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Home कृषि समाचार

भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र को आत्मनिर्भर और सतत बनाने की दिशा में PFI की पहल, छोटे किसानों के लिए 50% सब्सिडी की मांग

PFI's initiative to make the Indian poultry sector self-reliant and sustainable, demands 50% subsidy for small farmers

Emran Khan by Emran Khan
August 11, 2026
in कृषि समाचार, पशुपालन
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भारतीय पोल्ट्री

भारतीय पोल्ट्री

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भारतीय पोल्ट्री उद्योग को अधिक आत्मनिर्भर, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया (PFI) ने केंद्र सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण सुझाव और मांगें रखी हैं। पीएफआई के एक प्रतिनिधिमंडल ने फेडरेशन के अध्यक्ष रणपाल ढांडा के नेतृत्व में केंद्रीय पशुपालन, मत्स्य पालन एवं डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल से मुलाकात कर पोल्ट्री क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

बैठक में पीएफआई ने विशेष रूप से पोल्ट्री फार्मों में बायोगैस संयंत्र और सौर ऊर्जा प्रणालियों को बढ़ावा देने, छोटे ब्रॉयलर किसानों को सरकारी आधारभूत संरचना योजनाओं के दायरे में लाने तथा उन्हें 50 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी और ऋण पर ब्याज अनुदान जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की।

प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय राज्य मंत्री को आगामी 23–24 सितंबर 2026 को ग्रैंड हयात, कोच्चि, केरल में आयोजित होने वाली पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया की 37वीं वार्षिक आम सभा (AGM) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया।

छोटे पोल्ट्री किसानों को योजनाओं का लाभ देने पर जोर

पीएफआई की बैठक में सबसे प्रमुख मुद्दों में से एक छोटे पोल्ट्री किसानों को सरकारी सहायता योजनाओं का लाभ दिलाना रहा। फेडरेशन ने सरकार के समक्ष मांग रखी कि 10,000 पक्षियों तक की क्षमता वाले छोटे ब्रॉयलर किसानों को भी आधारभूत संरचना से जुड़ी सरकारी सहायता योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए।

फेडरेशन का कहना है कि देश में बड़ी संख्या में किसान छोटे स्तर पर ब्रॉयलर पालन करते हैं। ये किसान ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर पैदा करते हैं। हालांकि, सीमित पूंजी और आधुनिक सुविधाओं तक पहुंच न होने के कारण कई छोटे किसान बेहतर पोल्ट्री इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं कर पाते।

पीएफआई ने मांग की कि छोटे किसानों को भी 50 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही आधुनिक पोल्ट्री शेड, उपकरण, अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली, ऊर्जा व्यवस्था और अन्य जरूरी आधारभूत सुविधाओं के लिए लिए गए ऋण पर Interest Subvention यानी ब्याज अनुदान की सुविधा भी दी जाए।

फेडरेशन के अनुसार, यदि छोटे किसानों को बड़े पोल्ट्री उद्यमों की तरह आधारभूत सहायता उपलब्ध होती है तो वे आधुनिक तकनीक को अपनाने में सक्षम होंगे। इससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि होने के साथ-साथ पोल्ट्री पालन की लागत और जोखिम को भी कम किया जा सकता है।

बायोगैस संयंत्रों के लिए 60% सब्सिडी की मांग

पोल्ट्री फार्मों से निकलने वाले लिटर और अन्य जैविक अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन को लेकर भी पीएफआई ने सरकार के सामने महत्वपूर्ण सुझाव रखे। फेडरेशन ने पोल्ट्री फार्मों में बायोगैस संयंत्र स्थापित करने के लिए सब्सिडी बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का आग्रह किया।

पीएफआई अध्यक्ष रणपाल ढांडा ने कहा कि वर्तमान में बायोगैस संयंत्रों पर उपलब्ध 20 प्रतिशत से भी कम सब्सिडी किसानों के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं है। बायोगैस संयंत्र स्थापित करने में शुरुआती निवेश की जरूरत होती है, जिसके कारण छोटे और मध्यम स्तर के पोल्ट्री किसान इसे अपनाने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।

फेडरेशन का मानना है कि यदि सरकार अधिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है तो पोल्ट्री फार्मों में बायोगैस संयंत्रों की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सकती है।

बायोगैस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पोल्ट्री लिटर जैसे जैविक अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है। इससे एक ओर अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या कम होगी, वहीं दूसरी ओर इससे नवीकरणीय ऊर्जा और जैविक खाद का उत्पादन किया जा सकता है।

इस तरह पोल्ट्री किसान अपने फार्म पर उत्पन्न अपशिष्ट को केवल कचरा मानने के बजाय उससे अतिरिक्त आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। बायोगैस का इस्तेमाल फार्म की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता है, जबकि संयंत्र से प्राप्त जैविक अवशेषों का उपयोग खाद के रूप में किया जा सकता है।

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने में मददगार

पीएफआई ने बायोगैस को केवल ऊर्जा उत्पादन का माध्यम न मानकर इसे सतत पोल्ट्री उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़कर देखा है।

पोल्ट्री फार्मों में उत्पन्न जैविक अपशिष्ट का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन नहीं होने पर दुर्गंध, स्वच्छता और पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। बायोगैस संयंत्र इन अपशिष्ट पदार्थों को नियंत्रित तरीके से प्रोसेस करने में मदद कर सकते हैं।

फेडरेशन के अनुसार, इस तरह की प्रणालियां पोल्ट्री फार्मों की स्वच्छता बेहतर करने, अपशिष्ट का वैज्ञानिक उपयोग सुनिश्चित करने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में योगदान दे सकती हैं।

यदि बड़े पैमाने पर पोल्ट्री फार्मों में ऐसी तकनीकों को अपनाया जाता है तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सर्कुलर इकोनॉमी को भी बढ़ावा मिल सकता है। यानी फार्म से निकलने वाले अपशिष्ट को दोबारा संसाधन में बदलकर ऊर्जा और खाद का उत्पादन किया जा सकता है।

सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की मांग

बायोगैस के साथ-साथ पीएफआई ने पोल्ट्री फार्मों में सौर ऊर्जा प्रणालियों की स्थापना के लिए 50 प्रतिशत वित्तीय सहायता देने का सुझाव भी सरकार को दिया।

पोल्ट्री फार्मों में बिजली की आवश्यकता लगातार बनी रहती है। फार्म में पंखे, कूलिंग सिस्टम, प्रकाश व्यवस्था, पानी की मोटर, फीडिंग सिस्टम और अन्य उपकरणों के संचालन के लिए बिजली की जरूरत होती है। ऐसे में बिजली की लागत किसानों की कुल उत्पादन लागत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

पीएफआई का कहना है कि यदि पोल्ट्री किसानों को सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने के लिए 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता मिलती है तो वे अपनी ऊर्जा लागत को कम कर सकेंगे।

सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पोल्ट्री फार्मों में करने से किसानों को पारंपरिक बिजली स्रोतों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा।

फेडरेशन ने इसे पोल्ट्री क्षेत्र की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से भी जोड़ा है। सौर ऊर्जा और बायोगैस जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से पोल्ट्री फार्म अधिक ऊर्जा-कुशल बन सकते हैं और भविष्य में ऊर्जा लागत में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी मजबूती

पोल्ट्री उद्योग भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। बड़ी संख्या में किसान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पोल्ट्री उत्पादन से जुड़े हुए हैं। इसमें ब्रॉयलर फार्मिंग, लेयर फार्मिंग, फीड, चूजा उत्पादन, परिवहन, प्रसंस्करण और बाजार से जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं।

पीएफआई का कहना है कि छोटे किसानों को आधुनिक तकनीक और वित्तीय सहायता से जोड़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूती मिल सकती है।

विशेष रूप से छोटे ब्रॉयलर किसानों को पूंजीगत सब्सिडी और ब्याज अनुदान मिलने से वे बेहतर शेड, आधुनिक उपकरण और वैज्ञानिक प्रबंधन प्रणाली स्थापित कर सकते हैं। इससे उत्पादन क्षमता और उत्पादकता में सुधार होने की संभावना है।

फेडरेशन के अनुसार, छोटे किसानों की क्षमता बढ़ने से पोल्ट्री क्षेत्र का विकास केवल बड़े व्यावसायिक फार्मों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण स्तर पर भी इसका व्यापक लाभ पहुंच सकेगा।

37वीं वार्षिक आम सभा के लिए मंत्री को निमंत्रण

बैठक के दौरान पीएफआई प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल को फेडरेशन की 37वीं वार्षिक आम सभा (AGM) में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने का निमंत्रण दिया।

यह वार्षिक आम सभा 23 और 24 सितंबर 2026 को ग्रैंड हयात, कोच्चि, केरल में आयोजित की जाएगी। इस कार्यक्रम में पोल्ट्री उद्योग से जुड़े विभिन्न हितधारकों के शामिल होने की उम्मीद है।

AGM के माध्यम से उद्योग के सामने मौजूद चुनौतियों, भविष्य की संभावनाओं, तकनीकी विकास, पर्यावरणीय स्थिरता और किसानों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा का अवसर मिलेगा।

वरिष्ठ अधिकारियों से भी हुई चर्चा

केंद्रीय राज्य मंत्री से मुलाकात के बाद पीएफआई प्रतिनिधिमंडल ने पशुपालन एवं डेयरी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी विस्तृत चर्चा की।

प्रतिनिधिमंडल ने डॉ. नवीन, पशुपालन आयुक्त, डॉ. एस. के. दत्ता, संयुक्त आयुक्त तथा डॉ. लिपि शेअरवाल, उप आयुक्त से मुलाकात कर पोल्ट्री क्षेत्र की जरूरतों और फेडरेशन द्वारा सुझाए गए उपायों पर चर्चा की।

इस दौरान बायोगैस, सौर ऊर्जा, छोटे पोल्ट्री किसानों के लिए वित्तीय सहायता तथा आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने जैसे विषय प्रमुख रहे।

विकसित भारत @2047 के लक्ष्य से जोड़कर देखा

पीएफआई ने छोटे किसानों को सरकारी योजनाओं में शामिल करने की मांग को विकसित भारत @2047 के व्यापक लक्ष्य से भी जोड़ा है।

फेडरेशन का कहना है कि भारत को विकसित अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों की उत्पादन क्षमता और किसानों की आय को मजबूत करना जरूरी है। पोल्ट्री क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें छोटे किसानों की बड़ी भागीदारी है।

ऐसे में यदि छोटे पोल्ट्री किसानों को आधुनिक तकनीक, सस्ती वित्तीय सहायता और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराया जाता है तो वे अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं।

इसके अलावा बायोगैस और सौर ऊर्जा जैसी तकनीकों का इस्तेमाल पोल्ट्री उद्योग को अधिक ऊर्जा-कुशल, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ बनाने में मदद कर सकता है।

 

सरकार के सहयोग से बदलाव की उम्मीद

पीएफआई ने कहा कि केंद्र सरकार, पोल्ट्री उद्योग, किसानों और अन्य हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र को नई दिशा दी जा सकती है।

फेडरेशन का मानना है कि यदि बायोगैस संयंत्रों के लिए 60 प्रतिशत तक सहायता, सौर ऊर्जा के लिए 50 प्रतिशत वित्तीय सहयोग और छोटे पोल्ट्री किसानों के लिए 50 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी तथा ब्याज अनुदान जैसी मांगों पर सकारात्मक कदम उठाए जाते हैं तो इससे उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिल सकता है।

बैठक के दौरान व्यस्त संसदीय कार्यक्रम के बावजूद केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल ने प्रतिनिधिमंडल को समय दिया। उन्होंने पोल्ट्री क्षेत्र से जुड़े विषयों पर सकारात्मक चर्चा की और भविष्य में विभाग की ओर से हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।

पीएफआई ने विश्वास जताया कि सरकार और उद्योग के सहयोग से भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र आने वाले वर्षों में अधिक सतत, ऊर्जा-कुशल, पर्यावरण-अनुकूल और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। इससे न केवल पोल्ट्री किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि ग्रामीण रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा, अपशिष्ट प्रबंधन और देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।

 

Tags: AgricultureFarmingIndian AgriculturePFI
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