उत्तर प्रदेश में खरीफ सीजन को ध्यान में रखते हुए सरकार ने हरी खाद को बढ़ावा देने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। इसी कड़ी में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के प्रसार निदेशालय द्वारा किसानों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। लाल बहादुर सभागार में आयोजित इस बैठक में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को आधुनिक और वैज्ञानिक खेती के तरीके समझाए।
कार्यक्रम में निदेशक प्रसार डॉ. वी.के. त्रिपाठी ने किसानों को हरी खाद के महत्व के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि किसान ढैंचा की बुवाई 30 से 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से करें और समय-समय पर सिंचाई करते रहें। उन्होंने बताया कि ढैंचा की फसल को 35 से 40 दिन के भीतर मिट्टी में मिला देने से खेत को भरपूर पोषण मिलता है।
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, ढैंचा को खेत में मिलाने पर प्रति हेक्टेयर 84 से 129 किलोग्राम नाइट्रोजन प्राप्त होती है। इसके अलावा 20 से 25 टन तक हरा जैविक पदार्थ भी मिट्टी में जुड़ता है, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ती है। इससे किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है और उत्पादन लागत में कमी आती है। साथ ही, फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डॉ. यू.एन. शुक्ला ने किसानों को धान की नर्सरी प्रबंधन के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अच्छी नर्सरी तैयार करना बेहतर उत्पादन की पहली सीढ़ी है, इसलिए किसानों को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
ढैंचा को एक प्रमुख हरी खाद वाली फसल माना जाता है। इसे खेत में बोकर कुछ समय बाद जुताई के जरिए मिट्टी में मिला दिया जाता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है और नाइट्रोजन प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होती है। धान, गन्ना, मक्का जैसी खरीफ फसलों से पहले ढैंचा बोने से मिट्टी की सेहत सुधरती है और अगली फसल की पैदावार में भी वृद्धि होती है।
सरकार का मुख्य उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करना और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना है। लगातार रासायनिक खाद के इस्तेमाल से कई क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी को पुनः उपजाऊ बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
राज्य के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी इस दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई है। उनका कहना है कि सरकार किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित कर रही है, ताकि मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहे। ढैंचा जैसे हरी खाद के उपयोग से न केवल मिट्टी को पोषण मिलता है, बल्कि मुख्य फसल की पैदावार भी बेहतर होती है।
