July महीने में देश में प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई। मानसून के बेहतर होने और खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी आने के बावजूद किसानों की ओर से उर्वरकों की नई खरीद अपेक्षाकृत धीमी रही। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण किसानों, सहकारी समितियों और खुदरा विक्रेताओं के पास पहले से उपलब्ध पर्याप्त उर्वरक स्टॉक को माना जा रहा है। खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले ही देश में उर्वरकों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध करा दिया गया था, जिसका असर July की बिक्री के आंकड़ों में दिखाई दिया।
कृषि क्षेत्र के लिए July बेहद महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस दौरान धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालों और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई तेजी से आगे बढ़ती है। सामान्य परिस्थितियों में बुवाई बढ़ने के साथ किसानों की ओर से यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की मांग भी बढ़ती है। लेकिन इस बार किसानों की तत्काल जरूरत का एक बड़ा हिस्सा पहले से उपलब्ध स्टॉक से पूरा हो गया। परिणामस्वरूप बाजार में नई बिक्री की गति कमजोर रही।
July में मानसून सुधरा, लेकिन उर्वरक खरीद नहीं बढ़ी
July में देश के कई हिस्सों में मानसूनी बारिश में सुधार हुआ। इससे खरीफ फसलों की बुवाई को गति मिली और खेतों में कृषि गतिविधियां बढ़ीं। हालांकि, बारिश और बुवाई बढ़ने के बावजूद उर्वरक की बिक्री उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। इसका एक कारण यह भी रहा कि कई राज्यों में किसानों ने बुवाई से पहले ही जरूरी उर्वरक खरीदकर रख लिया था।
सरकार ने खरीफ सीजन से पहले उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया था। केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर आपूर्ति की लगातार निगरानी की गई। बंदरगाहों, उर्वरक संयंत्रों और राज्यों के बीच आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत रखने की कोशिश की गई, ताकि किसानों को सीजन के दौरान खाद की कमी का सामना न करना पड़े। इस तैयारी का फायदा यह हुआ कि कई क्षेत्रों में किसानों के पास जरूरत के मुकाबले पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध रहा।
ऐसे में जुलाई में बिक्री का कमजोर रहना जरूरी नहीं कि उर्वरक की मांग में स्थायी गिरावट का संकेत हो। यह काफी हद तक स्टॉक समायोजन का परिणाम हो सकता है। किसानों ने पहले खरीदे गए उर्वरक का इस्तेमाल किया और नई खरीद को कुछ समय के लिए टाल दिया।
July में यूरिया की बिक्री पर भी असर
देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले उर्वरक यूरिया की बिक्री पर भी इस स्थिति का असर देखा गया। यूरिया की मांग मुख्य रूप से धान, गेहूं, गन्ना, मक्का और अन्य फसलों में नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए होती है। खरीफ सीजन में धान और अन्य फसलों की बढ़वार के साथ यूरिया की मांग सामान्यतः बढ़ती है।
हालांकि, किसानों के पास पहले से उपलब्ध यूरिया स्टॉक के कारण जुलाई में नई खरीद की जरूरत कम रही। कई क्षेत्रों में किसानों ने बुवाई के समय आवश्यक मात्रा पहले ही खरीद ली थी। इसके अलावा, संतुलित पोषण और मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरक इस्तेमाल पर बढ़ती जागरूकता भी बाजार की मांग के पैटर्न को प्रभावित कर रही है।
यह बदलाव कृषि नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय से विशेषज्ञ किसानों को केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल करने की सलाह देते रहे हैं। यदि किसान मिट्टी की जांच और फसल की वास्तविक जरूरत के आधार पर उर्वरक इस्तेमाल करते हैं, तो कुल खपत में बदलाव आ सकता है।
डीएपी और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की मांग
डीएपी की बिक्री भी कृषि गतिविधियों और किसानों के पास उपलब्ध स्टॉक से प्रभावित होती है। डीएपी का इस्तेमाल मुख्य रूप से बुवाई के समय फसलों को फास्फोरस उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होने से पहले इसकी मांग तेजी से बढ़ती है। इस वर्ष कई क्षेत्रों में किसानों और डीलरों ने सीजन शुरू होने से पहले ही डीएपी का पर्याप्त भंडार कर लिया था।
इसके कारण जुलाई में नई खरीद की आवश्यकता कम दिखाई दी। इसी तरह एनपीके और अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री भी कई क्षेत्रों में स्टॉक की स्थिति से प्रभावित हुई। बाजार में पहले से उपलब्ध खाद के इस्तेमाल के कारण नई बिक्री और वास्तविक कृषि खपत के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
इसका मतलब यह है कि बिक्री में गिरावट को सीधे तौर पर किसानों की उर्वरक जरूरत में कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। बिक्री का आंकड़ा किसी विशेष महीने में बाजार में हुई नई आपूर्ति और खरीद को दर्शाता है, जबकि खेतों में वास्तविक खपत अलग समय पर हो सकती है।
कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर
उर्वरक बाजार पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का भी असर रहता है। भारत यूरिया, फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों के लिए काफी हद तक वैश्विक बाजार पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, कच्चे माल की उपलब्धता, समुद्री भाड़ा और आयात लागत जैसी परिस्थितियां घरेलू आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि, किसानों को उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सरकार सब्सिडी व्यवस्था के माध्यम से कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास करती है। इससे वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर किसानों पर सीमित रहता है। लेकिन कंपनियों और सरकार के लिए आयात लागत तथा सब्सिडी का बोझ महत्वपूर्ण मुद्दा बना रहता है।
इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ उर्वरकों की कीमतों में नरमी आने से आयात व्यवस्था को भी राहत मिली है। इससे घरेलू बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
बिक्री में गिरावट के बावजूद आपूर्ति पर नजर
उर्वरक बिक्री में जुलाई की गिरावट के बावजूद सरकार के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता खरीफ सीजन के दौरान किसी भी क्षेत्र में खाद की कमी नहीं होने देना है। भारत जैसे बड़े कृषि देश में उर्वरक की मांग राज्यों और फसलों के अनुसार अलग-अलग होती है। किसी एक राज्य में स्टॉक पर्याप्त होने के बावजूद दूसरे राज्य में स्थानीय स्तर पर मांग बढ़ सकती है।
धान उत्पादक राज्यों में यूरिया की मांग फसल की बढ़वार के साथ आगे बढ़ सकती है। वहीं सोयाबीन, कपास और मक्का उत्पादक क्षेत्रों में भी फसल की स्थिति के अनुसार उर्वरक की अगली खुराक की जरूरत पैदा होगी। इसलिए जुलाई में कम बिक्री के बाद भी अगस्त और सितंबर में मांग में बदलाव संभव है।
राज्यों को भी खुदरा दुकानों तक उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करने और जमाखोरी तथा कालाबाजारी पर नजर रखने की जरूरत होगी। पर्याप्त राष्ट्रीय स्टॉक होने के बावजूद यदि स्थानीय वितरण व्यवस्था कमजोर रहती है, तो किसानों को परेशानी हो सकती है।
आगे कैसी रह सकती है मांग?
उर्वरक बाजार के लिए आने वाले महीनों में मानसून की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक रहेगी। यदि बारिश सामान्य रहती है और खरीफ फसलों की स्थिति अच्छी रहती है, तो फसल की बढ़वार के दौरान यूरिया और अन्य उर्वरकों की मांग फिर बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि किसी क्षेत्र में बारिश की कमी या अत्यधिक बारिश जैसी स्थिति बनती है, तो उर्वरक की खपत प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा किसानों के पास मौजूद शुरुआती स्टॉक के खत्म होने के बाद बाजार में नई खरीद बढ़ने की संभावना भी है। इसलिए जुलाई में बिक्री में आई गिरावट को पूरे खरीफ सीजन की मांग का अंतिम संकेत मानना जल्दबाजी होगी।
कुल मिलाकर जुलाई में प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में गिरावट का प्रमुख कारण कमजोर कृषि गतिविधि के बजाय पर्याप्त शुरुआती स्टॉक और किसानों की खरीद के समय में बदलाव दिखाई देता है। मानसून में सुधार के बावजूद किसानों ने नई खरीद करने के बजाय पहले से उपलब्ध खाद का इस्तेमाल किया। इससे बाजार में जुलाई की बिक्री कमजोर रही, लेकिन खेतों में उर्वरक की वास्तविक खपत जारी रही।
आने वाले महीनों में बुवाई की प्रगति, फसल की स्थिति, मानसून, किसानों के पास उपलब्ध स्टॉक और अंतरराष्ट्रीय उर्वरक कीमतें बाजार की दिशा तय करेंगी। यदि खरीफ फसलों की स्थिति बेहतर रहती है, तो अगस्त और सितंबर में उर्वरक मांग में फिर तेजी आ सकती है। इसलिए जुलाई की बिक्री में गिरावट को फिलहाल बाजार में स्टॉक के समायोजन के रूप में देखना अधिक उचित होगा, न कि उर्वरक की दीर्घकालिक मांग में कमी के संकेत के रूप में।

