केंद्र सरकार राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) के तहत भारतीय कृषि को टिकाऊ उत्पादन प्रणाली बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इस मिशन के अंतर्गत कई योजनाएं शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य कृषि को जलवायु परिवर्तन और अन्य जोखिमों के प्रति अधिक लचीला बनाना है।
‘पर ड्रॉप, मोर क्रॉप’ (PDMC) योजना के माध्यम से खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए माइक्रो सिंचाई तकनीकों — जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम — को प्रोत्साहित किया जा रहा है। वहीं, रेनफेड एरिया डेवलपमेंट योजना एकीकृत कृषि प्रणाली पर केंद्रित है, जिससे वर्षा आधारित खेती की उत्पादकता बढ़ाई जा सके और मौसम की अनिश्चितताओं से जुड़े जोखिम कम हों।
मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना राज्यों को रासायनिक उर्वरकों (द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित) के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करने में सहायता करती है। इसके साथ ही, जैविक खाद और बायो-फर्टिलाइज़र के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार लाने पर जोर है।
जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए बागवानी का एकीकृत विकास मिशन, एग्रोफॉरेस्ट्री, और राष्ट्रीय बांस मिशन लागू हैं। जैविक खेती के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट (MOVCDNER) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। PKVY का कार्यान्वयन पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर पूरे देश में हो रहा है, जबकि MOVCDNER केवल पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है। ये योजनाएं छोटे और सीमांत किसानों को प्राथमिकता देते हुए उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, प्रमाणन और विपणन तक एंड-टू-एंड सहायता प्रदान करती हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ने पिछले 10 वर्षों (2014-2024) में 2,900 किस्में विकसित की हैं, जिनमें से 2,661 किस्में एक या अधिक जैविक और/या अजैविक तनावों के प्रति सहनशील हैं। साथ ही, जलवायु अनुकूल तकनीकें — जैसे सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन, एरोबिक राइस, डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस, जीरो टिल गेहूं बुवाई, सूखा और गर्मी सहनशील किस्मों की खेती, तथा धान अवशेषों का खेत में ही समावेश — विकसित और प्रदर्शित की गई हैं।
सरकार का मानना है कि इन योजनाओं और तकनीकों के माध्यम से भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन, संसाधन सीमाओं और बाजार की चुनौतियों का सामना करने में मजबूती मिलेगी, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और उत्पादन प्रणाली अधिक टिकाऊ बनेगी।

