EU Pesticide MRL Rules 2026 को लेकर भारतीय कृषि निर्यात क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। 16 दिसंबर 2025 को European Commission ने “फूड एंड फीड ओम्निबस” नाम से एक ड्राफ्ट प्रस्ताव जारी किया, जिसमें पेस्टिसाइड्स के मैक्सिमम रेसिड्यू लेवल (MRLs) से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है।
इस प्रस्ताव के तहत यूरोपियन यूनियन उन पेस्टिसाइड्स के लिए रेसिड्यू लिमिट को 0.01 ppm यानी लगभग “जीरो टॉलरेंस” स्तर पर लाना चाहता है, जो EU में मंजूर नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का भारत के कृषि निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। FY 2024-25 में भारत का EU को कृषि निर्यात लगभग 5 बिलियन डॉलर आंका गया था।
क्या है EU का नया प्रस्ताव?
World Trade Organization को 29 जनवरी 2026 को नोटिफाई किए गए इस प्रस्ताव में कहा गया है कि गैर-EU स्वीकृत पेस्टिसाइड्स के लिए इंपोर्ट टॉलरेंस MRL को खत्म किया जा सकता है।
सरल भाषा में समझें तो यदि किसी पेस्टिसाइड का उपयोग भारत जैसे देशों में कानूनी रूप से हो रहा है, लेकिन वह EU में स्वीकृत नहीं है, तो उसके अवशेष वाले कृषि उत्पादों को यूरोप में प्रवेश नहीं मिल सकता।
विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भारतीय किसानों और निर्यातकों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है, क्योंकि उन्हें केवल उन्हीं पेस्टिसाइड्स का उपयोग करना पड़ेगा जो यूरोपियन यूनियन में मंजूर हैं।
क्या होता है MRL?
MRL यानी Maximum Residue Level किसी खाद्य या कृषि उत्पाद में मौजूद पेस्टिसाइड अवशेष की अधिकतम स्वीकार्य सीमा होती है। इसे ppm (Parts Per Million) में मापा जाता है।
इंपोर्ट टॉलरेंस MRL वह सीमा होती है जिसे आयात करने वाला देश उन पेस्टिसाइड्स के लिए तय करता है जो उसके यहां रजिस्टर्ड नहीं हैं लेकिन निर्यातक देशों में उपयोग किए जाते हैं।
क्यों बढ़ रहा विवाद?
विशेषज्ञों का कहना है कि EU Pesticide MRL Rules 2026 WTO के SPS (Sanitary and Phytosanitary) एग्रीमेंट के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकते हैं।
WTO नियमों के अनुसार किसी भी खाद्य सुरक्षा उपाय को वैज्ञानिक रिस्क असेसमेंट पर आधारित होना चाहिए। लेकिन आलोचकों का आरोप है कि EU का 0.01 ppm नियम वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन के बजाय केवल तकनीकी डिटेक्शन लिमिट पर आधारित है।
विशेषज्ञों के मुताबिक 0.01 ppm का स्तर इतना कम है कि 100 टन खाद्य सामग्री में केवल 1 ग्राम पेस्टिसाइड अवशेष होने पर भी उत्पाद को अस्वीकार किया जा सकता है।
भारतीय किसानों पर क्या असर पड़ेगा?
यदि यह नियम लागू होता है तो भारतीय किसानों को कई मौजूदा पेस्टिसाइड्स का उपयोग बंद करना पड़ सकता है।
इसका असर खासतौर पर इन फसलों पर पड़ सकता है:
- चाय
- मसाले
- अंगूर
- चावल
- फल और सब्जियां
- कपास
- दालें
कई भारतीय कृषि उत्पाद वर्तमान में EU बाजार में मजबूत स्थिति रखते हैं। ऐसे में नए नियमों से निर्यात लागत बढ़ सकती है और किसानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर हो सकती है।
WTO नियमों पर उठे सवाल
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव WTO के “Most Favoured Nation” और “National Treatment” सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है।
आलोचकों के अनुसार यह कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर “छिपी हुई रोक” जैसा है, जिसका उद्देश्य घरेलू यूरोपीय कृषि उत्पादकों को बाहरी प्रतिस्पर्धा से बचाना हो सकता है।
इसके अलावा, विशेषज्ञों ने वियना कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ ट्रीटीज (VCLT) के आर्टिकल 27 का भी हवाला दिया है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी देश अपने घरेलू कानूनों का उपयोग अंतरराष्ट्रीय संधि की जिम्मेदारियों से बचने के लिए नहीं कर सकता।
इंडिया-EU FTA पर भी असर
भारत और European Union के बीच चल रही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) वार्ताओं पर भी इस प्रस्ताव का असर पड़ सकता है।
FTA के तहत दोनों पक्षों ने व्यापार को आसान बनाने और SPS उपायों को वैज्ञानिक आधार पर लागू करने का वादा किया है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यदि EU इंपोर्ट टॉलरेंस को खत्म करता है, तो यह FTA की भावना के खिलाफ होगा।
क्या है विशेषज्ञों की राय
कृषि व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इस मुद्दे को तुरंत यूरोपियन अधिकारियों और WTO मंच पर उठाना चाहिए।
उनका मानना है कि भारत सहित अन्य गैर-EU देशों को मिलकर इस प्रस्ताव का विरोध करना चाहिए, ताकि वैश्विक कृषि व्यापार में संतुलन बना रहे।
क्या हो सकता है आगे?
यदि EU यह नियम लागू करता है, तो भारतीय कृषि निर्यातकों को नई परीक्षण प्रक्रियाओं, पेस्टिसाइड बदलाव और उत्पादन लागत में वृद्धि जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत वैज्ञानिक आधार पर अपनी बात मजबूत तरीके से रखकर WTO स्तर पर इस फैसले को चुनौती दे सकता है।
EU Pesticide MRL Rules 2026 आने वाले समय में वैश्विक कृषि व्यापार और भारतीय किसानों दोनों के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है। ऐसे में सरकार, निर्यातक संगठनों और कृषि वैज्ञानिकों के बीच समन्वय बेहद जरूरी माना जा रहा है।

