पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध तनाव का असर अब भारत की खेती और किसानों पर भी दिखाई देने लगा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आगामी खरीफ सीजन में भारत को DAP और यूरिया जैसे प्रमुख उर्वरकों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देशों में से एक है और यहां खेती काफी हद तक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर करती है। धान, मक्का, गन्ना, कपास, सोयाबीन और दालों जैसी प्रमुख फसलों के लिए यूरिया और DAP बेहद जरूरी माने जाते हैं। ऐसे में वैश्विक तनाव के कारण उर्वरकों की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
क्यों बढ़ा खाद संकट का खतरा?
दरअसल भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। DAP बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला रॉक फास्फेट और फॉस्फोरिक एसिड मुख्य रूप से दूसरे देशों से आता है। वहीं यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है, जिसकी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट देशों से जुड़ा हुआ है।
मौजूदा समय में ईरान और पश्चिम एशिया क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री व्यापार मार्गों पर दबाव बढ़ गया है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यही मार्ग दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस सप्लाई का प्रमुख रास्ता माना जाता है।
यदि इस क्षेत्र में युद्ध और गहराता है तो LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। गैस महंगी होने से यूरिया उत्पादन लागत बढ़ेगी और कई देशों में उत्पादन कम हो सकता है। इसका असर सीधे भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जो बड़े पैमाने पर उर्वरकों का आयात करते हैं।
खरीफ सीजन पर पड़ सकता है बड़ा असर
भारत में खरीफ सीजन जून से शुरू होकर सितंबर तक चलता है। इस दौरान सबसे ज्यादा उर्वरकों की मांग रहती है। धान की खेती में यूरिया और DAP का उपयोग बड़े स्तर पर किया जाता है। यदि समय पर खाद उपलब्ध नहीं हुई तो बुवाई और फसल विकास दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसानों को समय पर DAP और यूरिया नहीं मिला तो फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ेगा। कई बार किसान मजबूरी में महंगे दामों पर खाद खरीदते हैं या जरूरत से कम मात्रा में उपयोग करते हैं, जिससे उत्पादन घट जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में खाद की कमी के चलते लंबी-लंबी लाइनें देखने को मिली थीं। कई जगहों पर किसानों को घंटों इंतजार करना पड़ा था। इस बार भी यदि वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो ऐसी स्थिति दोबारा बन सकती है।
बढ़ सकती हैं उर्वरकों की कीमतें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतें पहले ही बढ़ने लगी हैं। युद्ध के कारण शिपिंग लागत और बीमा खर्च भी बढ़ जाता है। इसका सीधा असर उर्वरकों की कीमतों पर पड़ता है।
भारत सरकार किसानों को सब्सिडी देकर कम कीमत पर खाद उपलब्ध कराती है, लेकिन यदि आयात लागत लगातार बढ़ती रही तो सरकार पर आर्थिक दबाव भी बढ़ेगा। इससे आने वाले समय में उर्वरकों की उपलब्धता और वितरण दोनों चुनौती बन सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध लंबे समय तक चलता है तो DAP और यूरिया दोनों की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे खेती की लागत बढ़ेगी और किसानों की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ सकता है।
किसानों के लिए क्या है सलाह?
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को अभी से सतर्क रहने और वैकल्पिक उपाय अपनाने की सलाह दी है। उनका कहना है कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाना जरूरी है।
गोबर खाद और जैविक खाद पर दें ध्यान
विशेषज्ञों के अनुसार गोबर खाद, कम्पोस्ट और जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती हैं। इनके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम की जा सकती है। लंबे समय तक जैविक खाद का उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में भी मददगार माना जाता है।
नैनो यूरिया बन सकता है विकल्प
सरकार और कृषि वैज्ञानिक लगातार नैनो यूरिया को बढ़ावा दे रहे हैं। यह पारंपरिक यूरिया की तुलना में कम मात्रा में इस्तेमाल होता है और फसलों को जरूरी पोषण उपलब्ध कराने में मदद करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नैनो यूरिया का संतुलित उपयोग किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
जरूरत के अनुसार ही करें खाद का उपयोग
कई किसान बिना मिट्टी जांच के जरूरत से ज्यादा खाद का इस्तेमाल करते हैं। इससे लागत बढ़ती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। कृषि विभाग किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करने की सलाह दे रहा है।
अभी से करें तैयारी
विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को अभी से अपनी खरीफ तैयारी मजबूत करनी चाहिए। समय रहते खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करना, वैकल्पिक उर्वरकों की जानकारी लेना और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाना आने वाले समय में काफी मददगार साबित हो सकता है।
सरकार की बढ़ी चिंता
उर्वरक संकट की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार भी लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। सरकार आयात बढ़ाने और घरेलू उत्पादन मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। कई सरकारी एजेंसियों को समय रहते उर्वरकों की खरीद और वितरण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो वैश्विक उर्वरक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। इसका असर भारत सहित कई कृषि प्रधान देशों पर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध तनाव ने भारतीय किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खरीफ सीजन से पहले DAP और यूरिया संकट की आशंका खेती के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे अभी से सतर्क रहें और संतुलित खेती के विकल्पों को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाएं।

