राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे को लेकर बड़ा बयान दिया है। एक इंटरव्यू में चिदंबरम ने कहा कि धनखड़ को इसलिए पद छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपनी सीमाएं लांघते हुए सरकार के खिलाफ खड़े होने की कोशिश की थी – खासतौर पर जस्टिस यशवंत वर्मा के समर्थन में प्रस्ताव को स्वीकार कर।
चिदंबरम ने दावा किया कि यह साफ संकेत है कि केंद्र सरकार और धनखड़ के बीच अब कोई तालमेल नहीं बचा। उन्होंने कहा, “जब सरकार को किसी पर से भरोसा उठता है, तो वह उसे चलने को कहती है। धनखड़ का यही हाल हुआ।”
संविधानिक मर्यादा टूटी, इसलिए रिश्ता टूटा”
चिदंबरम ने राज्यसभा में हुए उस ‘औपचारिक’ ऐलान की भी आलोचना की, जिसमें उपसभापति ने महज़ यह कहा कि उपराष्ट्रपति पद अब रिक्त है और कार्यक्रम बाद में तय होगा। उन्होंने कहा, “ना कोई विदाई समारोह, ना कोई औपचारिक सम्मान – इससे साफ पता चलता है कि सरकार और धनखड़ के बीच अब सम्मान नहीं बचा। यह चुपचाप विदाई दिखाती है कि दोनों के रिश्ते अब खत्म हो गए हैं।”
मोदी सरकार का स्टाइल है – जब तक साथ हैं, ठीक हैं”
चिदंबरम ने मोदी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा, “हम इस सरकार की कार्यशैली से वाकिफ हैं। जब तक कोई व्यक्ति उनकी लाइन पर चलता है, वह उनका समर्थन करते हैं। जैसे ही वह अलग राय रखता है, समर्थन खत्म कर देते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि धनखड़ के साथ ठीक यही हुआ है, लेकिन कुछ तो ज़रूर हुआ है।”
ज्यूडिशियरी से टकराव बना कारण?
पूर्व मंत्री ने यह भी कहा कि धनखड़ पिछले एक साल से न्यायपालिका के मुद्दों पर टकराव की लाइन पर चल रहे थे, जो शायद सरकार को असहज कर गया।
बीजेपी नेताओं के ‘बैठक बहिष्कार’ का भी जिक्र
चिदंबरम ने बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि जेपी नड्डा और किरण रिजिजू बैठक में पहले आए लेकिन दोबारा बुलाई गई बैठक में नहीं लौटे, जिससे यह संदेश गया कि पार्टी खुद धनखड़ के साथ अब कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी नहीं है।

