उत्पादन के साथ तेल की गुणवत्ता पर जोर
आज खेती में केवल अधिक उत्पादन हासिल करना ही लक्ष्य नहीं रह गया है। खाद्य तेल की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण हो गई है। BPM (Q) 172 इसी दिशा में विकसित सरसों की उन्नत किस्म है। अनुसंधान विवरणों के अनुसार इसकी औसत उपज लगभग 23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इस किस्म में तेल की मात्रा करीब 41.8 प्रतिशत बताई गई है। इसमें कम Erucic Acid जैसे गुणवत्ता संबंधी गुण भी पाए गए हैं। यह किस्म लगभग 131 दिनों में पक सकती है। समय पर बुवाई वाली सिंचित परिस्थितियों में इसकी खेती के लिए राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार के कुछ क्षेत्रों की अनुशंसा की गई है। किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि बेहतर तेल गुणवत्ता वाली किस्मों का बाजार मूल्य स्थानीय खरीद व्यवस्था और गुणवत्ता आधारित खरीद पर निर्भर करता है।
5. BPM 11: धान की कटाई के बाद सरसों बोने वाले किसानों के लिए विकल्प
उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में किसान पहले धान की खेती करते हैं। धान की कटाई के बाद खेत तैयार करने में समय लगने से सरसों की बुवाई देर से हो सकती है। ऐसे किसानों के लिए देर से बुवाई के अनुकूल किस्मों का महत्व बढ़ जाता है। BPM 11 को इसी प्रकार की परिस्थितियों के लिए विकसित किया गया है। इसकी औसत बीज उपज लगभग 18.59 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इसमें तेल की मात्रा करीब 37.8 प्रतिशत और पकने की अवधि लगभग 123 दिन बताई गई है। इस किस्म की खासियत यह है कि इसे देर से बुवाई वाली परिस्थितियों के लिए अनुशंसित किया गया है। हालांकि, बहुत अधिक देरी होने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
6. DRMR 1165-40: सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी
भारत में सरसों की खेती का एक बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्रों में होता है, जहां किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। ऐसी परिस्थितियों में वर्षा आधारित खेती के लिए विकसित किस्मों का चुनाव महत्वपूर्ण हो जाता है। DRMR 1165-40 ऐसी किस्मों में शामिल है, जिसे वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए विकसित किया गया है। अनुसंधान परीक्षणों में इसकी औसत उत्पादन क्षमता लगभग 22 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इसमें तेल की मात्रा करीब 41 प्रतिशत बताई गई है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सूखा सहन करने की क्षमता होने का मतलब यह नहीं है कि फसल बिना नमी के भी सामान्य उत्पादन देगी। अच्छे अंकुरण और फसल विकास के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी आवश्यक है।
7. राधिका: देर से बुवाई की स्थिति में किसानों के लिए विकल्प
राधिका (DRMR 2017-15) सरसों की एक और महत्वपूर्ण किस्म है। इसे देर से बुवाई वाली सिंचित परिस्थितियों के लिए विकसित किया गया है। इसकी औसत बीज उपज लगभग 16.86 से 18.47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के बीच दर्ज की गई है। इसमें तेल की मात्रा करीब 40.7 प्रतिशत और पकने की अवधि लगभग 131 दिन बताई गई है। इस किस्म के बारे में किसान विशेष रूप से तब जानकारी ले सकते हैं, जब सामान्य बुवाई का समय निकल चुका हो। लेकिन देर से बुवाई वाली किस्म का चुनाव करते समय स्थानीय तापमान और मौसम को ध्यान में रखना जरूरी है।
नवंबर में सरसों की बुवाई कर रहे हैं तो इन बातों का रखें ध्यान
नवंबर में सरसों की बुवाई करने वाले किसानों के लिए मौसम और किस्म का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होता है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में सरसों की सामान्य बुवाई अक्टूबर के दौरान की जाती है। लेकिन धान की कटाई में देरी या खेत की तैयारी पूरी नहीं होने के कारण कई किसान नवंबर में भी सरसों बोते हैं। देर से बुवाई के दौरान फसल की शुरुआती वृद्धि पर तापमान का प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही आगे चलकर फूल और फलियां बनने की अवस्था के दौरान अधिक तापमान मिलने से उपज प्रभावित होने की संभावना रहती है। इसलिए किसानों को बुवाई में अनावश्यक देरी से बचना चाहिए। जहां सामान्य बुवाई का समय निकल चुका है, वहां स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेकर देर से बुवाई के लिए अनुशंसित किस्म चुनना बेहतर रहता है।
खेत की तैयारी कैसे करें ताकि सरसों का जमाव अच्छा हो?
सरसों का बीज आकार में छोटा होता है। इसलिए खेत की तैयारी ऐसी होनी चाहिए कि बीज मिट्टी के संपर्क में अच्छी तरह आ सके। सबसे पहले खेत से पिछली फसल के अनावश्यक अवशेष और बड़े ढेले हटाने चाहिए। इसके बाद जरूरत के अनुसार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाया जा सकता है। यदि खेत में पर्याप्त नमी नहीं है, तो उपयुक्त परिस्थितियों में बुवाई से पहले सिंचाई की जा सकती है। खेत में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। सरसों की जड़ें लंबे समय तक जलभराव रहने पर प्रभावित हो सकती हैं। किसानों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बार-बार गहरी जुताई करने से लागत बढ़ती है और मिट्टी की संरचना प्रभावित हो सकती है। इसलिए खेत की स्थिति के अनुसार न्यूनतम आवश्यक जुताई करना बेहतर है।
sarso ki kheti में कितना बीज डालना चाहिए?
अच्छे उत्पादन के लिए खेत में पौधों की संख्या संतुलित होना जरूरी है। सामान्य कतार वाली खेती में सरसों के लिए लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की मात्रा उपयोग की जा सकती है। हालांकि, यह मात्रा बीज के आकार, अंकुरण क्षमता और बुवाई की विधि पर निर्भर करती है। यदि जरूरत से अधिक बीज डाल दिया जाए, तो पौधे एक-दूसरे के बहुत करीब उग सकते हैं। इससे पौधों को पर्याप्त पोषण और रोशनी मिलने में समस्या हो सकती है। दूसरी ओर, बहुत कम पौधे होने पर खेत की पूरी उत्पादन क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता। इसलिए किसानों को बीज की मात्रा और पौधों के बीच दूरी दोनों का ध्यान रखना चाहिए।
सरसों की बुवाई में कितनी दूरी रखें?
Sarso ki kheti में सामान्यतः कतार से कतार की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी करीब 10 से 15 सेंटीमीटर रखी जा सकती है। हालांकि, अलग-अलग किस्मों के लिए दूरी की सिफारिश में अंतर हो सकता है। बीज को बहुत अधिक गहराई में बोने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है। सामान्यतः हल्की गहराई पर बुवाई करना उचित माना जाता है। कतारों में बुवाई करने का एक फायदा यह भी है कि खरपतवार नियंत्रण और फसल की निगरानी आसान हो जाती है।
सरसों में सल्फर की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
सरसों एक तिलहनी फसल है। इसलिए इसमें सल्फर की भूमिका विशेष महत्व रखती है। सल्फर पौधों में प्रोटीन निर्माण और कई जैविक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक होता है। इसकी कमी होने पर पौधों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कई किसान केवल यूरिया और डीएपी के उपयोग पर ध्यान देते हैं, लेकिन खेत में अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसा करने से पौधों में Nutrient Imbalance की समस्या हो सकती है। किसानों को सरसों की बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करानी चाहिए। Soil Test Report के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर सहित अन्य पोषक तत्वों की जरूरत तय की जा सकती है। इसके अलावा जिन खेतों में बोरॉन की कमी पाई जाती है, वहां विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उसका प्रबंधन करना चाहिए। बिना जांच के बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का अधिक उपयोग नुकसानदायक हो सकता है।
सरसों की सिंचाई कब करनी चाहिए?
Sarso ki kheti में पानी का संतुलित उपयोग बहुत जरूरी है। यदि फसल को लगातार अधिक पानी दिया जाता है, तो मिट्टी में हवा का आवागमन प्रभावित हो सकता है। इससे जड़ों के विकास और पौधों के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। वहीं नमी की कमी के कारण फूल और फलियों का विकास प्रभावित हो सकता है। आमतौर पर सरसों की फसल में फूल आने और फलियां बनने की अवस्थाएं सिंचाई प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जिन किसानों के पास सीमित पानी है, उन्हें इन अवस्थाओं पर मिट्टी की नमी का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सिंचाई का समय तय करते समय मिट्टी के प्रकार, मौसम और खेत में उपलब्ध नमी को जरूर देखें।
सरसों की फसल को माहू से कैसे बचाएं?
Sarso ki kheti में माहू यानी Mustard Aphid एक प्रमुख कीट है। अनुकूल मौसम मिलने पर इसका प्रकोप तेजी से बढ़ सकता है। माहू पौधों के कोमल हिस्सों से रस चूसता है, जिससे पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इससे बचाव के लिए किसानों को फसल की नियमित निगरानी करनी चाहिए। खासतौर पर फूल आने के आसपास पौधों की ऊपरी शाखाओं और कोमल भागों को देखना जरूरी है। यदि खेत में माहू दिखाई दे, तो पहले उसकी संख्या और प्रकोप की स्थिति का आकलन करें। बिना जरूरत के कीटनाशकों का उपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से खेती की लागत बढ़ने के साथ मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंच सकता है। किसी भी रासायनिक नियंत्रण से पहले कृषि विभाग की वर्तमान सिफारिश और उत्पाद के स्वीकृत लेबल का पालन करें।
सफेद रतुआ और अल्टरनेरिया रोग से कैसे करें बचाव?
Sarso ki kheti में सफेद रतुआ और अल्टरनेरिया झुलसा जैसे रोग उत्पादन प्रभावित कर सकते हैं। इन रोगों से बचने के लिए फसल चक्र अपनाना, खेत में जल निकासी बनाए रखना और स्वस्थ बीज का उपयोग करना महत्वपूर्ण है। जहां उपयुक्त रोग प्रतिरोधक किस्म उपलब्ध हो, वहां उसे प्राथमिकता दी जा सकती है। किसानों को खेत में रोग के शुरुआती लक्षण दिखने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय पर पहचान होने से नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
सरसों की खेती में उत्पादन और मुनाफे का संबंध
अक्सर किसान अधिक पैदावार को ही अधिक मुनाफे का आधार मानते हैं। लेकिन खेती में लाभ की गणना करते समय उत्पादन लागत को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। मान लीजिए दो किसान अलग-अलग किस्मों की सरसों उगाते हैं। पहले किसान को ज्यादा उत्पादन मिलता है, लेकिन उसके खेत में सिंचाई, खाद और मजदूरी पर अधिक खर्च होता है। दूसरे किसान की पैदावार कुछ कम रहती है, लेकिन उसकी खेती की लागत भी कम होती है। ऐसी स्थिति में संभव है कि दूसरे किसान की शुद्ध आमदनी बेहतर हो। इसलिए किसान को प्रति एकड़ उत्पादन के साथ प्रति क्विंटल उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य का भी हिसाब रखना चाहिए। इसे Farm Profitability Analysis कहा जा सकता है। खेती का रिकॉर्ड रखने से किसान यह समझ सकते हैं कि किस किस्म और किस कृषि तकनीक से उन्हें वास्तविक फायदा हो रहा है।
सरसों की कटाई के समय किन बातों का रखें ध्यान?
Sarso ki kheti पकने पर फलियों का रंग बदलने लगता है। इस समय किसान को कटाई की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। यदि फसल को बहुत जल्दी काट लिया जाए, तो दानों में पर्याप्त परिपक्वता नहीं आ सकती। दूसरी ओर, ज्यादा देर तक फसल खेत में खड़ी रहने पर फलियों के फटने और दाने झड़ने का जोखिम बढ़ सकता है। कटाई के बाद सरसों को अच्छी तरह सुखाना चाहिए। भंडारण से पहले बीज की नमी को सुरक्षित स्तर तक लाना जरूरी है। साफ और सूखी उपज की गुणवत्ता बनाए रखना आसान होता है।
किसान कैसे चुनें अपने खेत के लिए सही सरसों की किस्म?
किस्म का चुनाव करने से पहले किसान अपने आप से चार सवाल पूछ सकते हैं। पहला, क्या खेत में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है? दूसरा, क्या सरसों की बुवाई सामान्य समय पर हो रही है या देरी से? तीसरा, खेत की मिट्टी किस प्रकार की है और उसमें नमी कितनी रहती है? चौथा, क्या चुनी गई किस्म को स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग ने उस क्षेत्र के लिए अनुशंसित किया है? इन सवालों के आधार पर किसान ऐसी किस्म चुन सकते हैं जो उनके खेत की परिस्थितियों के अनुकूल हो। किसानों को प्रमाणित बीज अधिकृत बीज विक्रेता, कृषि विभाग, मान्यता प्राप्त सहकारी संस्था या विश्वसनीय बीज उत्पादक से खरीदना चाहिए। बीज खरीदते समय पैकेट पर किस्म का नाम, अंकुरण प्रतिशत, लॉट नंबर और वैधता संबंधी जानकारी देखना भी जरूरी है।
सरसों की खेती से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल
1. सरसों की सबसे अच्छी किस्म कौन-सी है?
सरसों की सबसे अच्छी किस्म क्षेत्र और खेती की परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। गिरिराज, BPM 1825, RH-749 और BPM (Q) 172 जैसी किस्मों में अच्छी उत्पादन क्षमता दर्ज की गई है।
2. क्या नवंबर में सरसों की बुवाई करना सही है?
नवंबर में कुछ क्षेत्रों में देर से बुवाई के लिए अनुशंसित किस्में उगाई जा सकती हैं। हालांकि, फसल की सफलता स्थानीय तापमान और मौसम पर निर्भर करेगी।
3. एक एकड़ में सरसों का कितना बीज चाहिए?
सामान्य परिस्थितियों में लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ उपयोग किया जा सकता है। अंतिम मात्रा स्थानीय सिफारिश और बुवाई विधि के अनुसार तय करें।
4. सरसों की फसल कितने दिनों में तैयार होती है?
सरसों की अलग-अलग किस्में लगभग 120 से 155 दिनों में तैयार हो सकती हैं। वास्तविक अवधि मौसम, किस्म और बुवाई के समय के अनुसार बदलती है।
5. क्या सरसों की खेती कम पानी में हो सकती है?
सरसों को सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों में उगाया जा सकता है। लेकिन अंकुरण, फूल आने और फलियां बनने के दौरान पर्याप्त नमी महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
sarso ki kheti किसानों के लिए अच्छी आमदनी का माध्यम बन सकती है, लेकिन इसके लिए सही किस्म का चुनाव और वैज्ञानिक खेती की जानकारी जरूरी है। रबी सीजन 2026-27 में किसान गिरिराज, BPM 1825, BPM (Q) 172, RH-749, BPM 11 और राधिका जैसी किस्मों के बारे में अपने कृषि विज्ञान केंद्र से जानकारी ले सकते हैं। खासकर नवंबर में बुवाई कर रहे किसानों को देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त किस्मों का चयन करने पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ संतुलित खाद प्रबंधन, सही पौध दूरी, जरूरत के अनुसार सिंचाई और समय पर रोग नियंत्रण अपनाने से बेहतर उत्पादन की संभावना बढ़ सकती है।
