भारत को यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और दूरदर्शी कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी फॉर यूरिया-2026 (NIPU-2026) को मंजूरी दिए जाने का फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने जोरदार स्वागत किया है। संगठन का कहना है कि यह नीति न केवल देश में यूरिया उत्पादन बढ़ाने में मदद करेगी, बल्कि आयात पर निर्भरता कम कर भारतीय किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
FAI के अनुसार, वर्तमान समय में भारत में यूरिया की मांग लगातार बढ़ रही है। हर वर्ष लगभग 5 प्रतिशत की दर से बढ़ती मांग के चलते आने वाले वर्षों में देश की कुल आवश्यकता 40 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) तक पहुंचने का अनुमान है। जबकि वर्तमान घरेलू उत्पादन लगभग 30 मिलियन मीट्रिक टन है। इस अंतर को पूरा करने के लिए भारत को हर वर्ष अपनी कुल आवश्यकता का लगभग 26 प्रतिशत यूरिया आयात करना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण आयातित यूरिया की उपलब्धता कई बार प्रभावित होती रही है, जिससे किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने में चुनौतियां सामने आती हैं।
8–9 नए गैस आधारित संयंत्रों से बढ़ेगा घरेलू उत्पादन
NIPU-2026 के तहत केंद्र सरकार ने 8 से 9 नए गैस आधारित यूरिया संयंत्र स्थापित करने का निर्णय लिया है। इन संयंत्रों के शुरू होने के बाद देश की उत्पादन क्षमता में लगभग 10 मिलियन मीट्रिक टन (1 करोड़ टन) की वृद्धि होगी। इससे भारत की कुल उत्पादन क्षमता लगभग 40 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंच सकती है, जो देश की अनुमानित मांग के बराबर होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत यूरिया आयात पर अपनी निर्भरता काफी हद तक समाप्त कर सकेगा। घरेलू उत्पादन बढ़ने से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और किसानों को समय पर तथा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
निवेशकों के लिए आकर्षक बनाई गई नई नीति
FAI का कहना है कि NIPU-2026 केवल उत्पादन बढ़ाने की योजना नहीं है, बल्कि यह निजी, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र के निवेशकों को आकर्षित करने वाली व्यापक निवेश नीति भी है।
नई नीति के तहत निवेशकों को 12 से 16 प्रतिशत तक सुनिश्चित रिटर्न ऑन इक्विटी (RoE) प्रदान किया जाएगा। इसके अलावा सब्सिडी निर्धारण के लिए स्थिर (Fixed) और परिवर्तनीय (Variable) लागतों को अलग-अलग माना जाएगा, जिससे लागत निर्धारण अधिक पारदर्शी होगा।
एक और महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि संयंत्र स्थापित होने के चार वर्ष बाद स्थिर लागत को भारतीय रुपये (INR) में परिवर्तित कर दिया जाएगा। इससे विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव का जोखिम कम होगा और निवेशकों को वित्तीय स्थिरता मिलेगी।
NIP-2012 की जगह लेगी नई नीति
NIPU-2026, वर्ष 2012 की नेशनल इन्वेस्टमेंट पॉलिसी (NIP-2012) का स्थान लेगी। पिछले एक दशक में ऊर्जा लागत, तकनीकी विकास, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों तथा उर्वरक क्षेत्र की आवश्यकताओं में बड़े बदलाव आए हैं। इन्हीं परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने नई नीति तैयार की है।
नई नीति निवेशकों को स्पष्ट नियामकीय ढांचा उपलब्ध कराती है और परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता को बेहतर बनाती है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुसार, इस नीति के लागू होने से प्रत्येक नए संयंत्र के पूरे जीवनकाल में 250 करोड़ रुपये से अधिक की बचत संभव होगी। इससे सार्वजनिक, निजी और सहकारी क्षेत्र सभी के लिए नए संयंत्र स्थापित करना अधिक लाभकारी बनेगा।
FAI ने बताया दूरदर्शी निर्णय
फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के सह-अध्यक्ष डॉ. सिबा प्रसाद मोहंती ने कहा कि भारत के उर्वरक क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती लगातार बढ़ती मांग और सीमित घरेलू उत्पादन क्षमता के बीच का अंतर है। NIPU-2026 इसी मूल समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है।
उन्होंने कहा कि यह नीति निवेशकों को आवश्यक भरोसा प्रदान करती है और भारत को यूरिया उत्पादन में पूर्ण आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में यह नीति देश के उर्वरक उद्योग में बड़े निवेश को आकर्षित करेगी और उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
विशेषज्ञों के अनुसार इस नीति का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलेगा। वर्तमान में कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति प्रभावित होने या कीमतें बढ़ने से उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होती है। यदि देश में पर्याप्त उत्पादन होगा तो किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध होगा और खेती की लागत तथा उत्पादन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
यूरिया भारतीय कृषि में सबसे अधिक उपयोग होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, कपास, दलहन, तिलहन और अधिकांश सब्जी फसलों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समय पर उपलब्धता सुनिश्चित होने से फसल उत्पादन और उत्पादकता में भी सुधार होगा।
खाद्य सुरक्षा को मिलेगी मजबूती
भारत विश्व के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। बढ़ती आबादी के साथ खाद्यान्न की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
FAI का मानना है कि NIPU-2026 केवल एक औद्योगिक निवेश नीति नहीं बल्कि देश की दीर्घकालिक खाद्य एवं उर्वरक सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से वैश्विक संकट, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और आयात पर निर्भरता जैसी चुनौतियों का प्रभाव काफी कम होगा।
सरकार के प्रयासों की सराहना
फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग की इस पहल की सराहना करते हुए इसे दूरदर्शी और समयानुकूल निर्णय बताया है। संगठन का कहना है कि यह नीति भारतीय कृषि को वैश्विक आपूर्ति संकटों से सुरक्षित रखने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी नई गति देगी।
FAI के अनुसार सरकार द्वारा अपनाई गई यह रणनीति न केवल उर्वरक क्षेत्र में निवेश बढ़ाएगी, बल्कि रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास, ऊर्जा दक्षता और आधुनिक तकनीकों के उपयोग को भी प्रोत्साहित करेगी।
FAI की भूमिका
वर्ष 1955 में स्थापित फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) देश का प्रमुख गैर-लाभकारी संगठन है, जो उर्वरक निर्माताओं, आयातकों, तकनीकी कंपनियों, उपकरण आपूर्तिकर्ताओं तथा कृषि वैज्ञानिकों का प्रतिनिधित्व करता है। संगठन उर्वरक क्षेत्र की कार्यक्षमता बढ़ाने, संतुलित एवं वैज्ञानिक उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने तथा सरकार और उद्योग के बीच नीति संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
NIPU-2026 भारत के उर्वरक क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है। 8–9 नए गैस आधारित संयंत्रों के माध्यम से उत्पादन क्षमता में 10 मिलियन मीट्रिक टन की वृद्धि, निवेशकों के लिए आकर्षक प्रावधान, लागत में कमी और दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता जैसे कदम देश को यूरिया उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार करेंगे। यदि नीति का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल यूरिया आयात पर अपनी निर्भरता कम करेगा, बल्कि किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराकर कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती प्रदान करेगा।
