आज, 15 सितंबर 2026 से देश में कीटनाशक कारोबार से जुड़ी नियामकीय व्यवस्था में बड़ा बदलाव लागू हो गया है। अब कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों, आयातकों, विक्रेताओं और वितरकों को लाइसेंस लेने, लाइसेंस का नवीनीकरण कराने और कारोबार से जुड़े रिकॉर्ड रखने के लिए कागजी प्रक्रिया पर निर्भर नहीं रहना होगा। संशोधित कीटनाशक नियम, 2026 के तहत अब इन प्रक्रियाओं को डिजिटल माध्यम से पूरा करना होगा।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 17 जून 2026 को कीटनाशक नियमों में संशोधन की अधिसूचना जारी की थी। आज से इसके नए प्रावधान प्रभावी हो गए हैं। सरकार का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य कीटनाशक क्षेत्र की निगरानी को आधुनिक बनाना, कारोबार में पारदर्शिता बढ़ाना और खेत तक पहुंचने वाले कीटनाशक की पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर बेहतर नजर रखना है।
नई व्यवस्था का असर तकनीकी श्रेणी के कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों से लेकर तैयार कीटनाशक उत्पाद बनाने वाले कारखानों, आयातकों, थोक विक्रेताओं और खुदरा दुकानदारों तक पड़ेगा।
आज से ऑनलाइन होगा लाइसेंस का काम
संशोधित नियमों के तहत कीटनाशक निर्माण और बिक्री से जुड़े लाइसेंस के लिए अब ऑनलाइन आवेदन करना होगा। लाइसेंस के नवीनीकरण की प्रक्रिया भी डिजिटल माध्यम से पूरी की जाएगी। इसके लिए संशोधित प्रपत्र-दो का इस्तेमाल किया जाएगा।
पहले कई जगहों पर लाइसेंस से संबंधित आवेदन, दस्तावेज और अन्य जानकारी कागजों में जमा की जाती थी। इससे आवेदन की जांच और स्वीकृति की प्रक्रिया में समय लग सकता था। नई व्यवस्था में आवेदन और उससे संबंधित जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध होने से प्रक्रिया को तेज और अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया गया है।
राज्य स्तर के लाइसेंसिंग अधिकारी अब डिजिटल प्रणाली के माध्यम से आवेदन की जांच और लाइसेंस से जुड़ी कार्रवाई करेंगे।
कागजी रजिस्टर की जगह डिजिटल रिकॉर्ड
आज से कीटनाशक कारोबार में रिकॉर्ड रखने का तरीका भी बदल गया है। निर्माताओं, आयातकों और विक्रेताओं को बिक्री, वितरण, उत्पादन, खरीद, आयात और भंडार से संबंधित जानकारी डिजिटल रूप में रखनी होगी।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी कीटनाशक की पूरी आपूर्ति श्रृंखला का रिकॉर्ड उपलब्ध रहे। किसी उत्पाद का निर्माण कहां हुआ, कितनी मात्रा में हुआ, किसे बेचा गया, कहां भेजा गया और कितना माल भंडार में बचा है, जैसी जानकारी डिजिटल व्यवस्था में दर्ज की जा सकेगी।
इससे नियामक अधिकारियों को बाजार में कीटनाशकों की स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।
हर महीने देना होगा इलेक्ट्रॉनिक विवरण
नए नियमों के तहत कीटनाशक कारोबार से जुड़े प्रतिष्ठानों को प्रत्येक महीने की जानकारी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जमा करनी होगी। यह विवरण संबंधित महीने की समाप्ति के 15 दिनों के भीतर देना होगा।
तकनीकी श्रेणी के कीटनाशकों और तैयार कीटनाशक उत्पादों के लिए अलग-अलग प्रारूप निर्धारित किए गए हैं। कंपनियों को निर्धारित प्रारूप के अनुसार अपनी जानकारी ऑनलाइन जमा करनी होगी।
इस व्यवस्था से सरकार को देशभर में कीटनाशकों के उत्पादन, बिक्री और भंडार की स्थिति पर अधिक तेजी से नजर रखने में मदद मिल सकती है। फसल मौसम के दौरान किसी क्षेत्र में किसी विशेष कीटनाशक की मांग अचानक बढ़ने या उपलब्धता कम होने की स्थिति का भी जल्दी पता लगाया जा सकेगा।
निरीक्षण रिपोर्ट भी होगी डिजिटल
कीटनाशक कारोबार से जुड़े प्रतिष्ठानों के निरीक्षण की प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया है। अब अधिकारियों द्वारा किए गए निरीक्षण की जानकारी डिजिटल रूप में दर्ज की जाएगी।
पहले निरीक्षण से जुड़े रिकॉर्ड कागजी दस्तावेजों में रखे जाते थे। डिजिटल रिकॉर्ड से निरीक्षण की जानकारी को सुरक्षित रखना और आवश्यकता पड़ने पर उसे दोबारा देखना आसान हो सकता है।
इससे यह भी पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी निर्माता, विक्रेता या अन्य कारोबारी प्रतिष्ठान का पहले निरीक्षण कब हुआ था और उस दौरान क्या कमियां सामने आई थीं।
प्रयोगशाला जांच की जानकारी भी ऑनलाइन
कीटनाशकों की गुणवत्ता और अवशेष संबंधी जांच की जानकारी को भी डिजिटल माध्यम से भेजने की व्यवस्था की गई है। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों के परिणाम इलेक्ट्रॉनिक रूप से उपलब्ध कराए जाएंगे।
इससे गुणवत्ता संबंधी मामलों में जानकारी भेजने और कार्रवाई करने में तेजी आने की उम्मीद है। यदि किसी कीटनाशक के नमूने में गुणवत्ता से जुड़ी समस्या सामने आती है, तो संबंधित जानकारी नियामक अधिकारियों तक तेजी से पहुंच सकती है।
किसानों को खराब गुणवत्ता वाले या मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले कीटनाशकों से बचाने के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
प्रत्येक कीटनाशक पर 2 हजार रुपये शुल्क
संशोधित नियमों में कीटनाशक निर्माण लाइसेंस से संबंधित शुल्क में भी बदलाव किया गया है। अब प्रत्येक कीटनाशक के लिए 2,000 रुपये का लाइसेंस शुल्क निर्धारित किया गया है।
हालांकि एक आवेदन के लिए अधिकतम शुल्क 20,000 रुपये तक सीमित रहेगा। शुल्क का भुगतान भी डिजिटल माध्यम से किया जाएगा।
इससे लाइसेंस शुल्क के भुगतान और उससे संबंधित रिकॉर्ड को भी ऑनलाइन प्रणाली में जोड़ा जा सकेगा।
नकली कीटनाशकों पर नियंत्रण में मदद की उम्मीद
भारत में नकली और अपंजीकृत कीटनाशकों की बिक्री किसानों के लिए बड़ी समस्या रही है। कई बार किसान अधिक कीमत चुकाने के बावजूद ऐसे उत्पाद खरीद लेते हैं जो अपेक्षित गुणवत्ता के नहीं होते। इससे फसल को नुकसान होने के साथ किसानों की लागत भी बढ़ सकती है।
नई डिजिटल व्यवस्था में लाइसेंस, उत्पादन, बिक्री और वितरण से जुड़े रिकॉर्ड को व्यवस्थित तरीके से रखने पर जोर दिया गया है। इससे नियामक एजेंसियों के लिए यह जांचना आसान हो सकता है कि बाजार में उपलब्ध कीटनाशक वैध आपूर्ति श्रृंखला से आया है या नहीं।
हालांकि केवल डिजिटल रिकॉर्ड से नकली कीटनाशकों की समस्या समाप्त नहीं होगी। इसके लिए बाजार निरीक्षण, नमूना जांच और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी जरूरी होगी।
छोटे निर्माताओं और दुकानदारों के सामने चुनौती
डिजिटल व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन छोटे निर्माताओं, विक्रेताओं और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कारोबारियों के सामने शुरुआत में कई चुनौतियां आ सकती हैं।
कई छोटे कारोबारी अभी भी कागजी रजिस्टर पर निर्भर हैं। कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा और डिजिटल साधनों का इस्तेमाल भी सीमित हो सकता है। ऐसे में हर महीने निर्धारित प्रारूप में इलेक्ट्रॉनिक विवरण जमा करना छोटे कारोबारियों के लिए कठिन हो सकता है।
विशेष रूप से छोटे निर्माता और ग्रामीण विक्रेता, जिनके पास अलग से डिजिटल रिकॉर्ड रखने के लिए कर्मचारी नहीं हैं, उन्हें नई व्यवस्था अपनाने के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है।
सरकार को मिलेगी वास्तविक समय की बेहतर जानकारी
डिजिटल व्यवस्था का एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि सरकार को कीटनाशक बाजार की जानकारी अधिक तेजी से मिल सकेगी। उत्पादन, आयात, बिक्री, वितरण और भंडार से जुड़े आंकड़ों के आधार पर नियामक एजेंसियां बाजार की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकेंगी।
किसी क्षेत्र में कीटनाशक की कमी, असामान्य बिक्री या किसी प्रतिबंधित उत्पाद की आवाजाही जैसी स्थिति सामने आने पर जांच की प्रक्रिया भी तेज हो सकती है।
इसके अलावा केंद्रीय स्तर पर कीटनाशक पंजीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े रिकॉर्ड को राज्य स्तर के लाइसेंसिंग आंकड़ों के साथ मिलाकर देखने में भी मदद मिल सकती है।
कंपनियों के लिए बढ़ेगी डिजिटल अनुपालन की जिम्मेदारी
नई व्यवस्था का असर बड़ी कृषि-रसायन कंपनियों पर भी पड़ेगा। भारत में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उनकी भारतीय इकाइयों और अनुबंध के आधार पर उत्पादन करने वाली कंपनियों को भी अपने रिकॉर्ड और रिपोर्टिंग प्रणाली को नए डिजिटल प्रारूप के अनुरूप बनाना होगा।
इससे आने वाले समय में कीटनाशक उत्पादन और बिक्री से जुड़े आंकड़े अधिक मानकीकृत और व्यवस्थित हो सकते हैं।
हालांकि उद्योग जगत में यह चिंता भी है कि डिजिटल प्रणाली को अपनाने में छोटे कारोबारियों को समय लग सकता है। यदि शुरुआत में तकनीकी समस्याएं या पोर्टल से जुड़ी दिक्कतें आती हैं, तो कुछ क्षेत्रों में लाइसेंस और आपूर्ति प्रक्रिया प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
आगे भी हो सकते हैं बड़े बदलाव
आज से लागू हुई डिजिटल व्यवस्था को भारत के कीटनाशक क्षेत्र में नियामकीय सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। सरकार का उद्देश्य वर्षों से चली आ रही कागजी प्रक्रिया को कम करके अधिक पारदर्शी और निगरानी योग्य व्यवस्था तैयार करना है।
इसके साथ ही कीटनाशक क्षेत्र से संबंधित व्यापक कानून में बदलाव की दिशा में भी काम चल रहा है। ऐसे में आने वाले समय में उत्पाद पंजीकरण, आंकड़ों की सुरक्षा, गुणवत्ता नियंत्रण और कंपनियों की जिम्मेदारियों से जुड़े अन्य बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
कुल मिलाकर, 15 सितंबर 2026 से लागू हुई नई डिजिटल व्यवस्था से कीटनाशक कारोबार में लाइसेंस, रिकॉर्ड, निरीक्षण और गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आया है। इसका वास्तविक लाभ तभी दिखाई देगा, जब डिजिटल व्यवस्था सुचारु रूप से चले और छोटे निर्माताओं तथा ग्रामीण विक्रेताओं को इसे अपनाने के लिए पर्याप्त तकनीकी सहायता मिले। यदि ऐसा होता है, तो यह कदम कीटनाशक बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने, नकली उत्पादों पर नियंत्रण मजबूत करने और किसानों तक गुणवत्तापूर्ण कीटनाशक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

