UP Farmers News: उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए कृषि निर्यात के मोर्चे पर एक अहम पहल सामने आई है। प्रदेश के किसानों की उपज को स्थानीय मंडियों और घरेलू बाजार तक सीमित रखने के बजाय अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की दिशा में उत्तर प्रदेश राज्य औद्यानिकी निर्यात प्रोत्साहन बोर्ड ने कदम बढ़ाया है। लखनऊ के उद्यान भवन में आयोजित बोर्ड की दूसरी बैठक और कार्यशाला के दौरान निर्यातकों और किसान उत्पादक संगठनों यानी FPO के बीच समझौता हुआ। साथ ही बोर्ड की वेबसाइट भी लॉन्च की गई, जिसके जरिए किसानों और निर्यातकों तक निर्यात से जुड़ी जरूरी जानकारियां पहुंचाने की तैयारी है।
इस पहल का दायरा केवल कुछ चुनिंदा जिलों तक सीमित नहीं है। बैठक में उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों से प्रगतिशील किसान, निर्यातक, FPO, उत्पादक कंपनियां और संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हुए। सरकार का जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर है, जिसमें किसान यह समझ सकें कि उनके जिले में पैदा होने वाली अतिरिक्त कृषि या औद्यानिकी उपज की मांग किस विदेशी बाजार में हो सकती है और वहां तक उत्पाद पहुंचाने के लिए किन गुणवत्ता मानकों तथा प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है।
किसानों और निर्यातकों के बीच बनेगा सीधा नेटवर्क
किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उत्पादन के बाद सही बाजार तलाशना है। कई बार अच्छी पैदावार के बावजूद स्थानीय स्तर पर अधिक आवक होने से किसानों को अपेक्षित कीमत नहीं मिल पाती। ऐसे में निर्यात का विकल्प किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध करा सकता है।
इसी दिशा में FPO और निर्यातकों के बीच हुआ समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है। FPO छोटे और सीमांत किसानों को सामूहिक रूप से उत्पादन, खरीद और विपणन की ताकत देता है। जब बड़ी संख्या में किसान किसी FPO के माध्यम से संगठित होते हैं तो उनके लिए एक निश्चित मात्रा और गुणवत्ता में कृषि उत्पाद उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
दूसरी तरफ निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की जरूरतों के हिसाब से लगातार पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद चाहिए होते हैं। ऐसे में FPO और निर्यातकों का नेटवर्क दोनों पक्षों के बीच की दूरी कम कर सकता है।
यूपी के सभी 75 जिलों तक पहुंची निर्यात की पहल
उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार एवं कृषि निर्यात राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह के मुताबिक, पहले प्रदेश में निर्यात गतिविधियां मुख्य रूप से बड़े शहरों के आसपास केंद्रित थीं। अब स्थिति में बदलाव आया है और प्रदेश के सभी 75 जिलों में निर्यातकों की भूमिका बढ़ रही है।
सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में करीब 3,000 निर्यातक विकसित हो चुके हैं। ये निर्यातक किसानों और उनके उत्पादों को विदेशी बाजारों से जोड़ने में भूमिका निभा रहे हैं।
कृषि निर्यात के लिहाज से यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश में अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्र मौजूद हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक विभिन्न प्रकार की फसलें, फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद पैदा किए जाते हैं। सही बाजार, गुणवत्ता, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था होने पर इनमें से कई उत्पादों के लिए विदेशी बाजार तलाशे जा सकते हैं।
लॉन्च हुई नई वेबसाइट, किसानों को मिलेगी बाजार की जानकारी
बैठक के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य औद्यानिकी निर्यात प्रोत्साहन बोर्ड की वेबसाइट का शुभारंभ भी किया गया। इसका उद्देश्य किसानों और निर्यातकों को कृषि निर्यात से जुड़ी जानकारियां एक जगह उपलब्ध कराना है।
सरकार के अनुसार, इस डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से किसान या निर्यातक यह जानकारी हासिल कर सकेंगे कि किसी जिले की सरप्लस उपज को किस देश के बाजार में भेजे जाने की संभावना है। इसके साथ संबंधित देश में उस उत्पाद के लिए निर्धारित मानकों और निर्यात प्रक्रिया के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी।
किसानों के लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिर्फ अच्छी पैदावार होना पर्याप्त नहीं होता। कृषि उत्पादों को आयात करने वाले देशों के अपने गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा मानक होते हैं। उत्पादों की ग्रेडिंग, पैकेजिंग, अवशेष सीमा, प्रमाणन और कई दूसरी शर्तें पूरी करनी पड़ सकती हैं।
ऐसे में किसान और FPO पहले से इन जरूरतों को समझते हैं तो वे उत्पादन की योजना उसी हिसाब से तैयार कर सकते हैं।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है Agriculture Export?
कृषि निर्यात का सबसे बड़ा फायदा बाजार के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। किसान की उपज के लिए जितने अधिक खरीदार और बाजार उपलब्ध होंगे, विपणन के उतने ही अधिक विकल्प सामने आएंगे।
हालांकि यह जरूरी नहीं है कि निर्यात से हर किसान को हर फसल में स्वतः ज्यादा कीमत मिल जाए। निर्यात की सफलता अंतरराष्ट्रीय मांग, गुणवत्ता, परिवहन लागत, मुद्रा विनिमय, सप्लाई, वैश्विक कीमत और अनुबंध की शर्तों सहित कई कारकों पर निर्भर करती है।
इसके बावजूद व्यवस्थित Agriculture Export नेटवर्क किसानों और FPO के लिए घरेलू बाजार के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण विकल्प तैयार कर सकता है।
खासकर ऐसी फसलों में जहां किसी सीजन में स्थानीय स्तर पर सरप्लस उत्पादन हो जाता है, वैकल्पिक बाजार उपलब्ध होने से उत्पाद की खपत का दायरा बढ़ सकता है।
यूपी के कृषि और औद्यानिकी निर्यात में हुआ इजाफा
सरकार की ओर से साझा आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश से कृषि एवं औद्यानिकी आधारित प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात में पिछले वर्षों के दौरान वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2016-17 में इस श्रेणी का निर्यात करीब 727 करोड़ रुपये बताया गया था। वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर करीब 1,132 करोड़ रुपये हो गया। इस तरह नौ वर्षों में निर्यात मूल्य में करीब 405 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह लगभग 56 प्रतिशत की वृद्धि बैठती है।
उत्तर प्रदेश की कृषि एवं औद्यानिकी उपज अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी, सऊदी अरब, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और स्वीडन सहित विभिन्न देशों तक पहुंचने की जानकारी दी गई है।ये आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में कृषि निर्यात का आधार पहले से मौजूद है। अब चुनौती इसे और अधिक जिलों, FPO और किसानों तक पहुंचाने की है।
FPO बन सकते हैं छोटे किसानों के लिए बड़ी ताकत
Farmer Producer Organization यानी FPO इस पूरी व्यवस्था में अहम कड़ी बन सकता है। एक छोटे किसान के लिए अकेले निर्यात बाजार तक पहुंचना आसान नहीं होता। कम उत्पादन मात्रा, पैकेजिंग, गुणवत्ता जांच, खरीदार खोजने और लॉजिस्टिक्स जैसी कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आती हैं।
लेकिन यदि सैकड़ों किसान FPO के माध्यम से जुड़े हों तो उनकी सामूहिक उत्पादन क्षमता काफी बढ़ जाती है। मान लीजिए किसी विदेशी खरीदार को बड़ी मात्रा में एक निश्चित गुणवत्ता का कृषि उत्पाद चाहिए। अकेला किसान शायद इतनी मात्रा उपलब्ध नहीं करा पाए, लेकिन FPO अपने सदस्य किसानों से उत्पाद एकत्र करके खरीदार की मांग के मुताबिक आपूर्ति तैयार कर सकता है।यही वजह है कि FPO और निर्यातकों के बीच सीधा संपर्क कृषि निर्यात बढ़ाने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
क्वालिटी होगी सबसे बड़ी शर्त
विदेशी बाजार तक पहुंचने के लिए किसानों को गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में केवल उत्पाद की मात्रा नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता, सुरक्षा और ट्रेसबिलिटी भी महत्वपूर्ण होती है।
बैठक में मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी इस बात पर जोर दिया कि प्रदेश की उपज गुणवत्तापूर्ण होने के साथ संबंधित देशों के निर्धारित मानकों पर खरी उतरनी चाहिए। अलग-अलग देशों में खाद्य और कृषि उत्पादों के आयात को लेकर अलग नियम हो सकते हैं। इसलिए किसानों, FPO और निर्यातकों के बीच उत्पादन से पहले संवाद महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि निर्यातक पहले ही FPO को बता दे कि उसे किस आकार, ग्रेड या गुणवत्ता का उत्पाद चाहिए तो किसान उसी हिसाब से उत्पादन और कटाई के बाद की प्रक्रिया पर काम कर सकते हैं। इससे उत्पाद रिजेक्ट होने का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
जेवर एयरपोर्ट से बढ़ सकती हैं नई संभावनाएं
उत्तर प्रदेश में कृषि निर्यात के भविष्य को जेवर में विकसित हो रहे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि एयर कार्गो की सुविधाएं बढ़ने से प्रदेश के कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक तेजी से पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
फल, सब्जियां और कई दूसरे कृषि उत्पाद जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इनके निर्यात में समय बेहद महत्वपूर्ण है। खेत से पैकिंग सेंटर और वहां से एयरपोर्ट तक मजबूत कोल्ड चेन और तेज परिवहन उपलब्ध होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक ताजा उत्पाद पहुंचाना आसान हो सकता है।
जेवर के पास इंटीग्रेटेड टेस्टिंग ट्रीटमेंट पार्क विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। यहां अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप परीक्षण, प्रमाणन और पैकेजिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है। यदि ये सुविधाएं प्रभावी रूप से किसानों, FPO और निर्यातकों को उपलब्ध होती हैं तो निर्यात के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे को मजबूती मिल सकती है।
सरकार से मिलने वाली सहायता की जानकारी भी ऑनलाइन
नई डिजिटल व्यवस्था में केवल विदेशी बाजार की जानकारी ही नहीं बल्कि सरकारी सहयोग और योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने की भी तैयारी है। उत्तर प्रदेश निर्यात प्रोत्साहन नीति 2025-30 में FPO सहित पात्र निर्यातकों और इकाइयों के लिए विभिन्न प्रकार के समर्थन का प्रावधान किया गया है। नीति में विपणन और व्यापार मेलों में भागीदारी, पात्र हवाई और समुद्री मालभाड़ा सहायता, ई-कॉमर्स ऑनबोर्डिंग तथा कुछ अन्य निर्यात प्रोत्साहनों का उल्लेख है। ऐसे में किसानों और FPO के लिए यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि कौन-सी सुविधा उनके लिए लागू होती है और उसके लिए पात्रता तथा आवेदन प्रक्रिया क्या है।
आलू किसानों के लिए भी सरकार ने गिनाए कदम
बैठक में आलू किसानों को लेकर उठाए जा रहे कदमों का भी उल्लेख किया गया। सरकार के मुताबिक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से किसानों को राहत देने के उद्देश्य से 1,000 करोड़ रुपये के भामाशाह भाव स्थिरता कोष का प्रावधान किया गया है।
इसके अलावा शीतगृह में भंडारित आलू के लिए 100 रुपये प्रति क्विंटल शीतगृह किराये पर अनुदान और प्रमाणित आलू बीज की बिक्री दर में 1,000 रुपये प्रति क्विंटल की छूट की व्यवस्था की जानकारी दी गई। बेहतर आलू कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने के लिए भी सरकारी सहायता की व्यवस्था किए जाने की बात कही गई है।
आलू जैसी फसलों में भंडारण और बाजार भाव का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। उत्पादन अधिक होने की स्थिति में बाजार कीमत पर दबाव आ सकता है। इसलिए भंडारण, प्रसंस्करण और वैकल्पिक बाजार किसानों के लिए अहम हो जाते हैं।
किसान से विदेशी ग्राहक तक बनेगी नई सप्लाई चेन
FPO और निर्यातकों के बीच हुआ समझौता केवल एक औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित न रहे, इसके लिए जमीनी स्तर पर मजबूत सप्लाई चेन बनानी होगी। इस व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से चार चीजों पर निर्भर करेगी। पहली, निर्यात योग्य गुणवत्ता का उत्पादन। दूसरी, किसान और FPO को सही समय पर विदेशी बाजार की मांग की जानकारी। तीसरी, टेस्टिंग, ग्रेडिंग और पैकेजिंग का मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर। चौथी, एयर और समुद्री कार्गो तक किफायती तथा तेज लॉजिस्टिक्स। इन चारों कड़ियों को जोड़ा जाता है तो उत्तर प्रदेश के दूरदराज जिलों के किसानों के लिए भी निर्यात बाजार तक पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है।
किसानों को क्या करना होगा?
किसानों के लिए पहला कदम अपने क्षेत्र में सक्रिय और विश्वसनीय FPO की जानकारी हासिल करना हो सकता है। इसके बाद यह समझना जरूरी होगा कि FPO किन उत्पादों पर काम कर रहा है और किन खरीदारों या निर्यातकों से उसका संपर्क है। निर्यात के उद्देश्य से खेती करने से पहले किसान को फसल की किस्म, गुणवत्ता मानक, उत्पादन प्रक्रिया और खरीद की शर्तें साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए। सिर्फ यह सुनकर किसी नई फसल में निवेश करना कि उसका निर्यात होता है, सही रणनीति नहीं होगी। बाजार की मांग और लिखित खरीद शर्तों को समझना महत्वपूर्ण है। FPO इस मामले में किसान और खरीदार के बीच सूचना का अंतर कम कर सकता है।
यूपी की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा मौका
उत्तर प्रदेश सरकार राज्य की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इस लक्ष्य में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कृषि उत्पाद को सीधे कच्चे रूप में बेचने के बजाय यदि उसकी ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग की जाए तो उसकी वैल्यू बढ़ सकती है। इससे गांवों और छोटे शहरों में पैक हाउस, कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग, परिवहन और लॉजिस्टिक्स जैसी गतिविधियों का भी विस्तार हो सकता है। यानी कृषि निर्यात का असर केवल खेत और किसान तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरी ग्रामीण सप्लाई चेन में नए आर्थिक अवसर पैदा हो सकते हैं।
निष्कर्ष: समझौते के बाद अब जमीन पर नतीजों की परीक्षा
उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों को कृषि निर्यात नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में FPO और निर्यातकों के बीच हुआ समझौता एक महत्वपूर्ण कदम है। करीब 3,000 निर्यातकों का नेटवर्क, नई डिजिटल व्यवस्था, टेस्टिंग और पैकेजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी तथा बढ़ते कृषि निर्यात के आंकड़े प्रदेश के लिए संभावनाएं दिखाते हैं।
लेकिन किसानों के लिए असली फायदा तभी होगा जब यह व्यवस्था गांव और खेत के स्तर तक प्रभावी तरीके से पहुंचे। किसान को समय पर बाजार की जानकारी मिले, निर्यातक से स्पष्ट खरीद शर्तें तय हों, गुणवत्ता जांच की सुविधा मिले और उपज को कम लागत में विदेशी बाजार तक पहुंचाने का रास्ता तैयार हो।अगर FPO, किसान, निर्यातक और सरकारी एजेंसियों के बीच यह तालमेल सफल रहता है तो उत्तर प्रदेश की कृषि उपज के लिए स्थानीय मंडी से आगे वैश्विक बाजार के नए दरवाजे खुल सकते हैं।
