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Home कृषि समाचार

प्रशिक्षण से बदली सोच, वैज्ञानिक खेती से बढ़ी आमदनी: शंकर दत्त की प्रेरणादायक कहानी

Training changed mindset, scientific farming increased income: Shankar Dutt's inspiring story

Emran Khan by Emran Khan
September 1, 2026
in कृषि समाचार, सफ़लता की कहानी
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प्रशिक्षण

प्रशिक्षण

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उत्तराखंड का नैनीताल जनपद अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ों, जंगलों और धार्मिक स्थलों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इसी जनपद में स्थित छोटा कैलाश देवों के देव महादेव की नगरी के रूप में अपनी धार्मिक आस्था के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां की प्राकृतिक परिस्थितियां जहां लोगों को आकर्षित करती हैं, वहीं इस क्षेत्र के किसान कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच खेती और पशुपालन को अपनी आजीविका का आधार बनाकर आगे बढ़ रहे हैं।

इन्हीं किसानों में एक नाम है श्री शंकर दत्त का। कभी पारंपरिक तौर-तरीकों से खेती और पशुपालन करने वाले शंकर दत्त ने समय के साथ अपनी सोच बदली। उन्होंने समझा कि केवल मेहनत से कृषि को अधिक लाभकारी नहीं बनाया जा सकता, बल्कि मेहनत के साथ वैज्ञानिक जानकारी, बेहतर तकनीक, गुणवत्तापूर्ण प्रबंधन और समय पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन भी जरूरी है।

यही सोच उनके कृषि जीवन में बदलाव की वजह बनी। कृषि एवं पशुपालन से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के बाद उन्होंने सीखी हुई तकनीकों को अपने खेत और पशुपालन में लागू करना शुरू किया। इसका असर धीरे-धीरे उनके उत्पादन, प्रबंधन और आमदनी पर दिखाई देने लगा।

आज श्री शंकर दत्त केवल अपने परिवार के लिए खेती करने वाले किसान नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर आगे बढ़ने वाले एक प्रगतिशील किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।

बचपन से ही खेत और पशुओं के बीच बीता जीवन

श्री शंकर दत्त का बचपन कृषि और पशुपालन के वातावरण में बीता। उनके परिवार में खेती केवल एक काम नहीं थी, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। उन्होंने बचपन से अपने परिवार के बुजुर्गों को खेतों में काम करते, फसलों की देखभाल करते और पशुओं का पालन करते हुए देखा।

खेत में बीज डालने से लेकर फसल की कटाई तक की प्रक्रिया और पशुओं की देखभाल जैसे काम उनके जीवन का हिस्सा बनते गए। परिवार में अपनाई जाने वाली पारंपरिक कृषि पद्धतियां ही उनके लिए खेती का शुरुआती ज्ञान थीं।

शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भी अपने परिवार की कृषि परंपरा को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। उन्होंने कृषि एवं पशुपालन को अपनी आजीविका का आधार बनाया। शुरुआत में उन्होंने वही तरीके अपनाए, जिन्हें उन्होंने अपने परिवार से सीखा था।

मेहनत करने में वे कभी पीछे नहीं रहे, लेकिन समय के साथ उन्हें महसूस हुआ कि मेहनत के बावजूद कृषि से मिलने वाली आमदनी उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थी।

मेहनत अधिक, लेकिन आमदनी सीमित

पारंपरिक तरीके से खेती करने में श्रम और समय दोनों अधिक लगते थे। उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल भी हमेशा उस तरीके से नहीं हो पाता था, जिससे उत्पादन और आमदनी को बेहतर बनाया जा सके।

पशुपालन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। पशुओं की देखभाल तो होती थी, लेकिन वैज्ञानिक पोषण, प्रबंधन और दुग्ध उत्पादन से जुड़ी तकनीकों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी। इसका सीधा असर पशु स्वास्थ्य और दूध उत्पादन पर पड़ता था।

श्री दत्त के लिए यह एक महत्वपूर्ण अनुभव था। उन्होंने महसूस किया कि अगर खेती और पशुपालन को वैज्ञानिक तरीके से किया जाए, तो उपलब्ध संसाधनों से ही बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

उनके मन में एक सवाल पैदा हुआ—क्या खेती केवल परंपरा के आधार पर की जानी चाहिए या बदलते समय के साथ नई तकनीकों को भी अपनाया जाना चाहिए?

यही सवाल आगे चलकर उनके लिए बदलाव की शुरुआत बना।

प्रगतिशील किसानों से मिली नई राह

कृषि कार्य के दौरान श्री शंकर दत्त की मुलाकात आसपास के कुछ प्रगतिशील किसानों से हुई। इन किसानों के साथ बातचीत ने उनके सामने खेती के नए विकल्पों की तस्वीर रखी।

उन्होंने जाना कि कई किसान कृषि एवं पशुपालन में प्रशिक्षण लेकर नई तकनीकों को अपना रहे हैं। कुछ किसान फसल विविधीकरण पर काम कर रहे थे, तो कुछ बेहतर पशु प्रबंधन और दुग्ध उत्पादन के माध्यम से अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे।

इन्हीं बातचीत के दौरान उन्हें पंतनगर में आयोजित कृषि एवं पशुपालन संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बारे में जानकारी मिली।

श्री दत्त ने इस अवसर को गंभीरता से लिया। उन्होंने कृषि विभाग से संपर्क किया और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने का निर्णय लिया।

प्रशिक्षण बना जीवन में बदलाव का माध्यम

श्री शंकर दत्त ने विभाग के माध्यम से विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इनमें उन्नत फसल उत्पादन, पशुपालन और उन्नत दुग्ध उत्पादन जैसे विषय शामिल थे।

इन प्रशिक्षणों ने उनके लिए खेती को देखने का नजरिया बदल दिया।

पहले खेती में उनका जोर मुख्य रूप से मेहनत और पारंपरिक अनुभव पर था। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने समझा कि खेती एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसमें फसल का चयन, उत्पादन तकनीक, समय पर कृषि कार्य, उपलब्ध संसाधनों का प्रबंधन और विशेषज्ञ सलाह सभी महत्वपूर्ण हैं।

उन्हें यह भी समझ आया कि पशुपालन में केवल पशु रखना पर्याप्त नहीं है। पशुओं के लिए संतुलित पोषण, स्वच्छता, उचित देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है।

प्रशिक्षण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि श्री दत्त ने इसे केवल कक्षा या प्रशिक्षण केंद्र तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने वहां मिली जानकारी को अपने खेत और पशुपालन व्यवस्था में लागू करने का प्रयास किया।

सीखी हुई तकनीक को खेत तक पहुंचाया

प्रशिक्षण के बाद श्री दत्त ने अपने खेत में विभिन्न उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाना शुरू किया। उन्होंने पारंपरिक अनुभव और वैज्ञानिक जानकारी के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।

उनका मानना था कि किसानों के पास वर्षों का व्यावहारिक अनुभव होता है, लेकिन जब इस अनुभव के साथ वैज्ञानिक जानकारी जुड़ती है तो कृषि की क्षमता और बढ़ जाती है।

उन्होंने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने, फसल प्रबंधन को व्यवस्थित करने और खेती में विविधता लाने पर ध्यान दिया।

इसी क्रम में उन्होंने अपने खेत में मटर की खेती भी की। मटर उत्पादन ने उन्हें अतिरिक्त आमदनी का अवसर दिया।

फसल विविधीकरण से उन्हें यह अनुभव मिला कि किसान केवल एक पारंपरिक फसल पर निर्भर रहने के बजाय अपनी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग फसलों को कृषि प्रणाली में शामिल करके आय के नए अवसर पैदा कर सकता है।

मटर की खेती और बेहतर कृषि प्रबंधन ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि सीमित संसाधनों और छोटी जोत के बावजूद यदि खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो आमदनी में सुधार संभव है।

पशुपालन को बनाया आय का मजबूत आधार

श्री शंकर दत्त की सफलता केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रही। उन्होंने पशुपालन और दुग्ध उत्पादन में भी प्रशिक्षण से मिली जानकारी को अपनाया।

उन्होंने पशुओं के पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और बेहतर प्रबंधन पर ध्यान देना शुरू किया।

उनके लिए पशुपालन अब केवल परिवार की पारंपरिक गतिविधि नहीं रहा। धीरे-धीरे यह परिवार की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

उन्होंने महसूस किया कि पशुओं की उचित देखभाल और संतुलित पोषण का सीधा संबंध उनके स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन से है। वैज्ञानिक जानकारी मिलने के बाद पशुपालन को अधिक व्यवस्थित तरीके से करने में उन्हें मदद मिली।

कृषि और पशुपालन का यह संयोजन उनके लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हुआ। इससे परिवार के पास आय के एक से अधिक स्रोत उपलब्ध हुए।

प्रशिक्षण का सबसे बड़ा परिणाम—आय में वृद्धि

किसी भी प्रशिक्षण की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन तब होता है, जब उससे किसान के खेत और परिवार के जीवन में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे।

श्री शंकर दत्त के मामले में यह बदलाव उनकी आय में भी दिखाई दिया।

वे बताते हैं कि पहले खेती और दुग्ध उत्पादन से उन्हें लगभग ₹80,000 से ₹1,00,000 वार्षिक आय प्राप्त होती थी। प्रशिक्षण प्राप्त करने और नई तकनीकों को अपनाने के बाद कृषि एवं पशुपालन गतिविधियों में सुधार हुआ।

वर्तमान में उनकी वार्षिक आय बढ़कर लगभग ₹1,00,000 से ₹2,00,000 तक पहुंच गई है।

यह वृद्धि उनके लिए केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है। यह उस बदलाव का परिणाम है, जो उनके कृषि ज्ञान और सोच में आया।

श्री दत्त का अनुभव बताता है कि किसान की आय बढ़ाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। कई बार उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल, सही तकनीक और समय पर निर्णय ही महत्वपूर्ण अंतर पैदा कर सकते हैं।

प्रशिक्षण ने खोला सीखने का नया संसार

पंतनगर में आयोजित प्रशिक्षणों ने श्री दत्त को केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि दूसरे किसानों से सीखने का अवसर भी प्रदान किया।

उत्तराखंड के अलग-अलग जनपदों से किसान इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। विभिन्न क्षेत्रों से आए किसानों के साथ बातचीत के दौरान श्री दत्त ने अलग-अलग कृषि प्रणालियों और किसानों के अनुभवों को समझा।

उन्होंने पाया कि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद किसानों की कई समस्याएं समान होती हैं।

किसानों के बीच अनुभवों का आदान-प्रदान उनके लिए प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। दूसरे किसानों द्वारा अपनाई गई सफल तकनीकों और उनके अनुभवों से उन्हें नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिली।

इस अनुभव ने उनके अंदर सीखने की इच्छा को और मजबूत किया।

वैज्ञानिकों से सीधे संपर्क ने बढ़ाया आत्मविश्वास

श्री शंकर दत्त की सफलता में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों का तकनीकी मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा।

कृषि में कई बार ऐसी समस्याएं सामने आती हैं, जिनका समाधान किसान अपने अनुभव से नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह महत्वपूर्ण हो जाती है।

श्री दत्त बताते हैं कि जब उन्हें खेती या पशुपालन से संबंधित किसी समस्या का सामना करना पड़ता है, तो वे पंतनगर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से फोन के माध्यम से सलाह लेते हैं।

समय पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन मिलने से उन्हें निर्णय लेने में सुविधा होती है। इससे संभावित नुकसान को कम करने और कृषि कार्य को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।

यह अनुभव दूसरे किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है कि कृषि से जुड़ी समस्या आने पर अनुमान या परंपरागत धारणाओं के बजाय कृषि विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों से सलाह लेना अधिक उपयोगी हो सकता है।

मेहनत को मिला सम्मान

श्री शंकर दत्त की कृषि यात्रा को विभिन्न स्तरों पर सम्मान भी मिला।

उनकी मेहनत, सीखने की प्रवृत्ति और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाने के प्रयासों को देखते हुए उन्हें ATMA योजना के अंतर्गत वर्ष 2025–26 में जनपद स्तर पर ‘सर्वश्रेष्ठ कृषक–किसान श्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान उनके लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि था। उनके द्वारा अपनाई गई कृषि पद्धतियों और प्रयासों को संस्थागत पहचान मिली।

इसके अतिरिक्त किसान दिवस के अवसर पर उन्हें प्रगतिशील किसान के रूप में जिलाधिकारी, नैनीताल द्वारा प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

इन सम्मानों ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया। साथ ही उन्हें यह प्रेरणा मिली कि कृषि में सीखने और प्रयोग करने की प्रक्रिया को आगे भी जारी रखना चाहिए।

पारंपरिक अनुभव और आधुनिक ज्ञान का मेल

श्री शंकर दत्त की कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने पारंपरिक कृषि ज्ञान को पूरी तरह छोड़ा नहीं, बल्कि उसके साथ आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को जोड़ा।

उनका अनुभव बताता है कि किसान के पास अपने क्षेत्र, मिट्टी, मौसम और फसलों को लेकर जो स्थानीय अनुभव होता है, वह महत्वपूर्ण है। लेकिन जब इस अनुभव के साथ वैज्ञानिक प्रशिक्षण और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन जुड़ता है, तो किसान बेहतर निर्णय ले सकता है।

आज श्री दत्त खेती को केवल शारीरिक मेहनत के रूप में नहीं देखते। उनके लिए खेती अब ज्ञान, प्रबंधन, तकनीक और निरंतर सीखने की प्रक्रिया भी है।

यही सोच उन्हें अन्य किसानों से अलग पहचान देती है।

खेती अब केवल परंपरा नहीं, व्यवसाय भी

समय के साथ श्री दत्त की सोच में आया बदलाव उनकी कृषि व्यवस्था में साफ दिखाई देता है।

पहले खेती और पशुपालन मुख्य रूप से पारिवारिक परंपरा थी। अब वे इसे अधिक वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से करने का प्रयास करते हैं।

फसल विविधीकरण, मटर उत्पादन, पशुपालन में वैज्ञानिक प्रबंधन और विशेषज्ञों से सलाह लेना उनकी कृषि व्यवस्था का हिस्सा बन गया है।

इस बदलाव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि खेती को यदि व्यवसाय की तरह योजनाबद्ध तरीके से किया जाए, तो उपलब्ध संसाधनों से बेहतर आर्थिक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

दूसरे किसानों के लिए संदेश

श्री शंकर दत्त की सफलता उन किसानों के लिए प्रेरणा है, जो आज भी पारंपरिक कृषि पद्धतियों तक सीमित हैं और मेहनत के बावजूद अपेक्षित आमदनी हासिल नहीं कर पा रहे हैं।

उनकी कहानी बताती है कि बदलाव की शुरुआत सीखने और नई जानकारी स्वीकार करने से होती है।

किसान यदि कृषि विभाग, ATMA, SAMETI और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़ें, वैज्ञानिकों से सलाह लें और प्रशिक्षण में सीखी तकनीकों को अपने खेत पर प्रयोग के रूप में लागू करें, तो धीरे-धीरे कृषि व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।

जरूरी यह भी है कि किसान किसी नई तकनीक को अपनाने से पहले अपनी स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और विशेषज्ञ सलाह को ध्यान में रखें।

संस्थानों के सहयोग को दिया श्रेय

श्री शंकर दत्त अपनी सफलता में सहयोग देने वाले संस्थानों और अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

वे उत्तराखंड सरकार, कृषि विभाग, ATMA योजना, SAMETI पंतनगर तथा गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों और अधिकारियों का धन्यवाद करते हैं।

इन संस्थानों से प्राप्त प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन ने उन्हें अपनी कृषि व्यवस्था को बेहतर बनाने का अवसर दिया।

उनका अनुभव यह भी दिखाता है कि किसान की सफलता केवल किसान की व्यक्तिगत मेहनत का परिणाम नहीं होती। इसके पीछे कृषि वैज्ञानिकों, प्रशिक्षण संस्थानों, कृषि विभाग और किसान समुदाय के बीच मजबूत संपर्क भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सफलता की असली कहानी सोच में बदलाव की है

श्री शंकर दत्त की कहानी को केवल आय में वृद्धि की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी सोच में आया बदलाव है।

उन्होंने यह समझा कि कृषि में बेहतर परिणाम के लिए मेहनत के साथ ज्ञान भी जरूरी है। उन्होंने प्रशिक्षण लिया, विशेषज्ञों से संपर्क किया, दूसरे किसानों से सीखा और प्राप्त ज्ञान को अपने खेत पर लागू किया।

इसी निरंतर प्रक्रिया ने उन्हें पारंपरिक किसान से प्रगतिशील किसान की दिशा में आगे बढ़ाया।

उनकी यात्रा यह संदेश देती है कि कृषि में सफलता एक दिन में नहीं मिलती। यह लगातार सीखने, प्रयोग करने, गलतियों से सीखने और उपलब्ध अवसरों का सही उपयोग करने से हासिल होती है।

भविष्य की राह—सीखना और आगे बढ़ना

आज श्री शंकर दत्त कृषि एवं पशुपालन को पहले की तुलना में अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते हैं। प्रशिक्षण से मिले ज्ञान ने उनके अंदर नई तकनीकों को सीखने और उन्हें व्यवहार में आजमाने की इच्छा पैदा की है।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसानों तक तकनीक पहुंचाने के साथ-साथ उन्हें उसका व्यवहारिक प्रशिक्षण देना बेहद जरूरी है।

यदि किसान को केवल तकनीक की जानकारी दी जाए लेकिन उसे खेत पर लागू करने का तरीका न बताया जाए, तो उसका लाभ सीमित रह सकता है। वहीं प्रशिक्षण, प्रदर्शन, विशेषज्ञ मार्गदर्शन और किसान-से-किसान सीखने की प्रक्रिया कृषि में स्थायी बदलाव ला सकती है।

निष्कर्ष: ज्ञान से समृद्धि की ओर

श्री शंकर दत्त की यात्रा उत्तराखंड के एक किसान की व्यक्तिगत सफलता से कहीं अधिक व्यापक संदेश देती है।

यह कहानी बताती है कि कृषि में बदलाव खेत से पहले किसान की सोच में आता है। जब किसान सीखने के लिए तैयार होता है, वैज्ञानिक सलाह को स्वीकार करता है और नई तकनीकों को व्यवहार में उतारता है, तो उसकी मेहनत का बेहतर आर्थिक परिणाम सामने आ सकता है।

पारंपरिक खेती और पशुपालन से शुरुआत करने वाले शंकर दत्त ने प्रशिक्षण के माध्यम से अपने कृषि ज्ञान का विस्तार किया। उन्होंने उन्नत फसल उत्पादन, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन से जुड़ी जानकारी हासिल की, उसे अपने खेत पर लागू किया, मटर जैसी फसल को अपनाया और पशुपालन में वैज्ञानिक प्रबंधन को महत्व दिया।

इसका परिणाम उनकी आय में वृद्धि के रूप में सामने आया। जहां पहले खेती और दुग्ध उत्पादन से लगभग ₹80 हजार से ₹1 लाख वार्षिक आय होती थी, वहीं वर्तमान में यह बढ़कर लगभग ₹1 लाख से ₹2 लाख तक पहुंच गई है।

उनकी उपलब्धियों को ATMA के अंतर्गत ‘सर्वश्रेष्ठ कृषक–किसान श्री’ सम्मान और जिलाधिकारी, नैनीताल द्वारा किसान दिवस पर प्रशस्ति-पत्र के रूप में भी पहचान मिली।

श्री शंकर दत्त की कहानी का सार एक ही वाक्य में कहा जा सकता है—

“जब किसान की मेहनत के साथ वैज्ञानिक ज्ञान, प्रशिक्षण और सही समय पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन जुड़ता है, तो खेती केवल आजीविका नहीं रहती, बल्कि समृद्धि का रास्ता बन जाती है।”

उनकी सफलता दूसरे किसानों के लिए भी यही संदेश देती है कि नई जानकारी से डरने के बजाय उसे सीखें, प्रशिक्षण से जुड़ें, वैज्ञानिकों से सलाह लें और अपनी परिस्थितियों के अनुसार तकनीक को खेत तक पहुंचाएं।

क्योंकि बदलते कृषि परिदृश्य में किसान की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी मेहनत नहीं, बल्कि मेहनत के साथ जुड़ा ज्ञान और सही निर्णय लेने की क्षमता भी है।

स्रोत: राज्य कृषि प्रबंधन एवं प्रसार प्रशिक्षण संस्थान (SAMETI), उत्तराखंड; गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर।

Tags: AgricultureFarmingSuccess Story
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