भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातकों में शामिल है और हर साल यहां से लाखों टन चावल विदेशों में भेजा जाता है। भारत का चावल एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल ही में चीन द्वारा उठाए गए एक कदम ने भारतीय चावल निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। चीन ने भारत से भेजे गए कुछ चावल के कंसाइनमेंट को यह कहकर रोक दिया कि उसमें GMO यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड चावल होने की आशंका है।
GMO का मतलब होता है ऐसा चावल या फसल, जिसमें वैज्ञानिक तकनीक के जरिए जीन में बदलाव किया गया हो। कई देशों में GMO फसलों को लेकर सख्त नियम हैं और चीन भी उनमें से एक है। ऐसे में चीन द्वारा भारतीय चावल को रोकना एक बड़ा मुद्दा बन गया है, क्योंकि इससे व्यापारिक संबंधों पर असर पड़ सकता है और निर्यातकों को आर्थिक नुकसान भी हो सकता है।
इस पूरे मामले में भारत की प्रमुख निर्यात संवर्धन संस्था APEDA (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority) सक्रिय हो गई है। APEDA अब चीन के अधिकारियों से बातचीत करने की तैयारी कर रही है। संस्था का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि भारत से भेजा गया चावल पूरी तरह सुरक्षित है और उसमें किसी प्रकार का GMO नहीं है। APEDA इस मुद्दे को कूटनीतिक और तकनीकी स्तर पर सुलझाने की कोशिश कर रही है ताकि निर्यात पर कोई बड़ा असर न पड़े।
वहीं, भारत सरकार ने भी इस मामले पर अपना रुख साफ कर दिया है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि देश में GMO चावल की खेती को अनुमति नहीं दी गई है। मंत्रालय ने इस संबंध में एक आधिकारिक पत्र जारी कर APEDA को सौंपा है, ताकि इसे चीन के सामने प्रमाण के रूप में पेश किया जा सके।
इसके अलावा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भी यह पुष्टि की है कि भारत में अभी तक GMO चावल को न तो मंजूरी दी गई है और न ही इसकी व्यावसायिक खेती होती है। ICAR देश की सबसे बड़ी कृषि शोध संस्था है, जो फसलों के विकास और नई तकनीकों पर काम करती है। ऐसे में ICAR का बयान इस मामले में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
GMO फसलों को लेकर अंतिम मंजूरी देने वाली संस्था Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC) ने भी अब तक किसी भी प्रकार के GMO चावल को अनुमति नहीं दी है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत में जो चावल उगाया और निर्यात किया जा रहा है, वह पूरी तरह non-GMO है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद तकनीकी जांच और प्रमाणों के आधार पर जल्द सुलझ सकता है, लेकिन अगर यह लंबा खिंचता है तो भारतीय चावल निर्यातकों के लिए परेशानी बढ़ सकती है। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों की कोशिश है कि चीन को जल्द से जल्द संतुष्ट किया जाए और निर्यात में कोई बाधा न आए।

