भारत के गांवों में हर सुबह खेतों की सिंचाई के लिए डीजल पंपों की आवाज गूंजती रही है, लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है. बढ़ती डीजल कीमतों ने किसानों की जेब पर भारी बोझ डाल दिया है. हरियाणा जैसे राज्यों में छोटे किसानों को हर महीने 8,000 से 12,000 रुपये तक सिर्फ डीजल पर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे उनकी आमदनी पर सीधा असर पड़ता है.
देश में करीब 90 लाख डीजल पंप इस्तेमाल हो रहे हैं. ये पंप न केवल महंगे हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं. डीजल जलने से प्रदूषण बढ़ता है और खेती की लागत भी लगातार बढ़ती जाती है. ऐसे में किसानों के लिए खेती करना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है.
इसी समस्या का समाधान लेकर आई है सरकार की प्रधानमंत्री कुसुम योजना (पीएम-कुसुम), जिसकी शुरुआत 2019 में की गई थी. इस योजना का उद्देश्य किसानों को डीजल पर निर्भरता से हटाकर सौर ऊर्जा की ओर ले जाना है. योजना के तहत किसानों को सोलर पंप उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे वे बिना डीजल के सिंचाई कर सकते हैं.
पीएम-कुसुम योजना तीन प्रमुख हिस्सों में काम करती है—खेतों में सोलर प्लांट लगाना, डीजल पंपों को सोलर पंप से बदलना और बिजली आधारित पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ना. सरकार इस योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है और इसका लाभ लाखों किसानों तक पहुंच रहा है.
सोलर पंप के इस्तेमाल से किसानों की लागत में भारी कमी आई है. डीजल पर होने वाला खर्च खत्म हो जाता है, जिससे एक किसान सालाना करीब 60,000 रुपये तक की बचत कर सकता है. कई मामलों में सोलर सिस्टम की लागत एक से दो साल में ही निकल जाती है. इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है.
हरियाणा इस योजना को लागू करने में अग्रणी राज्य बनकर उभरा है. यहां किसानों को सोलर पंप पर भारी सब्सिडी दी जाती है. किसान केवल लगभग 25 प्रतिशत लागत ही वहन करते हैं, जबकि बाकी खर्च सरकार उठाती है. इसी वजह से राज्य में बड़ी संख्या में सोलर पंप स्थापित हो चुके हैं.
अब किसान सिर्फ सिंचाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बिजली उत्पादन में भी भागीदारी कर रहे हैं. अगर सोलर पैनल से जरूरत से ज्यादा बिजली बनती है, तो किसान उसे ग्रिड को बेच सकते हैं. इससे उनकी आय का एक नया स्रोत तैयार हो गया है.
इसके अलावा, ‘पीएम सूर्य घर’ योजना के तहत घरों में भी सोलर पैनल लगाए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीण परिवारों को मुफ्त बिजली मिल रही है और अतिरिक्त बिजली बेचकर कमाई का अवसर भी मिल रहा है.
खेती में एक और नई तकनीक ‘एग्रीवोल्टाइक्स’ तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इसमें खेतों के ऊपर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और नीचे फसल उगाई जाती है. इससे जमीन का बेहतर उपयोग होता है और फसलों को तेज धूप से राहत मिलती है, साथ ही मिट्टी में नमी भी बनी रहती है.
हालांकि, कुछ क्षेत्रों में जागरूकता और शुरुआती निवेश की कमी जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन सरकार लगातार इन बाधाओं को दूर करने में जुटी है. बैटरी स्टोरेज जैसी नई सुविधाएं जोड़ने की योजना भी बनाई जा रही है, जिससे बिजली का बेहतर उपयोग हो सके.
भारत अब सौर ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसका सकारात्मक असर खेती में भी दिखाई दे रहा है. आने वाले समय में किसान न केवल अपनी जरूरतों को पूरा करेंगे, बल्कि बिजली बेचकर अतिरिक्त आय भी अर्जित करेंगे. यह बदलाव भारतीय कृषि के लिए एक नई उम्मीद और आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है।

