खरीफ सीजन के दौरान किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार लगातार आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने में जुटी है। इसी क्रम में सरकार ने संसद में जानकारी दी कि चालू वित्त वर्ष (FY27) की पहली तिमाही (अप्रैल–जून) में भारत ने 32 लाख टन (3.2 मिलियन टन) से अधिक प्रमुख उर्वरकों, जिनमें यूरिया और डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) प्रमुख हैं, का आयात किया है। सरकार के अनुसार, यह आयात दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति समझौतों, समय पर वैश्विक खरीद और आयात स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति का परिणाम है, जिससे खरीफ सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकी।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और समुद्री परिवहन में व्यवधान के कारण उर्वरक बाजार दबाव में है। इसके बावजूद सरकार का दावा है कि किसानों को उर्वरकों की कमी नहीं होने दी जाएगी।
खरीफ सीजन को देखते हुए समय पर आयात
भारत में खरीफ फसलों की बुवाई के दौरान यूरिया, डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों की मांग सबसे अधिक रहती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की खेती इसी मौसम में होती है, जिसके कारण अप्रैल से जुलाई के बीच उर्वरकों की खपत तेजी से बढ़ जाती है।
सरकार ने संसद में बताया कि पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात इसलिए किया गया ताकि राज्यों में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहे और किसानों को बुवाई के समय किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन में समय पर उर्वरक उपलब्ध होना उत्पादन बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि शुरुआती चरण में उर्वरकों की कमी हो जाए तो इसका सीधा असर फसल की वृद्धि और उपज पर पड़ता है।
दीर्घकालिक समझौतों से मिली मजबूती
सरकार ने स्पष्ट किया कि उर्वरक आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए भारत ने कई देशों के साथ दीर्घकालिक (Long-Term) आपूर्ति समझौते किए हैं। इन समझौतों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत को नियमित आपूर्ति मिल रही है।
ओमान के साथ यूरिया आपूर्ति का समझौता, सऊदी अरब के साथ डीएपी की दीर्घकालिक व्यवस्था तथा रूस, मोरक्को और अन्य देशों से विविध स्रोतों के माध्यम से आयात ने आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाया है। इससे किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई है।
सरकार का मानना है कि आयात स्रोतों में विविधता (Diversification) भविष्य में वैश्विक संकटों के दौरान भी भारत की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत बनाएगी।
वैश्विक संकट के बीच भी आपूर्ति सामान्य
पिछले कुछ महीनों में वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से जुड़े जोखिमों के कारण वैश्विक उर्वरक व्यापार प्रभावित हुआ है। अमोनिया, एलएनजी, सल्फर और फॉस्फेट जैसे कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि समुद्री परिवहन लागत भी बढ़ी है।
इसके बावजूद सरकार ने कहा कि समय रहते वैश्विक निविदाएं जारी करने और विभिन्न देशों से खरीद करने के कारण भारत में उर्वरकों की उपलब्धता पर बड़ा असर नहीं पड़ा। सरकार लगातार स्थिति की निगरानी कर रही है और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त आयात की भी व्यवस्था की जाएगी।
भारत की आयात निर्भरता बनी चुनौती
भारत विश्व के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में से एक है, लेकिन घरेलू उत्पादन अभी भी पूरी मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है। विशेष रूप से फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों के लिए भारत को बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
यूरिया उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों के दौरान नई गैस आधारित इकाइयों के शुरू होने से आत्मनिर्भरता बढ़ी है, फिर भी कुल मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। डीएपी, एमओपी (म्यूरेट ऑफ पोटाश) और कई जटिल उर्वरकों के लिए आवश्यक कच्चा माल भी बड़े पैमाने पर विदेशों से आता है।
यही कारण है कि वैश्विक बाजार में किसी भी प्रकार का संकट सीधे भारत के उर्वरक क्षेत्र को प्रभावित करता है।
किसानों को राहत, कीमतें यथावत
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में वृद्धि के बावजूद सरकार ने किसानों के लिए यूरिया और डीएपी की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। यूरिया अभी भी 266.50 रुपये प्रति 45 किलोग्राम बैग तथा डीएपी 1,350 रुपये प्रति 50 किलोग्राम बैग की नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
सरकार बढ़ी हुई आयात लागत और किसानों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर उर्वरक सब्सिडी के माध्यम से वहन कर रही है। इसका उद्देश्य किसानों की उत्पादन लागत को नियंत्रित रखना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
राज्यों को पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध
उर्वरक विभाग के अनुसार, पहली तिमाही में हुए आयात के बाद विभिन्न राज्यों में उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण किया गया है। राज्यों की मांग के अनुसार नियमित रूप से रैक और परिवहन व्यवस्था के माध्यम से उर्वरकों की आपूर्ति की जा रही है।
सरकार ने राज्यों से भी अपील की है कि वे उर्वरकों के वितरण की नियमित निगरानी करें और कालाबाजारी या कृत्रिम कमी जैसी गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई करें, ताकि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध हो सके।
भविष्य की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आयात पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। भारत को घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, हरित अमोनिया (Green Ammonia) और ग्रीन हाइड्रोजन आधारित उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा देने, वैकल्पिक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने तथा जैविक और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
इसके साथ ही डिजिटल आपूर्ति श्रृंखला, रियल-टाइम स्टॉक मॉनिटरिंग और उर्वरक वितरण प्रणाली को और मजबूत करने से भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का प्रभाव कम किया जा सकता है।
निष्कर्ष
संसद में सरकार द्वारा पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों के आयात की जानकारी यह दर्शाती है कि केंद्र सरकार खरीफ सीजन के दौरान किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने के लिए सक्रिय रणनीति अपना रही है। दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौते, विविध आयात स्रोत और समय पर वैश्विक खरीद ने वर्तमान परिस्थितियों में भारत की उर्वरक आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि, भारत की आयात निर्भरता अभी भी एक बड़ी चुनौती है। भविष्य में घरेलू उत्पादन बढ़ाने, नई तकनीकों को अपनाने और आपूर्ति स्रोतों का विस्तार करने से ही देश वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं से बेहतर तरीके से मुकाबला कर सकेगा। फिलहाल किसानों के लिए राहत की बात यह है कि सरकार ने पर्याप्त आयात सुनिश्चित कर खरीफ सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने का भरोसा दिया है।

