आईसीएआर–सेंट्रल कोस्टल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CCARI), गोवा द्वारा 10वीं अनुसंधान सलाहकार समिति (Research Advisory Committee-RAC) की तीसरी बैठक के तहत एक महत्वपूर्ण हितधारक परामर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस बैठक में वैज्ञानिकों, किसानों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सरकारी विभागों, वित्तीय संस्थानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े विभिन्न हितधारकों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य तटीय क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि विकास, जलवायु अनुकूल खेती और किसान-केंद्रित नवाचारों को बढ़ावा देना था।
इस अवसर पर विभिन्न विशेषज्ञों और वक्ताओं ने तटीय कृषि से जुड़ी चुनौतियों, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, मत्स्य पालन, पशुपालन, कृषि आधारित उद्यमिता और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। बैठक में विज्ञान आधारित कृषि परिवर्तन के जरिए “विकसित गोवा” और “विकसित भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने पर विशेष जोर दिया गया।
टिकाऊ तटीय कृषि पर जोर
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रसिद्ध समाजसेवी और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती सुलक्षणा सावंत ने आईसीएआर-सीसीएआरआई द्वारा तटीय कृषि के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में तटीय क्षेत्रों के किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, ऐसे में वैज्ञानिक तकनीकों और टिकाऊ कृषि प्रणालियों को अपनाना बेहद आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा विकसित जलवायु-अनुकूल तकनीकें, एकीकृत कृषि प्रणाली और किसान-केंद्रित नवाचार किसानों की आय बढ़ाने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद कर रहे हैं। उन्होंने वैज्ञानिक संस्थानों, सरकारी विभागों और किसानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि नई तकनीकों का लाभ सीधे किसानों तक पहुंच सके।
प्राकृतिक खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग की अपील
श्रीमती सावंत ने किसानों से संतुलित उर्वरक उपयोग और प्राकृतिक खेती पद्धतियों को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जबकि प्राकृतिक खेती से पर्यावरण संरक्षण और कृषि लागत में कमी दोनों संभव हैं।
उन्होंने भौगोलिक संकेतक (GI Tagging) के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि स्थानीय कृषि उत्पादों को GI टैग मिलने से उनकी पहचान और बाजार मूल्य दोनों बढ़ते हैं। इससे किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिल सकता है।
उन्होंने युवाओं से कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और संबद्ध क्षेत्रों में नए अवसर तलाशने का आह्वान किया। उनके अनुसार, आधुनिक तकनीकों और नवाचारों के जरिए कृषि क्षेत्र युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता का बड़ा माध्यम बन सकता है।
आईसीएआर-सीसीएआरआई की उपलब्धियों पर प्रकाश
कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. परवीन कुमार ने स्वागत भाषण देते हुए आईसीएआर-सीसीएआरआई द्वारा संचालित अनुसंधान और विस्तार गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्थान तटीय कृषि विकास और किसानों के कल्याण के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
उन्होंने बताया कि संस्थान जलवायु-अनुकूल खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और कृषि आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न तकनीकों और मॉडलों पर काम कर रहा है। इसके साथ ही किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और नई कृषि पद्धतियों की जानकारी भी दी जा रही है।
डॉ. कुमार ने कहा कि तटीय क्षेत्रों में कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।
किसान-केंद्रित अनुसंधान की आवश्यकता
अनुसंधान सलाहकार समिति (RAC) के अध्यक्ष डॉ. एस.डी. सावंत ने संस्थान की उपलब्धियों की सराहना करते हुए किसान-केंद्रित और आवश्यकता आधारित अनुसंधान पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृषि अनुसंधान तभी सफल माना जाएगा जब उसका सीधा लाभ किसानों तक पहुंचे।
उन्होंने हितधारकों की सक्रिय भागीदारी को कृषि तकनीकों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझकर तैयार की गई तकनीकें ज्यादा प्रभावी साबित होती हैं।
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों पर चर्चा
बैठक में मौजूद RAC सदस्यों ने जलवायु परिवर्तन और घटती कृषि उत्पादकता को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि तटीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक आपदाओं का कृषि पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
विशेषज्ञों ने जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों के विकास, कृषि यंत्रीकरण, मूल्य संवर्धन और फसल कटाई के बाद प्रबंधन (पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट) को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना है कि इन उपायों से किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को लाभकारी बनाने में मदद मिलेगी।
विभिन्न विषयों पर व्यापक चर्चा
कार्यक्रम के दौरान टिकाऊ तटीय कृषि, जलवायु अनुकूलन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, मत्स्य पालन, पशुपालन, जैव विविधता संरक्षण, कृषि-पर्यटन (Agro-Ecotourism), उद्यमिता विकास और कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि को केवल खेती तक सीमित न रखकर उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों को भी विकसित करना होगा। मत्स्य पालन, पशुपालन और कृषि-पर्यटन जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएं मौजूद हैं, जो किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सहयोग बढ़ाने पर जोर
बैठक का एक प्रमुख उद्देश्य वैज्ञानिक संस्थानों, सरकारी विभागों, वित्तीय एजेंसियों और किसानों के बीच सहयोग को मजबूत करना भी था। विशेषज्ञों ने माना कि यदि सभी संबंधित संस्थाएं मिलकर काम करें तो कृषि क्षेत्र में अधिक प्रभावी और स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।
कार्यक्रम में नाबार्ड, गोवा चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (GCCI), गोवा स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड, गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट तथा कृषि, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं पशु चिकित्सा विभागों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
किसानों और समूहों की सक्रिय भागीदारी
इस कार्यक्रम में गोवा के विभिन्न हिस्सों से लगभग 80 हितधारकों ने भाग लिया। इनमें किसान, स्वयं सहायता समूह, एफपीओ प्रतिनिधि, वैज्ञानिक और विभिन्न विभागों के अधिकारी शामिल थे।
प्रतिभागियों ने संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों और योजनाओं में गहरी रुचि दिखाई। किसानों ने अपनी समस्याएं और सुझाव भी साझा किए, जिससे वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को जमीनी स्तर की चुनौतियों को समझने का अवसर मिला।
विकसित गोवा और विकसित भारत की दिशा में पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि विज्ञान आधारित कृषि परिवर्तन और टिकाऊ खेती मॉडल ही भविष्य में ग्रामीण विकास और किसानों की समृद्धि का आधार बनेंगे। आईसीएआर-सीसीएआरआई द्वारा आयोजित यह परामर्श बैठक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है।
कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि यदि वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और किसानों की भागीदारी को एक साथ जोड़ा जाए तो तटीय कृषि को अधिक मजबूत, लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है।


