धौलपुर। मध्य-पूर्व एशिया में जारी तनाव और युद्ध का असर अब भारत के आम घरों की रसोई तक साफ दिखाई देने लगा है। पेट्रोलियम पदार्थों और एलपीजी गैस के बाद अब खाद्य तेलों की कीमतों में भी तेजी दर्ज की जा रही है। खासतौर पर सरसों तेल (Mustard oil) के दामों में पिछले 20 दिनों के भीतर 20 से 25 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।
स्थानीय बाजार में इस समय सरसों तेल करीब 170 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है, जो कुछ हफ्ते पहले तक काफी सस्ता था। व्यापारियों के अनुसार, इस तेजी के पीछे मुख्य कारण खाड़ी देशों में चल रहा युद्ध है, जिसने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है। भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात करता है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई प्रभावित होने से इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर भी सरसों की आवक कम होने से स्थिति और गंभीर हो गई है। किसानों से मंडियों में अपेक्षित मात्रा में सरसों नहीं पहुंच रही, जिससे बाजार में उपलब्धता घट गई है। कम सप्लाई और बढ़ती मांग के कारण कीमतों में लगातार उछाल देखा जा रहा है।
सिर्फ सरसों तेल ही नहीं, बल्कि सोया रिफाइंड तेल के दामों में भी तेजी आई है। थोक और खुदरा दोनों बाजारों में कीमतें बढ़ने से आम उपभोक्ता की रसोई का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है। खासतौर पर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी किसी झटके से कम नहीं है।
बाजार में बढ़ती कीमतों को देखते हुए उपभोक्ताओं का व्यवहार भी बदलता नजर आ रहा है। कई लोग जल्दबाजी में अधिक मात्रा में सरसों तेल खरीद रहे हैं, ताकि आगे और महंगाई से बचा जा सके। हालांकि, यह स्थिति मांग को और बढ़ा रही है, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ रहा है।
आमतौर पर उत्तर भारत में नई सरसों की फसल आने के बाद लोग सालभर का तेल एक साथ खरीद लेते हैं। लेकिन इस बार लोगों ने दाम गिरने की उम्मीद में खरीदारी टाल दी थी। अब जब कीमतें कम होने के बजाय तेजी से बढ़ गई हैं, तो उपभोक्ताओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बाजार में मायूसी और असमंजस का माहौल है।
व्यापारियों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द नहीं सुधरे और आयात सामान्य नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में खाद्य तेलों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में सरकार से भी दखल की उम्मीद की जा रही है, ताकि आम लोगों को राहत मिल सके।
कुल मिलाकर, वैश्विक घटनाओं का असर अब सीधे आम आदमी की थाली पर पड़ रहा है, और रसोई का खर्च दिन-ब-दिन भारी होता जा रहा है।

