केंद्र सरकार ने खरीफ 2026 मौसम के लिए फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों पर पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) व्यवस्था के तहत ₹41,533.81 करोड़ की सब्सिडी को मंजूरी दी है। इस फैसले के तहत डीएपी, एनपीकेएस समेत फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों की 28 श्रेणियों के लिए सब्सिडी दरें तय की गई हैं। सरकार का उद्देश्य किसानों को उचित कीमत पर जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराना और खेती की लागत को नियंत्रित रखना है।
यह फैसला ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल और उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत के एक बड़े हिस्से के लिए फॉस्फेटिक उर्वरकों और इनके कच्चे माल के आयात पर निर्भर है। ऐसे में सरकार की सब्सिडी व्यवस्था किसानों को वैश्विक कीमतों में होने वाली तेजी के सीधे असर से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
क्या है पोषक तत्व आधारित सब्सिडी व्यवस्था
पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी एनबीएस व्यवस्था के तहत सरकार फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों में मौजूद प्रमुख पोषक तत्वों के आधार पर सब्सिडी तय करती है। इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्व शामिल हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को अलग-अलग पोषक तत्वों वाले उर्वरक उचित कीमत पर मिल सकें। कंपनियों को मिलने वाली सब्सिडी के माध्यम से बाजार में उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने और किसानों पर बढ़ती लागत का बोझ कम करने का प्रयास किया जाता है।
डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरक खेती में फसल की पोषण जरूरत पूरी करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इनकी कीमतों और उपलब्धता का सीधा असर किसानों की खेती की लागत पर पड़ता है।
खरीफ 2026 के लिए 28 श्रेणियों को मंजूरी
खरीफ 2026 के लिए सरकार ने फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों की 28 श्रेणियों को एनबीएस व्यवस्था में शामिल किया है। इसमें डीएपी और विभिन्न प्रकार के एनपीकेएस उर्वरक प्रमुख हैं।
अलग-अलग उर्वरकों में पोषक तत्वों की मात्रा और अनुपात अलग होता है। इसी आधार पर सरकार सब्सिडी का निर्धारण करती है। इससे कंपनियों को उत्पादन और आयात के दौरान लागत के दबाव को संभालने में मदद मिलती है तथा किसानों के लिए उर्वरकों की कीमत को नियंत्रित रखने का प्रयास किया जाता है।
खरीफ मौसम में धान, मक्का, कपास, सोयाबीन, दालें और कई अन्य फसलों की बुवाई होती है। इन फसलों के लिए संतुलित पोषण बेहद जरूरी होता है। इसलिए खरीफ की शुरुआत से पहले उर्वरक सब्सिडी की घोषणा किसानों और उर्वरक उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
डीएपी पर सरकार का विशेष जोर
डीएपी यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले फॉस्फेटिक उर्वरकों में शामिल है। इसमें फॉस्फोरस के साथ नाइट्रोजन भी होता है और इसका इस्तेमाल फसल की शुरुआती बढ़वार तथा जड़ विकास के लिए किया जाता है।
भारत में डीएपी की मांग लगातार बनी रहती है। घरेलू उत्पादन के साथ-साथ देश को डीएपी और इसके लिए जरूरी कच्चे माल का आयात भी करना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया, रॉक फॉस्फेट और सल्फर जैसी सामग्री की कीमतों में बदलाव का असर डीएपी की लागत पर पड़ता है।
ऐसे में सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करती है। यदि वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं तो पूरी बढ़ोतरी किसानों पर डालने के बजाय सरकार सब्सिडी के माध्यम से कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास करती है।
एनपीके खाद की उपलब्धता भी रहेगी महत्वपूर्ण
एनपीके उर्वरक किसानों के बीच इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश अलग-अलग अनुपात में उपलब्ध होते हैं। मिट्टी की जरूरत और फसल के आधार पर किसान अलग-अलग ग्रेड का एनपीके इस्तेमाल करते हैं।
खरीफ मौसम में धान, मक्का, कपास, गन्ना, सब्जियों और दूसरी फसलों के लिए संतुलित पोषण की जरूरत होती है। ऐसे में एनपीके उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता जरूरी है।
सरकार की एनबीएस व्यवस्था से कंपनियों को विभिन्न पोषक तत्वों वाले उर्वरकों की आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलती है। इससे किसानों को एक ही प्रकार की खाद पर निर्भर रहने के बजाय फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरक चुनने का विकल्प मिलता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों पर नजर
भारत के लिए फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों का वैश्विक बाजार काफी महत्वपूर्ण है। रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड, सल्फर, अमोनिया और पोटाश जैसे कच्चे माल की कीमतों में होने वाला बदलाव भारत के उर्वरक बाजार को प्रभावित करता है।
पिछले कुछ समय में वैश्विक स्तर पर आपूर्ति मार्गों में व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा लागत और निर्यात नीतियों में बदलाव के कारण उर्वरक बाजार में अनिश्चितता देखी गई है।
ऐसे माहौल में ₹41,533.81 करोड़ की सब्सिडी का प्रावधान सरकार की ओर से किसानों और उर्वरक क्षेत्र को कीमतों के झटकों से बचाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा सकता है।
किसानों की लागत पर क्या होगा असर
उर्वरक खेती की प्रमुख लागत में शामिल हैं। खासकर धान, मक्का, कपास और अन्य अधिक पोषण मांग वाली फसलों में उर्वरकों पर किसानों का खर्च काफी होता है।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत बढ़ती है तो बिना सरकारी सहायता के इसका असर घरेलू बाजार में भी दिखाई दे सकता है। सब्सिडी के माध्यम से सरकार इस बढ़ी हुई लागत का एक हिस्सा वहन करती है।
इससे किसानों को अपेक्षाकृत स्थिर कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। हालांकि किसान को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सब्सिडी वाली खाद का इस्तेमाल मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के अनुसार ही किया जाए।
संतुलित उर्वरक इस्तेमाल पर जोर जरूरी
सरकार लंबे समय से किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर रही है। केवल यूरिया या केवल किसी एक पोषक तत्व पर अधिक निर्भरता से मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा हो सकता है।
एनपीके, डीएपी और अन्य उर्वरकों का उपयोग फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार किया जाना चाहिए। मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्वों की जरूरत तय करना अधिक प्रभावी तरीका है।
सब्सिडी का उद्देश्य केवल खाद सस्ती करना नहीं है, बल्कि किसानों तक जरूरी पोषक तत्वों की उपलब्धता बनाए रखना भी है। इसलिए इसका लाभ तभी अधिक होगा, जब किसान सही मात्रा और सही समय पर उर्वरक का इस्तेमाल करें।
उर्वरक कंपनियों के लिए भी अहम फैसला
खरीफ 2026 के लिए एनबीएस दरों की मंजूरी उर्वरक कंपनियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। कंपनियां सब्सिडी व्यवस्था के आधार पर उत्पादन, आयात और बाजार में आपूर्ति की अपनी योजना तैयार करती हैं।
डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों की मांग खरीफ मौसम में तेजी से बढ़ती है। इसलिए कंपनियों के लिए समय पर कच्चे माल की खरीद, उत्पादन और आयात की व्यवस्था करना जरूरी होता है।
सरकार की ओर से सब्सिडी का स्पष्ट प्रावधान कंपनियों को बाजार की जरूरत के अनुसार आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर सकता है।
उर्वरक उपलब्धता पर भी रहेगा ध्यान
केवल सब्सिडी की घोषणा पर्याप्त नहीं है। किसानों के लिए समय पर और पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है। खरीफ मौसम में बुवाई के समय उर्वरकों की मांग अचानक बढ़ जाती है।
ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को उर्वरक की आवाजाही, भंडारण और बिक्री पर लगातार निगरानी रखनी होती है। विशेष रूप से डीएपी और एनपीके की उपलब्धता पर नजर रखना जरूरी है, ताकि किसी क्षेत्र में कृत्रिम कमी या जमाखोरी जैसी स्थिति पैदा न हो।
सरकार के लिए यह भी जरूरी होगा कि सब्सिडी का लाभ वास्तविक किसानों तक पहुंचे और उर्वरकों की बिक्री निर्धारित व्यवस्था के अनुसार हो।
आयात पर निर्भरता कम करना भी चुनौती
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। इसके बावजूद फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों के क्षेत्र में आयात की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।
लंबी अवधि में भारत के लिए जरूरी होगा कि घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ कच्चे माल के लिए अलग-अलग देशों पर निर्भरता कम की जाए। इससे वैश्विक बाजार में किसी एक देश की नीति या आपूर्ति में बदलाव का भारतीय किसानों पर कम असर पड़ेगा।
इसके लिए दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते, विभिन्न देशों से आयात के स्रोत बढ़ाना और घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार महत्वपूर्ण रणनीति हो सकती है।
खरीफ सीजन में किसानों के लिए क्या संदेश
खरीफ 2026 में किसानों को डीएपी और एनपीके जैसी खाद की खरीद करते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। खाद हमेशा अधिकृत विक्रेता से ही खरीदें और खरीद की रसीद जरूर लें।
किसान को फसल की जरूरत से ज्यादा खाद खरीदकर रखने से भी बचना चाहिए। मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरक की मात्रा तय करना बेहतर है।
सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी का उद्देश्य किसानों को उचित कीमत पर जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराना है। इसलिए किसानों को निर्धारित दर, उपलब्धता और उर्वरक की गुणवत्ता की जानकारी रखनी चाहिए।
सरकार की बड़ी चुनौती
खरीफ 2026 के लिए ₹41,533.81 करोड़ की सब्सिडी मंजूर करना सरकार की ओर से कृषि लागत को नियंत्रित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इसके साथ वैश्विक बाजार की स्थिति, कच्चे माल की कीमत, आयात लागत और घरेलू मांग पर लगातार नजर रखना भी जरूरी होगा।
डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों की कीमतों को स्थिर रखना किसानों के लिए राहत की बात है, लेकिन लंबे समय में भारत को घरेलू उत्पादन, कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति और संतुलित उर्वरक इस्तेमाल पर अधिक जोर देना होगा।
कुल मिलाकर, खरीफ 2026 के लिए 28 श्रेणियों के फॉस्फेट एवं पोटाश उर्वरकों पर ₹41,533.81 करोड़ की सब्सिडी से सरकार ने किसानों और उर्वरक क्षेत्र को वैश्विक बाजार की अनिश्चितता के बीच राहत देने की कोशिश की है। अब इस फैसले की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों को डीएपी, एनपीके और अन्य उर्वरक समय पर, पर्याप्त मात्रा में और उचित कीमत पर मिलते हैं या नहीं।
