भारत सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा और उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ग्रीन अमोनिया को बढ़ावा देने की बड़ी पहल शुरू की है। उर्वरक विभाग द्वारा फर्टिलाइज़र कंपनियों और ग्रीन अमोनिया उत्पादक कंपनियों के बीच दीर्घकालिक समझौते (GAPA और GASA) किए गए हैं, जो देश में स्वच्छ ऊर्जा आधारित उर्वरक उत्पादन को नई दिशा देंगे।
यह पहल National Green Hydrogen Mission के तहत की गई है, जिसका उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन और उससे जुड़े उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देना है। इस अवसर पर केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री Jagat Prakash Nadda ने इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और टिकाऊ विकास की दिशा में “ऐतिहासिक कदम” बताया।
उन्होंने कहा कि ग्रीन अमोनिया को उर्वरक उत्पादन में शामिल करने से न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, बल्कि देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। यह पहल किसानों और देश के लिए एक स्वच्छ और हरित भविष्य की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
कार्यक्रम में केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री Pralhad Joshi सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और उद्योग जगत के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। इस दौरान कुल 11 परियोजनाओं से जुड़े ग्रीन अमोनिया समझौतों का आदान-प्रदान किया गया।
आयात पर निर्भरता घटाने की रणनीति
वर्तमान में भारत फॉस्फेटिक और पोटासिक (P&K) उर्वरकों का बड़ा उत्पादक है, लेकिन इसके लिए आवश्यक अमोनिया का एक बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है। वैश्विक बाजार में अस्थिरता और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण अमोनिया की कीमतों और उपलब्धता में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय कंपनियों ने ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति के लिए 10 वर्षों के दीर्घकालिक समझौते किए हैं, जिससे स्थिर और भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित होगी। इससे उर्वरक उत्पादन में निरंतरता बनी रहेगी और घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।
किफायती और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प
Solar Energy Corporation of India द्वारा आयोजित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में ग्रीन अमोनिया की कीमत ₹49.75 से ₹64.74 प्रति किलोग्राम के बीच तय हुई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में काफी कम है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ग्रीन अमोनिया न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि आर्थिक रूप से भी व्यवहारिक विकल्प बनता जा रहा है।
देशभर की 13 उर्वरक इकाइयों को हर साल लगभग 7.24 लाख टन ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति का आवंटन किया गया है। यह पहल आने वाले वर्षों में उर्वरक उद्योग को अधिक टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाएगी।
आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
ग्रीन अमोनिया को अपनाने से भारत को कई स्तरों पर लाभ होगा। इससे आयातित ‘ग्रे’ अमोनिया पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी। अनुमान है कि अगले 10 वर्षों में लगभग 2.5 बिलियन डॉलर की बचत हो सकती है। साथ ही, उर्वरक उद्योग का कार्बन फुटप्रिंट भी काफी कम होगा।
इसके अलावा, इस क्षेत्र में निवेश बढ़ने और नई परियोजनाओं के शुरू होने से रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह पहल भारत को वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाइड्रोजन और उससे जुड़े उत्पादों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनने की दिशा में भी आगे बढ़ाएगी।
भविष्य की दिशा
सरकार ने National Green Hydrogen Mission के तहत 19,744 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक हर साल कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना है।
उर्वरक विभाग, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और उद्योग जगत के संयुक्त प्रयासों से यह पहल भारत के उर्वरक क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, आत्मनिर्भर और भविष्य के लिए तैयार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
कुल मिलाकर, ग्रीन अमोनिया की ओर यह बदलाव न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम है, बल्कि यह देश की आर्थिक मजबूती और कृषि क्षेत्र की स्थिरता सुनिश्चित करने वाला एक दूरगामी कदम भी साबित होगा।

