राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस 2026 के अवसर पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने स्वदेशी चिकित्सा अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए तीन अत्याधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकियों को उद्योग भागीदारों को हस्तांतरित किया। यह तकनीकी हस्तांतरण नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम “विज्ञान-टेक” के दौरान किया गया।
यह कार्यक्रम भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय द्वारा जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि इसमें 14 वैज्ञानिक मंत्रालयों और विभागों ने भाग लेकर भारत की वैज्ञानिक उत्कृष्टता और तकनीकी प्रगति को एक साझा मंच पर प्रदर्शित किया।
कार्यक्रम में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और विभिन्न नवप्रवर्तकों एवं वैज्ञानिकों से बातचीत की। इस अवसर पर भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद तथा स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव एवं ICMR के महानिदेशक राजीव बहल भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान ICMR ने स्वास्थ्य, जैव-फार्मा और हरित रसायन क्षेत्रों से जुड़ी छह उच्च प्रभाव वाली स्वदेशी तकनीकों का प्रदर्शन किया। इनमें कोवैक्सिन, कोविड कवच एलिसा किट, CRISPR-Cas आधारित टीबी पहचान प्रणाली, निपाह वायरस प्वाइंट-ऑफ-केयर एसे, डेंगू जांच एलिसा किट और मच्छर नियंत्रण के लिए बायोलार्विसाइड शामिल थे। इन तकनीकों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक क्षमता को प्रदर्शित किया।
इसके साथ ही, कार्यक्रम के आधिकारिक संकलन में ICMR के विभिन्न संस्थानों द्वारा विकसित 25 नवाचारों और उभरती तकनीकों को भी शामिल किया गया। इन नवाचारों में डायग्नोस्टिक्स, डिजिटल हेल्थ, चिकित्सा उपकरण, रोग निगरानी और आनुवंशिक अनुसंधान जैसे क्षेत्र प्रमुख रहे।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण ICMR द्वारा विकसित तीन चिकित्सा प्रौद्योगिकियों का उद्योग जगत को हस्तांतरण रहा। यह हस्तांतरण ICMR की “मेडिकल इनोवेशन पेटेंट मित्र” पहल के अंतर्गत लाइसेंसिंग समझौतों के जरिए किया गया।
पहली तकनीक प्रोस्टेट कैंसर जांच से संबंधित है। “पीएसए 20 ng/ml से कम वाले मरीजों में प्रोस्टेट बायोप्सी निर्णय में सहायता के लिए किफायती PSP94 ELISA” तकनीक को आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन वीमेन्स हेल्थ की वैज्ञानिक टीम—धनश्री जगताप, स्मिता महाले और भक्ति पाठक—ने विकसित किया। इस तकनीक का लाइसेंस Krishgen Labs Pvt. Ltd. को प्रदान किया गया।
दूसरी तकनीक “फैक्टर VIII इनहिबिटर/कोगुलेशन डिसऑर्डर पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक” से संबंधित है, जिसे आईसीएमआर-नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन ब्लड एंड इम्यून डिसऑर्डर्स की वैज्ञानिक रुचा पाटिल ने विकसित किया। यह तकनीक रक्त जमाव संबंधी विकारों की त्वरित जांच में सहायक होगी। इसका लाइसेंस Meril Life Sciences को दिया गया।
तीसरी तकनीक “डेंगू, चिकनगुनिया और जीका वायरस की पहचान के लिए सिंगल-ट्यूब मल्टीप्लेक्स रियल-टाइम RT-PCR” है। इसे आईसीएमआर-राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान में डॉ. अलागारासु द्वारा विकसित किया गया। इस तकनीक का लाइसेंस Vanguard Life Sciences को सौंपा गया।
विशेषज्ञों के अनुसार ये तकनीकें देश में सस्ती, तेज और सटीक चिकित्सा जांच सेवाओं को बढ़ावा देंगी। साथ ही स्वदेशी स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी निर्माण को मजबूती मिलेगी।
ICMR ने कहा कि इन तकनीकों का सफल हस्तांतरण सार्वजनिक धन से विकसित अनुसंधानों को व्यावसायिक उपयोग तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल बौद्धिक संपदा संरक्षण, उद्योग-अनुकूल नवाचार और “मेक इन इंडिया” के विजन को मजबूत करती है।
“विज्ञान-टेक” कार्यक्रम ने सरकार, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराया। इस आयोजन ने स्पष्ट किया कि भारत अब केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैज्ञानिक नवाचारों को समाज और उद्योग तक पहुंचाकर आत्मनिर्भर स्वास्थ्य व्यवस्था की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

