देश की ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय अधिकार, बेहतर संसाधन और मजबूत स्थानीय शासन व्यवस्था उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। पंचायती राज मंत्रालय ने नई दिल्ली में राज्यों के पंचायती राज मंत्रियों की राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित कर सोलहवें वित्त आयोग (2026-31) की सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर व्यापक चर्चा की। कार्यशाला का उद्देश्य पंचायतों को मिलने वाले रिकॉर्ड वित्तीय आवंटन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना, वित्तीय विकेंद्रीकरण को मजबूत करना तथा ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर और जवाबदेह संस्थाओं के रूप में विकसित करना रहा।
कार्यशाला की अध्यक्षता केंद्रीय पंचायती राज एवं मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने की, जबकि केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल, पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज, विभिन्न राज्यों के पंचायती राज मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी तथा नीति विशेषज्ञ भी इसमें शामिल हुए।
पंचायतों को मिलेंगे 4.35 लाख करोड़ रुपये
सोलहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए ग्रामीण स्थानीय निकायों को 4,35,236 करोड़ रुपये देने की सिफारिश की है। यह राशि पंद्रहवें वित्त आयोग के दौरान आवंटित 2,36,805 करोड़ रुपये की तुलना में लगभग 84 प्रतिशत अधिक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय आवंटन है, जिससे देशभर की ग्राम पंचायतों में आधारभूत सुविधाओं, स्वच्छता, पेयजल, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और स्थानीय विकास योजनाओं को नई गति मिलेगी।
‘विकसित पंचायत ही विकसित भारत की नींव’
कार्यशाला को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि “विकसित पंचायत, विकसित भारत की आधारशिला है।” उन्होंने कहा कि वित्त आयोग द्वारा पंचायतों के लिए बढ़ाया गया आवंटन केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि जमीनी लोकतंत्र को मजबूत करने का ऐतिहासिक अवसर है।
उन्होंने राज्यों से आग्रह किया कि वे वर्ष 2026-31 की कार्यान्वयन अवधि के लिए अभी से तैयारी शुरू करें और वित्त मंत्रालय द्वारा जारी परिचालन दिशानिर्देशों के अनुरूप योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करें।
स्वयं के राजस्व स्रोत बढ़ाने पर विशेष जोर
केंद्रीय मंत्री ने पंचायतों की वित्तीय आत्मनिर्भरता को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए राज्यों से स्वयं के राजस्व स्रोत (ओएसआर) विकसित करने पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया।
उन्होंने बताया कि पंचायती राज मंत्रालय इस उद्देश्य से मॉडल ओएसआर नियमावली तैयार कर रहा है, जिससे पंचायतें स्थानीय स्तर पर अपने संसाधनों से आय बढ़ा सकें और सरकारी अनुदानों पर उनकी निर्भरता कम हो।
‘समर्थ पंचायत पोर्टल’ बनेगा डिजिटल वित्तीय प्रबंधन का आधार
राजीव रंजन सिंह ने कहा कि मंत्रालय द्वारा विकसित ‘समर्थ पंचायत पोर्टल’ पंचायतों के वित्तीय प्रबंधन को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाएगा।
उन्होंने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से आग्रह किया कि वे जल्द से जल्द इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ें। यह पोर्टल पंचायतों में लेखांकन, वित्तीय लेन-देन, राजस्व संग्रह और विकास कार्यों की निगरानी को अधिक सरल और पारदर्शी बनाएगा।
प्रति व्यक्ति आवंटन अब तक के उच्चतम स्तर पर
कार्यशाला में जानकारी दी गई कि ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए प्रति व्यक्ति वित्तीय आवंटन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
जहां तेरहवें वित्त आयोग (2010-15) के दौरान प्रति व्यक्ति आवंटन केवल 176 रुपये था, वहीं सोलहवें वित्त आयोग (2026-31) में यह बढ़कर 953 रुपये प्रति व्यक्ति हो गया है। इसे पंचायतों के लिए अब तक का सबसे बड़ा प्रति व्यक्ति वित्तीय समर्थन माना जा रहा है।
प्रदर्शन के आधार पर भी मिलेगा अनुदान
सोलहवें वित्त आयोग ने पंचायतों के लिए 87,048 करोड़ रुपये के प्रदर्शन आधारित अनुदान का भी प्रावधान किया है।
इस राशि का आधा हिस्सा पंचायतों के प्रदर्शन के आधार पर तथा शेष आधा राज्यों के प्रदर्शन के आधार पर वितरित किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे पंचायतों में बेहतर वित्तीय प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।
स्वच्छता और जल प्रबंधन को मिलेगा विशेष प्रोत्साहन
कुल आधारभूत अनुदान 3,48,188 करोड़ रुपये रखा गया है, जिसमें से आधी राशि स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और जल संरक्षण जैसी गतिविधियों के लिए आबद्ध (टाइड) अनुदान के रूप में दी जाएगी, जबकि शेष राशि पंचायतें अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार उपयोग कर सकेंगी।
इस व्यवस्था से पंचायतों को विकास योजनाओं में अधिक लचीलापन मिलने की उम्मीद है।
डिजिटल पंचायतों की दिशा में बड़ा कदम
कार्यशाला के दौरान मंत्रालय ने पंचायतों के लिए विकसित किए जा रहे एकीकृत डिजिटल इकोसिस्टम की भी जानकारी दी।
इसमें ई-ग्रामस्वराज, ऑडिटऑनलाइन, पीएफएमएस इंटरफेस, समर्थ पंचायत पोर्टल तथा स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति आंकड़ों के एकीकरण जैसी पहलें शामिल हैं।
इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पंचायतों में योजना निर्माण, लेखांकन, ऑडिट, संपत्ति प्रबंधन तथा स्थानीय राजस्व संग्रह को अधिक प्रभावी बनाया जाएगा।
राज्यों ने रखे महत्वपूर्ण सुझाव
कार्यशाला में 18 राज्यों के पंचायती राज मंत्रियों ने अपने अनुभव साझा किए तथा कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए।
राज्यों ने पर्वतीय, जनजातीय और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए कार्यान्वयन में अधिक लचीलापन देने, वित्त आयोग की राशि समय पर जारी करने, प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन में स्थानीय परिस्थितियों को महत्व देने तथा अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारों के डिजिटल पोर्टलों के बेहतर एकीकरण, पंचायत परिसंपत्तियों के रखरखाव तथा क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को मजबूत बनाने की भी मांग उठाई गई।
राज्य मंत्री ने बताया ऐतिहासिक कदम
केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल ने कहा कि सोलहवें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को मिलने वाला यह आवंटन अब तक का सबसे बड़ा प्रति व्यक्ति वित्तीय सहयोग है।
उन्होंने कहा कि स्वामित्व योजना, ई-ग्रामस्वराज, ऑडिटऑनलाइन और पंचायत उन्नति सूचकांक जैसी योजनाओं ने स्थानीय शासन व्यवस्था को मजबूत किया है। प्रदर्शन आधारित अनुदान पंचायतों में सुशासन और बेहतर वित्तीय अनुशासन को प्रोत्साहित करेंगे।
95 प्रतिशत से अधिक राशि पहले ही जारी कर चुका है मंत्रालय
कार्यशाला में यह भी बताया गया कि पंद्रहवें वित्त आयोग की अवधि के दौरान पंचायती राज मंत्रालय ने 2,97,555 करोड़ रुपये के कुल आवंटन में से लगभग 95 प्रतिशत, यानी 2,82,632 करोड़ रुपये, पंचायतों को जारी कर दिए थे। यह किसी भी वित्त आयोग के तहत अब तक का सबसे अधिक वितरण प्रतिशत है।
देश में 2.62 लाख से अधिक पंचायती राज संस्थाएं
देशभर में वर्तमान समय में 2,62,738 पंचायती राज संस्थाएं कार्यरत हैं। इनमें 2,55,308 ग्राम पंचायतें, 6,756 ब्लॉक पंचायतें तथा 674 जिला पंचायतें शामिल हैं। यदि पारंपरिक स्थानीय निकायों को भी जोड़ दिया जाए तो देश में स्थानीय निकायों की कुल संख्या 2,76,901 हो जाती है।
ग्रामीण विकास को मिलेगी नई दिशा
विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायतों को रिकॉर्ड वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ उन्हें डिजिटल तकनीक, बेहतर वित्तीय प्रबंधन और स्थानीय राजस्व संग्रह से जोड़ने की यह रणनीति ग्रामीण भारत के विकास को नई गति दे सकती है।
यदि राज्य सरकारें समय पर तैयारियां पूरी कर वित्त आयोग की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू करती हैं, तो पंचायतें केवल सरकारी अनुदानों पर निर्भर संस्थाएं नहीं रहेंगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर विकास की मजबूत, आत्मनिर्भर और जवाबदेह इकाइयों के रूप में उभरेंगी। यही पहल विकसित भारत के लक्ष्य को गांवों की मजबूती के साथ जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

