भारत की प्रमुख फसल सुरक्षा कंपनियों ने केंद्र सरकार से Protection of Regulatory Data (PRD) यानी नियामकीय डेटा संरक्षण की व्यवस्था लागू करने की मांग की है। कंपनियों का कहना है कि यदि नए कृषि रसायनों और नए उपयोगों के लिए सीमित और निश्चित अवधि का डेटा संरक्षण उपलब्ध कराया जाता है, तो इससे भारतीय किसानों को नई, अधिक सुरक्षित और कम मात्रा में प्रभावी होने वाली कृषि रसायन तकनीक तेजी से उपलब्ध हो सकेगी। इसके साथ ही घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान, कृषि निर्यात और छोटे एवं मध्यम स्तर के निर्माताओं को भी लाभ मिलेगा।
इस मांग को लेकर Crystal Crop Protection, Rallis India, Dhanuka Agritech, PI Industries और Godrej Agrovet ने संयुक्त रूप से कहा है कि भारत में नए अणुओं (मॉलिक्यूल्स) को लाने के लिए कंपनियों द्वारा किए जाने वाले बड़े निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एक सीमित और समयबद्ध डेटा संरक्षण व्यवस्था जरूरी है। कंपनियों के अनुसार, यह व्यवस्था किसी मौजूदा उत्पाद को बाजार से बाहर नहीं करेगी, बल्कि केवल नए अणुओं और नए उपयोगों के लिए लागू होगी।
किसानों को क्यों होगी सबसे बड़ी मदद?
कंपनियों के अनुसार, बदलती जलवायु के कारण देश में कीट, खरपतवार और फसल रोगों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कई स्थानों पर पुराने कृषि रसायनों के प्रति कीटों और रोगजनकों में प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में किसानों के पास प्रभावी विकल्पों की संख्या सीमित हो सकती है।
नई पीढ़ी के फसल सुरक्षा उत्पाद अपेक्षाकृत अधिक लक्षित तरीके से काम करते हैं और कई मामलों में कम मात्रा में प्रभावी हो सकते हैं। कंपनियों का कहना है कि इससे किसानों को फसल सुरक्षा के लिए नए विकल्प मिलेंगे तथा उत्पादों के सुरक्षित उपयोग, अवशेष प्रबंधन और प्रभावी कीट नियंत्रण में मदद मिल सकती है।
भारत में कीट, खरपतवार और रोगों के कारण हर वर्ष कृषि उत्पादन का अनुमानित 10 से 35 प्रतिशत तक नुकसान होने का दावा किया जाता है। CropLife India-Yes Bank Knowledge Report और अन्य अध्ययनों के हवाले से इस नुकसान का आर्थिक मूल्य लगभग 2 लाख करोड़ रुपये तक बताया गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि के साथ इन नुकसानों के और बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है।
ऐसे में कंपनियों का तर्क है कि किसानों को नई तकनीक और नए प्रभावी कृषि रसायनों तक समय पर पहुंच दिलाना कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत में नए कृषि रसायनों की उपलब्धता सीमित
कंपनियों के मुताबिक, दुनिया में करीब 1,200 कृषि रसायन अणु इस्तेमाल में हैं, जबकि भारत में लगभग 380 अणु ही पंजीकृत हैं। उद्योग का मानना है कि यदि भारत में पंजीकृत अणुओं की संख्या बढ़ती है तो किसानों के सामने फसल सुरक्षा के अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे।
कंपनियों ने कहा कि नए और आधुनिक अणुओं की उपलब्धता केवल घरेलू कृषि उत्पादन के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भारत के कृषि निर्यात को भी मजबूत कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खाद्य उत्पादों के लिए अधिक सख्त अवशेष मानक लागू किए जा रहे हैं। ऐसे में निर्यात योग्य फसलों के उत्पादन में आधुनिक और बेहतर फसल सुरक्षा तकनीकों की भूमिका बढ़ रही है।
भारत के कृषि रसायन उद्योग को उन देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, जहां नियामकीय डेटा के संरक्षण की व्यवस्था पहले से मौजूद है। उद्योग का कहना है कि यदि भारत भी ऐसी व्यवस्था अपनाता है तो घरेलू कंपनियों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनने में मदद मिल सकती है।
नए मॉलिक्यूल को भारत लाने में भारी निवेश
फसल सुरक्षा उद्योग के अनुसार, किसी नए अणु को भारतीय बाजार में लाने की प्रक्रिया लंबी और महंगी है। कंपनियों को स्थानीय स्तर पर सुरक्षा, प्रभावकारिता और अवशेष से संबंधित अध्ययन कराने पड़ते हैं। उद्योग के अनुमान के अनुसार, किसी नए अणु को भारत में लाने में करीब 40 से 50 करोड़ रुपये का निवेश और लगभग 6 से 8 वर्ष का समय लग सकता है।
कंपनियों का कहना है कि समस्या तब पैदा होती है जब किसी कंपनी द्वारा इतने बड़े निवेश और लंबे समय के बाद तैयार किया गया नियामकीय डेटा बाद में आने वाला आवेदक अपेक्षाकृत कम लागत पर इस्तेमाल कर सकता है। उनके अनुसार, बाद में आने वाली कंपनी को समान डेटा तैयार करने में करीब 75 लाख रुपये का खर्च हो सकता है।
उद्योग का तर्क है कि ऐसी स्थिति में पहली कंपनी के लिए नए अणुओं को भारत में लाने का आर्थिक प्रोत्साहन कमजोर पड़ता है। इसके कारण कंपनियां नए उत्पादों को भारतीय बाजार में पेश करने के बजाय उन बाजारों को प्राथमिकता दे सकती हैं जहां डेटा संरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था मौजूद है।
पांच साल की डेटा संरक्षण अवधि का प्रस्ताव
कंपनियों ने सरकार से सुझाव दिया है कि नए अणुओं और नए उपयोगों के लिए पहले पंजीकरण की तारीख से पांच वर्ष की समयबद्ध डेटा संरक्षण अवधि निर्धारित की जाए।
उद्योग के अनुसार, पांच वर्ष की यह अवधि कंपनियों को अनुसंधान और नियामकीय प्रक्रिया में किए गए निवेश के लिए उचित प्रोत्साहन दे सकती है। वहीं, संरक्षण अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित अणु पूरे उद्योग के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इससे जेनेरिक कंपनियों और छोटे एवं मध्यम उद्यमों को भी उन उत्पादों के निर्माण और निर्यात का अवसर मिलेगा।
कंपनियों ने इसे घरेलू उद्योग के लिए किसी तरह की बाधा के बजाय एक ऐसी व्यवस्था बताया है जो नए उत्पादों का दायरा बढ़ा सकती है।
जेनेरिक सेक्टर और SMEs को भी मिलेगा लाभ
PRD को लेकर अक्सर यह चिंता व्यक्त की जाती है कि इससे जेनेरिक उद्योग और छोटे निर्माताओं के लिए बाजार सीमित हो सकता है। हालांकि, कंपनियों का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था केवल सीमित अवधि के लिए होगी।
संरक्षण अवधि पूरी होने के बाद संबंधित अणु जेनेरिक निर्माताओं और SMEs के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इससे छोटे एवं मध्यम उद्योगों के पास आधुनिक कृषि रसायनों का एक बड़ा पोर्टफोलियो तैयार हो सकता है।
कंपनियों के अनुसार, वर्तमान में जो उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं, उन पर इस व्यवस्था का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। PRD केवल नए अणुओं और नए उपयोगों पर लागू होगा। इसलिए इसका उद्देश्य मौजूदा बाजार को प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि भविष्य में नए उत्पादों के विकास और उपलब्धता को प्रोत्साहित करना है।
डेटा संरक्षण से गुणवत्ता और अनुसंधान को बढ़ावा
उद्योग ने यह भी तर्क दिया कि जब किसी एक अणु के कई सौ समान पंजीकरण हो जाते हैं, तो कीमतों में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है। कंपनियों का कहना है कि अत्यधिक मूल्य प्रतिस्पर्धा कई बार गुणवत्ता, जिम्मेदार उपयोग और उत्पाद के सही इस्तेमाल जैसे मुद्दों को प्रभावित कर सकती है।
उनके अनुसार, सीमित डेटा संरक्षण व्यवस्था वास्तविक अनुसंधान और गुणवत्ता में निवेश करने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित कर सकती है। साथ ही, इससे स्थानीय स्तर पर अनुसंधान प्रयोगशालाओं, फील्ड स्टेशनों और परीक्षण सुविधाओं में काम बढ़ सकता है।
कंपनियों का कहना है कि नए उत्पादों के पंजीकरण के लिए स्थानीय स्तर पर सुरक्षा, प्रभावकारिता और अवशेष संबंधी डेटा तैयार करना पड़ता है। इससे भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों, प्रयोगशालाओं और कृषि क्षेत्र से जुड़े अनुसंधान तंत्र को भी अतिरिक्त काम और अवसर मिल सकते हैं।
प्रतिरोध प्रबंधन और जिम्मेदार उपयोग पर जोर
बदलते मौसम और लगातार एक ही प्रकार के रसायनों के इस्तेमाल से कीटों में प्रतिरोध बढ़ने की चुनौती सामने आ रही है। कंपनियों के अनुसार, नए मॉलिक्यूल किसानों को अलग-अलग प्रकार के प्रभावी विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं, जिससे फसल सुरक्षा रणनीति को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
उद्योग ने यह भी कहा कि नए उत्पादों के शुरुआती पंजीकरणकर्ता के पास संरक्षण अवधि के दौरान उत्पाद के जिम्मेदार उपयोग, सही डोज और प्रतिरोध प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां होती हैं। इससे किसानों के बीच सही उपयोग और बेहतर stewardship को बढ़ावा दिया जा सकता है।
दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा का मुद्दा
कंपनियों ने कहा कि भारत नियामकीय डेटा संरक्षण के मामले में कई प्रतिस्पर्धी देशों से पीछे है। उनके अनुसार, चीन में छह वर्ष की डेटा संरक्षण व्यवस्था है, जबकि थाईलैंड, ब्राजील और अमेरिका में 10 वर्ष तक का संरक्षण उपलब्ध है। यूरोपीय संघ में सामान्य रूप से 10 वर्ष की व्यवस्था बताई गई है, जिसे कम जोखिम वाले और जैविक उत्पादों के लिए बढ़ाकर 13 वर्ष तक किया जा सकता है।
कंपनियों का कहना है कि जिन देशों के साथ भारत कृषि रसायनों के वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करता है, वहां पहले से डेटा संरक्षण की व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में भारत में भी एक स्पष्ट, सीमित और समयबद्ध ढांचा तैयार करने से भारतीय उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत हो सकती है।
Pesticides Management Bill में शामिल करने की मांग
कंपनियों ने सरकार से अपील की है कि Pesticides Management Bill, 2025 के माध्यम से नियामकीय डेटा संरक्षण की व्यवस्था को शामिल करने पर विचार किया जाए।
उद्योग के अनुसार, पांच वर्ष की सीमित अवधि वाला PRD मॉडल नवाचार और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन कायम कर सकता है। इससे कंपनियों को नए उत्पादों पर निवेश करने का प्रोत्साहन मिलेगा और संरक्षण अवधि समाप्त होने के बाद जेनेरिक क्षेत्र एवं SMEs के लिए बाजार खुल जाएगा।
उद्योग जगत ने रखी अपनी बात
CropLife India के चेयरमैन और Crystal Crop Protection के कार्यकारी चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अंकुर अग्रवाल ने कहा कि बदलते कीट दबाव के बीच किसानों को आधुनिक फसल सुरक्षा समाधान की जरूरत है। उनके अनुसार, समयबद्ध डेटा संरक्षण किसानों तक नई और सुरक्षित तकनीक जल्दी पहुंचाने में मदद कर सकता है और संरक्षण अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित मॉलिक्यूल पूरे उद्योग के लिए उपलब्ध रहेगा।
CropLife India के वाइस चेयरमैन और Rallis India के प्रबंध निदेशक एवं CEO डॉ. ज्ञानेंद्र शुक्ला ने कहा कि भारत जिन देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करता है, उनमें डेटा संरक्षण पहले से मौजूद है। उन्होंने कहा कि आधुनिक कृषि रसायन पोर्टफोलियो भारतीय किसानों की सुरक्षा के साथ-साथ देश के कृषि निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
Dhanuka Agritech के प्रबंध निदेशक राहुल धनुका ने कहा कि कीटों में बढ़ते प्रतिरोध के बीच भारतीय किसानों को नई, सुरक्षित और कम मात्रा में प्रभावी होने वाली फसल सुरक्षा तकनीकों तक तेजी से पहुंच की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि समयबद्ध PRD व्यवस्था नवाचार तक पहुंच को तेज कर सकती है।
PI Industries के वाइस चेयरपर्सन एवं प्रबंध निदेशक मयंक सिंघल के अनुसार, एक स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य डेटा संरक्षण व्यवस्था वास्तविक अनुसंधान को प्रोत्साहित कर सकती है और किसानों तक नए समाधान पहुंचाने में मदद कर सकती है।
वहीं Godrej Agrovet के CEO एन. के. राजवेलु ने टिकाऊ खेती के लिए कम मात्रा में प्रभावी और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर रसायनों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने यूरोपीय संघ की तरह कम जोखिम वाले उत्पादों के लिए अधिक संरक्षण अवधि पर विचार करने की बात कही।
किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए आगे की राह
फसल सुरक्षा उद्योग की यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब भारतीय कृषि जलवायु परिवर्तन, बदलते कीट व्यवहार, फसल रोगों और कीटनाशक प्रतिरोध जैसी कई चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे में नई तकनीक और आधुनिक फसल सुरक्षा उत्पादों की उपलब्धता कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि, PRD लागू करने से पहले किसानों के हित, उत्पादों की कीमत, जेनेरिक उद्योग की प्रतिस्पर्धा, नियामकीय पारदर्शिता, सुरक्षा मानक और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे पहलुओं के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी होगा।
कंपनियों का प्रस्ताव है कि पांच वर्ष की सीमित और स्पष्ट डेटा संरक्षण अवधि नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ भविष्य में जेनेरिक कंपनियों और SMEs के लिए बाजार के अवसर भी बढ़ा सकती है। यदि सरकार इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ती है, तो इसका असर केवल कृषि रसायन उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय कृषि की उत्पादकता, घरेलू विनिर्माण, अनुसंधान और कृषि निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर भी पड़ सकता है।
CropLife India के अनुसार, संगठन में 17 R&D आधारित सदस्य कंपनियां शामिल हैं। संगठन का दावा है कि ये कंपनियां भारतीय फसल सुरक्षा बाजार का लगभग 70 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करती हैं और देश में पेश किए गए करीब 95 प्रतिशत मॉलिक्यूल्स के लिए जिम्मेदार हैं। सदस्य कंपनियां वैश्विक स्तर पर अनुसंधान एवं विकास पर लगभग 6 अरब डॉलर खर्च करती हैं और भारतीय कृषि में सुरक्षित तथा टिकाऊ खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही हैं।

