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National Livestock Mission: पशुपालकों की समृद्धि और किसानों की आय बढ़ाने की नई दिशा

National Livestock Mission: A new direction for the prosperity of livestock rearers and increasing farmers' income.

Fiza by Fiza
July 18, 2026
in योजना
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National Livestock Mission

National Livestock Mission

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National Livestock Mission: भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ विश्व के सबसे बड़े पशुधन वाले देशों में भी शामिल है। गांवों की अर्थव्यवस्था में खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। देश के करोड़ों किसान दूध उत्पादन, डेयरी, बकरी पालन और भैंस पालन के माध्यम से अपनी आय में वृद्धि कर रहे हैं। लेकिन पशुपालन की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार है—उच्च गुणवत्ता वाला चारा। यदि पशुओं को पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक चारा नहीं मिलता, तो दूध उत्पादन, प्रजनन क्षमता और पशुओं का स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम को बढ़ावा दिया है। यह कार्यक्रम न केवल किसानों को बेहतर चारा उत्पादन के लिए प्रेरित करता है, बल्कि देश में बढ़ती चारे की कमी को दूर करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आज के समय में जब खेती की लागत बढ़ रही है और पशुपालन किसानों के लिए अतिरिक्त आय का प्रमुख स्रोत बन चुका है, तब यह योजना किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही है।

क्या है राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम?

राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम का उद्देश्य देश में हरे, सूखे और सघन (कंसंट्रेट) चारे की उपलब्धता बढ़ाना है। इसके अंतर्गत किसानों को उन्नत चारा बीज, चारा उत्पादन तकनीक, प्रशिक्षण और विभिन्न प्रकार की सहायता प्रदान की जाती है। कार्यक्रम का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि पशुओं को सालभर संतुलित और पर्याप्त भोजन उपलब्ध हो सके।

भारत में पशुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके अनुपात में चारागाह क्षेत्र में वृद्धि नहीं हुई है। कई रिपोर्टों के अनुसार, देश में हरे चारे की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर चारा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू किया जा रहा है।

किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कार्यक्रम?

ग्रामीण भारत में अधिकांश छोटे और सीमांत किसान खेती के साथ पशुपालन भी करते हैं। एक अच्छी नस्ल की गाय या भैंस तभी अधिक दूध दे सकती है, जब उसे संतुलित पोषण मिले। राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम किसानों को निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है—

  • पशुओं के लिए सालभर पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना।
  • दूध उत्पादन में वृद्धि।
  • पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना।
  • पशुपालन की लागत को कम करना।
  • किसानों की अतिरिक्त आय में बढ़ोतरी।
  • कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करना।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान अपने खेत के एक हिस्से में नियमित रूप से चारा फसलें उगाएं, तो वे बाजार से महंगा पशु आहार खरीदने पर होने वाले खर्च को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

देश में चारे की स्थिति

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, लेकिन चारे की कमी आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कई राज्यों में गर्मी और सूखे के दौरान पशुपालकों को चारा खरीदने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

देश में प्रमुख समस्याएं निम्न हैं—

  1. चारागाह भूमि का लगातार कम होना।
  2. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव।
  3. उन्नत चारा बीजों की सीमित उपलब्धता।
  4. किसानों में जागरूकता की कमी।
  5. सिंचाई सुविधाओं का अभाव।
  6. चारा संरक्षण तकनीकों का कम उपयोग।

ऐसे में राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम इन चुनौतियों को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया है।

कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य

राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम के कई व्यापक उद्देश्य हैं, जिनमें शामिल हैं—

  • चारा उत्पादन क्षेत्र का विस्तार।
  • उन्नत चारा बीजों का वितरण।
  • चारा बैंक की स्थापना को बढ़ावा।
  • किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देना।
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारा उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • आधुनिक चारा संरक्षण तकनीकों को अपनाना।
  • डेयरी और पशुपालन क्षेत्र को मजबूत बनाना।

इस कार्यक्रम के माध्यम से सरकार का प्रयास है कि पशुपालन को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सके।

कौन-कौन सी चारा फसलें हैं लाभकारी?

राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों को विभिन्न चारा फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं—

खरीफ मौसम

  • ज्वार
  • बाजरा
  • मक्का
  • लोबिया
  • नेपियर घास

रबी मौसम

  • बरसीम
  • ओट्स
  • रिजका (अल्फाल्फा)
  • सरसों मिश्रित चारा

बहुवर्षीय चारा

  • सुपर नेपियर
  • गिनी घास
  • पैरा घास
  • हाइब्रिड नेपियर

इन फसलों की विशेषता यह है कि ये कम समय में अधिक उत्पादन देती हैं और पशुओं के लिए पौष्टिक भी होती हैं।

चारा उत्पादन में आधुनिक तकनीक की भूमिका

आज कृषि क्षेत्र में तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम के तहत किसानों को आधुनिक तकनीकों के बारे में जानकारी दी जाती है।

प्रमुख तकनीकें

  • ड्रिप सिंचाई द्वारा चारा उत्पादन।
  • हाइड्रोपोनिक ग्रीन फॉडर यूनिट।
  • साइलेंज निर्माण।
  • हे (Hay) बनाने की तकनीक।
  • चारा कटाई मशीनों का उपयोग।
  • मोबाइल ऐप के माध्यम से कृषि सलाह।

हाइड्रोपोनिक तकनीक के माध्यम से केवल 7 से 10 दिनों में पौष्टिक हरा चारा तैयार किया जा सकता है। यह तकनीक उन क्षेत्रों में अधिक उपयोगी है जहां भूमि और पानी की कमी है।

साइलेंज: चारा संरक्षण का प्रभावी उपाय

बरसात के मौसम में हरे चारे की उपलब्धता अधिक होती है, लेकिन गर्मियों में इसकी कमी महसूस होती है। इस समस्या का समाधान साइलेंज है।

साइलेंज तैयार करने के फायदे—

  • लंबे समय तक चारे को सुरक्षित रखना।
  • पोषक तत्वों का संरक्षण।
  • पशुओं की उत्पादकता में सुधार।
  • सूखे और आपदा के समय उपयोगी।

कई राज्य सरकारें किसानों को साइलो पिट बनाने के लिए सहायता भी प्रदान कर रही हैं। राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम इस तकनीक को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

डेयरी उद्योग को मिलेगा लाभ

भारत का डेयरी उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि पशुओं को संतुलित आहार मिलेगा, तो दूध उत्पादन स्वतः बढ़ेगा। चारा विकास कार्यक्रम से संभावित लाभ—

  • प्रति पशु दूध उत्पादन में वृद्धि।
  • डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार।
  • किसानों की नियमित आय सुनिश्चित।
  • दुग्ध सहकारी समितियों को लाभ।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती।

विशेषज्ञों के अनुसार, संतुलित चारा देने से एक दुधारू पशु के दूध उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है।

महिलाओं के लिए अवसर

ग्रामीण भारत में पशुपालन का बड़ा हिस्सा महिलाओं द्वारा संभाला जाता है। ऐसे में राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम महिला सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

महिलाएं निम्न क्षेत्रों में योगदान दे सकती हैं—

  • चारा उत्पादन।
  • साइलेंज निर्माण।
  • डेयरी प्रबंधन।
  • स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से चारा बैंक संचालन।
  • पशु आहार इकाइयों का संचालन।

इससे महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ेगी और परिवार की आय में भी सुधार होगा।

चारा बैंक की अवधारणा

हाल के वर्षों में कई राज्यों ने चारा बैंक की स्थापना पर जोर दिया है। चारा बैंक का उद्देश्य प्राकृतिक आपदा, सूखा या बाढ़ जैसी परिस्थितियों में पशुपालकों को चारा उपलब्ध कराना है।

चारा बैंक के लाभ—

  • संकट के समय राहत।
  • पशुओं की मृत्यु दर में कमी।
  • स्थानीय स्तर पर चारा उपलब्धता।
  • सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा।

राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम के अंतर्गत भविष्य में चारा बैंक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन और चारा उत्पादन

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कृषि के साथ-साथ चारा उत्पादन पर भी दिखाई दे रहा है। अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और सूखे की घटनाओं ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

ऐसे में किसानों को निम्न उपाय अपनाने चाहिए—

  • सूखा सहनशील चारा किस्मों का चयन।
  • वर्षा जल संचयन।
  • बहुवर्षीय चारा फसलों की खेती।
  • माइक्रो इरिगेशन का उपयोग।
  • साइलेंज और हे का भंडारण।

राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम इन उपायों को बढ़ावा देकर किसानों को बदलते मौसम के अनुरूप तैयार करने में मदद करता है।

किसानों के लिए उपयोगी सुझाव

यदि किसान चारा उत्पादन को अपनाना चाहते हैं, तो उन्हें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए—

  1. खेत के कम से कम 10 से 15 प्रतिशत हिस्से में चारा फसलें लगाएं।
  2. उन्नत बीजों का उपयोग करें।
  3. समय-समय पर मिट्टी परीक्षण कराएं।
  4. चारा संरक्षण तकनीकों को अपनाएं।
  5. पशुओं को संतुलित आहार दें।
  6. कृषि विज्ञान केंद्रों से संपर्क बनाए रखें।
  7. स्थानीय पशुपालन विभाग से जानकारी लेते रहें।

सरकार और संस्थाओं की भूमिका

राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम को सफल बनाने में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ कई संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

  • कृषि विज्ञान केंद्र (KVK)
  • पशुपालन विभाग
  • डेयरी विकास बोर्ड
  • कृषि विश्वविद्यालय
  • स्वयं सहायता समूह
  • सहकारी समितियां

इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों तक प्रशिक्षण, बीज और तकनीकी जानकारी पहुंचाई जाती है।

भविष्य की संभावनाएं

आने वाले वर्षों में भारत में दूध और डेयरी उत्पादों की मांग लगातार बढ़ने की संभावना है। ऐसे में चारा उत्पादन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता बन गया है।

भविष्य में निम्न क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है—

  • डिजिटल फॉडर मैनेजमेंट।
  • स्मार्ट चारा फार्मिंग।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पशु पोषण सलाह।
  • सामुदायिक चारा उत्पादन मॉडल।
  • ग्रामीण स्टार्टअप्स को बढ़ावा।

यदि इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ता है, तो राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकता है।

निष्कर्ष

भारत में पशुपालन केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार है। पशुओं की अच्छी सेहत और अधिक उत्पादकता के लिए गुणवत्तापूर्ण चारा अत्यंत आवश्यक है। राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम इसी दिशा में एक दूरदर्शी पहल है, जो किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और पशुपालन क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है।

किसानों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कार्यक्रम केवल चारा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी आय बढ़ाने, पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का माध्यम भी है। वहीं, आम जनता के लिए यह समझना आवश्यक है कि दूध, दही, घी और अन्य डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता का सीधा संबंध पशुओं के पोषण से होता है।

यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और किसान मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत न केवल दुग्ध उत्पादन में अग्रणी रहेगा, बल्कि पशुपालन आधारित समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था का वैश्विक उदाहरण भी बनेगा। यही कारण है कि आज के समय में राष्ट्रीय चारा विकास कार्यक्रम को समझना और अपनाना हर किसान और पशुपालक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

Tags: National Livestock Mission
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