राजस्थान के अलवर जिले के खैरथल–तिजारा क्षेत्र के किशनगढ़ बास के किसान शाकिर खान आज आधुनिक खेती का एक सफल उदाहरण बनकर उभरे हैं। जहां पारंपरिक खेती में लागत और जोखिम अधिक होता है, वहीं शाकिर खान ने पॉलीहाउस तकनीक अपनाकर न केवल जोखिम कम किया है, बल्कि अपनी आय को भी कई गुना बढ़ा लिया है। उनकी सफलता अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बनती जा रही है।
शाकिर खान ने संरक्षित खेती यानी पॉलीहाउस तकनीक के तहत खीरे की खेती शुरू की। यह तकनीक खेती को एक नियंत्रित वातावरण में करने का अवसर देती है, जिसमें तापमान, नमी और कीट–रोगों पर बेहतर नियंत्रण संभव होता है। शाकिर बताते हैं कि पॉलीहाउस में खेती करने से फसल को बाहरी मौसम के उतार–चढ़ाव का कम असर पड़ता है, जिससे उत्पादन स्थिर और गुणवत्तापूर्ण रहता है।
वे बताते हैं कि एक बीघा क्षेत्र में खीरे की फसल से करीब 6 महीने के भीतर लगभग 6 लाख रुपये तक की आय हो जाती है। यह आम खेती की तुलना में कई गुना अधिक है। शाकिर खान का कहना है कि यदि बाजार में दाम बेहतर मिलें, तो यही आय बढ़कर 10 से 12 लाख रुपये तक भी पहुंच सकती है। यह कमाई इस बात को दर्शाती है कि यदि सही तकनीक और प्रबंधन अपनाया जाए, तो कम जमीन में भी अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है।
खेती के दौरान शाकिर खान बूंद–बूंद सिंचाई यानी ड्रिप इरिगेशन का उपयोग करते हैं, जिससे पानी की बचत होती है और पौधों को जरूरी मात्रा में ही नमी मिलती है। इसके साथ ही वे आधुनिक कृषि दवाओं का भी संतुलित उपयोग करते हैं, जिससे फसल को थ्रिप्स और ब्लाइट जैसे खतरनाक रोगों से बचाया जा सके। उनका मानना है कि पॉलीहाउस में रोगों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है और बाजार में अच्छा भाव मिलता है।
बाजार की स्थिति पर बात करते हुए शाकिर बताते हैं कि वर्तमान में स्थानीय मंडियों में खीरे का भाव 20 से 25 रुपये प्रति किलो के बीच चल रहा है। हालांकि, कई बार मांग बढ़ने पर यही कीमत 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। ऐसे समय में किसानों को भारी मुनाफा होता है। शाकिर कहते हैं कि अगर पूरे सीजन में अच्छे दाम मिलते रहें, तो एक ही फसल से किसान लाखों रुपये की कमाई आसानी से कर सकता है।
उनकी सफलता का असर अब क्षेत्र के अन्य किसानों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कई किसान पारंपरिक खेती से हटकर अब संरक्षित खेती की ओर रुख कर रहे हैं। खासकर युवा किसान इस तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं, क्योंकि इसमें कम जोखिम और अधिक मुनाफे की संभावना होती है।
हालांकि, शाकिर खान यह भी मानते हैं कि पॉलीहाउस लगाने में शुरुआती लागत अधिक होती है, लेकिन सरकार की योजनाओं और सब्सिडी का लाभ लेकर इस लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एक बार पॉलीहाउस तैयार हो जाने के बाद, नियमित देखभाल और सही प्रबंधन से कई वर्षों तक इसका लाभ लिया जा सकता है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि आने वाले समय में संरक्षित खेती भारतीय कृषि का अहम हिस्सा बनने जा रही है। बदलते जलवायु परिदृश्य और सीमित संसाधनों के बीच यह तकनीक किसानों के लिए एक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प साबित हो सकती है।
अंततः, शाकिर खान की सफलता यह साबित करती है कि यदि किसान नई तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार हों, तो खेती को घाटे का सौदा नहीं बल्कि एक लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है। उनकी कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आधुनिक खेती के जरिए गांवों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सकता है।

