देश में सहकारिता आंदोलन को नई दिशा देने और उसे विकास के दूसरे इंजन के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से राजधानी के विज्ञान भवन में “राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के कार्यान्वयन पथ एवं आगे की राह” विषय पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन सहकारिता मंत्रालय और “त्रिभुवन” सहकारी विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से किया गया, जिसमें देशभर से नीति-निर्माता, विशेषज्ञ, सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि और विभिन्न हितधारक शामिल हुए।
यह कॉन्क्लेव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “सहकार से समृद्धि” विजन को जमीनी स्तर पर लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। कार्यक्रम में सहकारिता क्षेत्र के व्यापक विकास, नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और भविष्य की रणनीतियों पर गहन चर्चा की गई।
इस अवसर पर केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर ने कहा कि सहकारिता भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना का एक मजबूत स्तंभ है, जिसने वर्षों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 को एक दूरदर्शी रोडमैप बताते हुए कहा कि यह नीति सहकारिता को देश के विकास के दूसरे इंजन के रूप में स्थापित करने में निर्णायक साबित होगी।
उन्होंने बताया कि इस नीति का लक्ष्य समावेशी विकास को बढ़ावा देना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देना और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में योगदान सुनिश्चित करना है। उन्होंने राज्यों को भी अपनी-अपनी सहकारिता नीतियां बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि इस आंदोलन को और गति मिल सके।
कॉन्क्लेव में सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर जोर दिया गया। इनमें प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS) का कंप्यूटरीकरण, उन्हें बहुउद्देशीय इकाइयों में विकसित करना, और भंडारण व्यवस्था का विकेंद्रीकरण प्रमुख हैं। इन कदमों से किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी आएगी और लॉजिस्टिक्स लागत भी घटेगी।
सहकारिता मंत्रालय के सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी ने बताया कि देश में 80 हजार से अधिक PACS का डिजिटलीकरण किया जा रहा है, जिससे उनकी कार्यक्षमता और पारदर्शिता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि यह पहल सहकारी संस्थाओं को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रो. एस. महेंद्र देव ने सहकारिता क्षेत्र के आर्थिक योगदान को तीन गुना करने की रणनीतियों पर जोर दिया। वहीं, भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड के निदेशक सतीश मराठे ने कहा कि अंतिम छोर तक किफायती ऋण पहुंचाने में सहकारिता क्षेत्र की भूमिका बेहद प्रभावी है।
कॉन्क्लेव के दौरान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, युवाओं और महिलाओं की भागीदारी, जैविक उत्पादों के बाजार में सहकारिता की भूमिका और सहकारी बैंकिंग जैसे विषयों पर भी विस्तृत चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने सहकारिता को जन-आंदोलन बनाने और इसे अधिक पारदर्शी, तकनीक-सक्षम तथा सदस्य-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कुल मिलाकर, यह राष्ट्रीय कॉन्क्लेव सहकारिता क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इससे न केवल नीति के प्रभावी क्रियान्वयन को गति मिलेगी, बल्कि देश में समावेशी और सतत विकास के लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी। “सहकार से समृद्धि” का संकल्प अब और मजबूत होता नजर आ रहा है, जो आने वाले वर्षों में ग्रामीण और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।

