खरीफ 2026 सीजन की तैयारियों के बीच कर्नाटक में उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच आंकड़ों का बड़ा अंतर सामने आया है। एक तरफ केंद्र सरकार का दावा है कि राज्य में किसानों की जरूरतों के अनुसार पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक सरकार के कृषि विभाग के आंकड़े कई प्रमुख उर्वरकों में भारी कमी की ओर इशारा कर रहे हैं। इस विरोधाभास ने किसानों, कृषि अधिकारियों और नीति निर्माताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है।
राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में खरीफ सीजन से पहले कुल उर्वरक उपलब्धता और मांग के बीच लगभग 45 प्रतिशत का अंतर है। यह स्थिति विशेष रूप से डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), यूरिया और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के मामले में गंभीर बताई जा रही है। पिछले सप्ताह उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कृषि विभाग के अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक में उर्वरक आपूर्ति की स्थिति का आकलन किया, जिसमें कई चिंताजनक तथ्य सामने आए।
कृषि विभाग के अनुसार, अप्रैल से जून 2026 के बीच राज्य में DAP की कुल मांग लगभग 2.4 लाख टन आंकी गई थी। इसके मुकाबले राज्य को केवल 87,000 टन DAP की आपूर्ति मिली, जिससे लगभग 64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। DAP फसलों के शुरुआती विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उर्वरक माना जाता है और इसकी कमी किसानों की बुआई योजनाओं को प्रभावित कर सकती है।
यूरिया की स्थिति भी राज्य सरकार के आंकड़ों में चिंताजनक दिखाई गई है। विभाग के अनुसार, खरीफ सीजन के लिए लगभग 4.6 लाख टन यूरिया की आवश्यकता थी, जबकि केवल 2.9 लाख टन की आपूर्ति हुई। इस प्रकार यूरिया में लगभग 38 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यूरिया देश में सबसे अधिक उपयोग होने वाला नाइट्रोजन आधारित उर्वरक है और इसकी उपलब्धता सीधे फसल उत्पादन से जुड़ी होती है।
इसी प्रकार कॉम्प्लेक्स उर्वरकों, विशेष रूप से NPKS श्रेणी के उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई गई है। राज्य सरकार के अनुसार, इन उर्वरकों की मांग 5.8 लाख टन थी, जबकि केवल 3.4 लाख टन की आपूर्ति हुई, जिससे लगभग 41 प्रतिशत की कमी सामने आई। NPKS उर्वरकों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे आवश्यक पोषक तत्व शामिल होते हैं, जो संतुलित पोषण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी ओर, केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किए गए आंकड़ों में दावा किया कि कर्नाटक में उर्वरकों की कोई गंभीर कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि 10 जून तक राज्य की DAP आवश्यकता लगभग 1.9 लाख टन थी, जबकि 2.6 लाख टन उपलब्ध कराया गया। इसके अलावा, 3.1 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक भी मौजूद था।
जोशी ने कॉम्प्लेक्स उर्वरकों को लेकर भी सकारात्मक तस्वीर पेश की। उनके अनुसार, 4.4 लाख टन की प्रोराटा आवश्यकता के मुकाबले 9.3 लाख टन की व्यवस्था की गई थी और बिक्री के बाद भी ट्रांजिट स्टॉक सहित 5.6 लाख टन से अधिक उर्वरक उपलब्ध थे। केंद्र सरकार का दावा है कि किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद है और आपूर्ति व्यवस्था लगातार जारी है।
राज्य और केंद्र के आंकड़ों में इस बड़े अंतर को लेकर कृषि विभाग के अधिकारियों ने एक महत्वपूर्ण कारण बताया है। अधिकारियों के अनुसार, केंद्र सरकार ने इस वर्ष उर्वरक उपलब्धता के आकलन में ओपनिंग स्टॉक यानी पिछले वर्ष से बचा हुआ भंडार भी शामिल कर लिया है। राज्य सरकार का कहना है कि पहले ऐसे स्टॉक को नई आपूर्ति का हिस्सा नहीं माना जाता था, बल्कि इसे आपातकालीन स्थिति के लिए बफर स्टॉक के रूप में रखा जाता था।
अधिकारियों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के कारण इस वर्ष लगभग 1.1 लाख टन के ओपनिंग स्टॉक को भी उपलब्धता के आंकड़ों में जोड़ दिया गया। इसी वजह से केंद्र और राज्य के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
उधर, उर्वरकों की संभावित कमी की खबरों के बीच कुछ क्षेत्रों में जमाखोरी की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यदि उपलब्धता को लेकर भ्रम बना रहा तो किसानों और व्यापारियों के बीच घबराहट बढ़ सकती है, जिससे वितरण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
समीक्षा बैठक के दौरान डी.के. शिवकुमार ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि उर्वरक कमी के लिए अंतरराष्ट्रीय युद्ध और संकटों का हवाला दिया जा रहा है। वहीं राज्य सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराया जाए और कृषि कार्यों के लिए आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।
खरीफ सीजन देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में उर्वरकों की वास्तविक उपलब्धता और मांग के आंकड़ों में स्पष्टता लाना आवश्यक है, ताकि किसानों को समय पर आवश्यक कृषि इनपुट मिल सकें और फसल उत्पादन प्रभावित न हो।

