राजस्थान के किशनगढ़ की पहचान कभी मार्बल इंडस्ट्री और ‘बनी-ठनी’ पेंटिंग्स के लिए होती थी, लेकिन अब यह इलाका एक नए और अनोखे टूरिस्ट स्पॉट के रूप में तेजी से उभर रहा है। यहां मौजूद विशाल सफेद मार्बल वेस्ट डंपिंग साइट दूर से बर्फ से ढके पहाड़ों जैसी दिखाई देती है, जो सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। हर दिन हजारों की संख्या में लोग इस जगह को देखने पहुंच रहे हैं और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें वायरल हो रही हैं।
लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है। इस डंपिंग साइट के आसपास बसे गांवों के किसान गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। किशनगढ़ के पास स्थित यह मार्बल वेस्ट यार्ड एशिया का सबसे बड़ा माना जाता है, जहां रोजाना भारी मात्रा में मार्बल स्लरी डाली जाती है। यह स्लरी सूखने के बाद बारीक धूल में बदल जाती है और हवा के साथ उड़कर आसपास के खेतों में फैल जाती है।
टोकड़ा, भोजियावास, रहीमपुरा, फलोदा, मोहनपुरा और काली डूंगरी जैसे गांवों के किसानों का कहना है कि उनके खेतों पर अब सफेद परत जमने लगी है। इस परत के कारण फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है। किसानों के अनुसार, पहले जहां खेतों में अच्छी पैदावार होती थी, अब वही खेत कमजोर होते जा रहे हैं।
स्थानीय किसानों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में उनकी उपज में भारी गिरावट आई है। गेहूं, जौ, सरसों और चना जैसी प्रमुख फसलें अब पहले की तुलना में काफी कम उत्पादन दे रही हैं। कुछ किसानों का दावा है कि उनकी फसल की पैदावार आधी रह गई है। लगातार जमा हो रही मार्बल की धूल मिट्टी की उर्वरता को खत्म कर रही है और सिंचाई के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई किसानों को खेती छोड़ने तक की नौबत आ गई है। खासकर वे किसान, जिनकी जमीन डंपिंग साइट के पास है, सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई जगहों पर मार्बल स्लरी की मोटी परत सीधे खेतों में जम गई है, जिससे जमीन पूरी तरह बंजर हो चुकी है। ऐसे में किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है और उन्हें मजबूरी में दूसरे काम तलाशने पड़ रहे हैं।
इसके अलावा, इस सफेद धूल का असर लोगों की सेहत पर भी पड़ रहा है। ग्रामीणों में सांस लेने में तकलीफ, एलर्जी और अन्य बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। हालांकि यह जगह पर्यटन के लिहाज से तेजी से लोकप्रिय हो रही है, लेकिन पर्यावरण और किसानों की समस्याओं को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
किसानों और स्थानीय लोगों की मांग है कि प्रशासन इस समस्या का जल्द समाधान करे और मार्बल वेस्ट के प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि उनकी जमीन और जीवन दोनों को बचाया जा सके।

