वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने देश में स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण और उद्योगों के साथ अनुसंधान संस्थानों की साझेदारी को नई गति देते हुए चार अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का उद्योगों को हस्तांतरण किया। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकसित आईओटी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) आधारित स्मार्ट जल सेवा वितरण, मापन और निगरानी प्रणाली का व्यावसायिक शुभारंभ भी किया गया। यह पहल न केवल भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगी, बल्कि ग्रामीण जल प्रबंधन, औद्योगिक दक्षता और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी नवाचार को भी नई दिशा देगी।
नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर मुख्यालय में आयोजित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम का आयोजन सीएसआईआर-सेंट्रल साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स ऑर्गनाइजेशन (सीएसआईआर-सीएसआईओ), चंडीगढ़ द्वारा किया गया। इस अवसर पर वैज्ञानिक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, प्रौद्योगिकी अपनाने वाले संस्थान और विभिन्न रणनीतिक हितधारक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में सीएसआईआर की महानिदेशक तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) की सचिव डॉ. एन. कलाईसेल्वी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उनके साथ सीएसआईआर मुख्यालय, सीएसआईआर-सीएसआईओ और विभिन्न औद्योगिक साझेदारों के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और कर्मचारी भी मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान सीएसआईआर-सीएसआईओ के निदेशक प्रो. शांतनु भट्टाचार्य ने प्रयोगशाला की अनुसंधान उपलब्धियों, तकनीकी नवाचारों और उद्योगों के साथ बढ़ते सहयोग की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सीएसआईआर-सीएसआईओ लगातार ऐसी तकनीकों का विकास कर रहा है, जिनका सीधा लाभ उद्योग, रक्षा क्षेत्र और आम नागरिकों तक पहुंचे। उनका कहना था कि अनुसंधान तभी सार्थक माना जाएगा जब वह प्रयोगशालाओं से निकलकर उद्योगों और समाज के लिए उपयोगी उत्पादों में बदल सके।
इस कार्यक्रम में जिन प्रमुख तकनीकों का उद्योगों को हस्तांतरण किया गया, उनमें इंडक्शन मोटर स्टेथोस्कोप (एम-स्कोप), पोर्टेबल एवं यूनिवर्सल मोटर-कम-पंप परफॉर्मेंस मॉनिटर (पीयू-एमपीपीएम) और आई-पावर क्वालिटी एनालाइजर (आईपीक्यूए) शामिल हैं। इन तीनों तकनीकों का लाइसेंस पंप एकेडमी प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु को प्रदान किया गया। ये तकनीकें औद्योगिक मोटरों और पंपों की कार्यक्षमता की निगरानी, खराबी का समय रहते पता लगाने तथा ऊर्जा दक्षता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इनके उपयोग से उद्योगों में मशीनों की देखरेख आसान होगी, रखरखाव की लागत कम होगी और उत्पादन क्षमता में सुधार आएगा।
रक्षा क्षेत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई। एसयू-30 लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए विकसित हेड-अप डिस्प्ले (एचयूडी) के ऑप्टिकल मॉड्यूल और बीम कॉम्बिनर असेंबली की तकनीक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), पंचकूला को हस्तांतरित की गई। यह तकनीक भारतीय रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इसके माध्यम से देश में ही अत्याधुनिक एवियोनिक्स उपकरणों का निर्माण संभव होगा और विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम होगी।
कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में ग्रामीण भारत के लिए विकसित आईओटी आधारित स्मार्ट जल सेवा वितरण, मापन एवं निगरानी प्रणाली का व्यावसायिक शुभारंभ भी शामिल रहा। इस तकनीक को बायोमेट्री टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली के माध्यम से बाजार में उतारा गया है। यह प्रणाली ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता, उपलब्ध मात्रा और जल आपूर्ति सेवाओं की वास्तविक समय में निगरानी करने में सक्षम होगी। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) तकनीक के उपयोग से जलापूर्ति व्यवस्था की पारदर्शिता बढ़ेगी, रिसाव और बर्बादी पर नियंत्रण होगा तथा ग्रामीण नागरिकों को बेहतर जल सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्मार्ट जल निगरानी प्रणाली जल जीवन मिशन जैसी राष्ट्रीय योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे गांवों में जलापूर्ति की स्थिति पर वास्तविक समय में निगरानी रखी जा सकेगी और किसी भी समस्या का त्वरित समाधान संभव होगा। साथ ही स्थानीय प्रशासन को भी जल प्रबंधन से जुड़े सटीक आंकड़े उपलब्ध होंगे।
प्रो. शांतनु भट्टाचार्य ने बताया कि सीएसआईआर-सीएसआईओ ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी तकनीकों के व्यावसायीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने जानकारी दी कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान संस्थान को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल), पंचकूला से स्वदेशी रक्षा एवियोनिक्स तकनीकों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए 1.67 करोड़ रुपये की रॉयल्टी प्राप्त हुई। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि भारतीय उद्योग अब स्वदेशी अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों को तेजी से अपना रहे हैं।
बीईएल को जिन रक्षा तकनीकों का लाइसेंस दिया गया है, उनमें हेड-अप डिस्प्ले (एचयूडी), ड्रोग लाइट, टैक्सी लैंडिंग लाइट, एचयूडी लेवल टेस्टर और बोरसाइट अलाइनमेंट टूल जैसी अत्याधुनिक प्रणालियां शामिल हैं। इन तकनीकों का उपयोग भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों और अन्य रक्षा उपकरणों में किया जाएगा। इससे रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में स्वदेशी क्षमता और मजबूत होगी तथा ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को नई गति मिलेगी।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएसआईआर की महानिदेशक एवं डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलाईसेल्वी ने सीएसआईआर-सीएसआईओ की पूरी टीम को सफल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि किसी भी वैज्ञानिक अनुसंधान की वास्तविक सफलता तब मानी जाती है, जब उसका लाभ उद्योग, अर्थव्यवस्था और आम जनता तक पहुंचे। उन्होंने प्रो. शांतनु भट्टाचार्य के नेतृत्व में संस्थान द्वारा किए जा रहे तकनीकी विकास, उद्योगों के साथ सहयोग, बाहरी वित्तीय संसाधनों में वृद्धि और तकनीक हस्तांतरण की दिशा में किए गए प्रयासों की सराहना की।
डॉ. कलाईसेल्वी ने कहा कि सीएसआईआर का उद्देश्य केवल अनुसंधान करना नहीं, बल्कि ऐसे उत्पाद और प्रक्रियाएं विकसित करना है जो उद्योगों के लिए आर्थिक मूल्य पैदा करें और समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान भी करें। उन्होंने पूरे सीएसआईआर नेटवर्क के वैज्ञानिकों से राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए उद्योगोन्मुख अनुसंधान जारी रखने का आह्वान किया। उनके अनुसार, भारत को वैश्विक तकनीकी महाशक्ति बनाने के लिए अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच मजबूत साझेदारी बेहद आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्यक्रम के माध्यम से हस्तांतरित तकनीकें भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, ऊर्जा दक्षता सुधारने, ग्रामीण जल प्रबंधन को आधुनिक बनाने और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। साथ ही अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों के व्यावसायीकरण से देश में नवाचार आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और वैज्ञानिक अनुसंधान का सीधा लाभ समाज तक पहुंचेगा।
सीएसआईआर की यह पहल इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल अनुसंधान करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैज्ञानिक खोजों को व्यावसायिक उत्पादों में बदलकर आर्थिक विकास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को नई मजबूती देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

