बिहार की पारंपरिक पहचान से जुड़े मगही पान को भौगोलिक संकेतक यानी GI (Geographical Indication) पंजीकरण मिलने के बाद अब इसे किसानों के लिए बेहतर बाजार पहचान और सामूहिक विपणन से जोड़ने की दिशा में पहल की गई है। वर्ष 2018 में GI पंजीकरण प्राप्त करने वाले मगही पान के उत्पादकों को इस पहचान का लाभ दिलाने के लिए किसानों में जागरूकता, क्षमता निर्माण और GI अधिकृत उपयोगकर्ता पंजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया।
इस पहल में ICAR-DMAPR, आनंद और ICAR-AICRP-MAP&B, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके माध्यम से मगही पान उत्पादकों को GI पहचान, इसके उपयोग और सामूहिक स्तर पर उत्पादन एवं विपणन की संभावनाओं के बारे में जानकारी दी गई।
इस अभियान का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि नवादा और नालंदा के 1,001 किसान GI अधिकृत उपयोगकर्ता (GI Authorised Users) बने। इसके साथ ही किसानों को संगठित करने और सामूहिक उत्पादन, ब्रांडिंग, विपणन तथा प्रचार के लिए एक संस्थागत मंच तैयार करने की दिशा में भी काम किया गया।
2018 में मिला था GI पंजीकरण
मगही पान बिहार की पारंपरिक कृषि और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा उत्पाद है। इसे वर्ष 2018 में GI पंजीकरण प्राप्त हुआ। GI टैग किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पाद की पहचान को औपचारिक रूप से दर्ज करता है और उस उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक पहचान को बाजार में स्थापित करने में मदद कर सकता है।
हालांकि केवल GI पंजीकरण प्राप्त हो जाने से किसानों को स्वतः बेहतर कीमत या बड़ा बाजार मिलना सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए किसानों को GI व्यवस्था से जोड़ना, अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में पंजीकरण कराना, उत्पाद की पहचान को बाजार तक पहुंचाना और उत्पादन से लेकर बिक्री तक मजबूत मूल्य श्रृंखला तैयार करना आवश्यक होता है।
मगही पान के मामले में भी इसी दिशा में किसानों को संगठित करने और GI पहचान को व्यावहारिक बाजार अवसरों से जोड़ने का प्रयास किया गया।
किसानों को GI अधिकृत उपयोगकर्ता बनाने पर जोर
GI व्यवस्था में उत्पाद की पहचान के साथ उसके वास्तविक उत्पादकों को इससे जोड़ना महत्वपूर्ण होता है। इसी उद्देश्य से किसानों के बीच जागरूकता कार्यक्रम और क्षमता निर्माण गतिविधियां आयोजित की गईं।
इस पहल के तहत नवादा और नालंदा के 1,001 किसानों ने GI अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में पंजीकरण कराया। इससे इन किसानों को मगही पान की GI पहचान से संस्थागत रूप से जोड़ने का आधार तैयार हुआ।
GI अधिकृत उपयोगकर्ता बनने से उत्पादकों की पहचान संबंधित GI उत्पाद से औपचारिक रूप से जुड़ती है। इससे भविष्य में उत्पाद की ब्रांडिंग, प्रमाणिकता और बाजार में पहचान को मजबूत करने के प्रयासों को आधार मिल सकता है।
मगही पान जैसे पारंपरिक कृषि उत्पादों के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय पहचान को केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित रखने के बजाय उसे संगठित कृषि व्यवसाय और बाजार व्यवस्था से जोड़ने की आवश्यकता होती है।
किसान संगठन बनाने में शिव शंकर कुमार की भूमिका
इस पहल में श्री शिव शंकर कुमार ने किसानों को संगठित करने और सामूहिक मंच तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसानों को एक साथ लाकर Renu and Rajendra Magahi Paan Producer Company Limited (FPC) के गठन की दिशा में काम किया गया।
नवादा में गठित इस किसान उत्पादक कंपनी का उद्देश्य किसानों को सामूहिक रूप से उत्पादन, ब्रांडिंग, मार्केटिंग और प्रचार गतिविधियों से जोड़ना है।
किसान उत्पादक संगठन या कंपनी के माध्यम से छोटे और सीमांत उत्पादकों को सामूहिक स्तर पर काम करने का अवसर मिलता है। व्यक्तिगत किसान के लिए जहां पैकेजिंग, ब्रांडिंग, बाजार संपर्क और प्रचार जैसी गतिविधियां चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं, वहीं सामूहिक संस्था इन कार्यों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ा सकती है।
मगही पान के मामले में भी FPC को मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने वाले संस्थागत मंच के रूप में विकसित करने का प्रयास किया गया है।
उत्पादन से लेकर ब्रांडिंग तक सामूहिक प्रयास
मगही पान की पहचान केवल खेत में उत्पादन तक सीमित नहीं है। किसान के खेत से निकलने के बाद उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने के दौरान कई चरणों से गुजरना पड़ता है।
इनमें संग्रहण, छंटाई, गुणवत्ता बनाए रखना, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, परिवहन, बाजार संपर्क और बिक्री जैसी गतिविधियां शामिल हैं। यदि किसान इन गतिविधियों में सामूहिक रूप से भाग लेते हैं, तो उत्पाद की बाजार पहचान विकसित करने की संभावना बढ़ सकती है।
FPC के गठन के माध्यम से इन्हीं गतिविधियों को सामूहिक रूप से आगे बढ़ाने का आधार तैयार किया गया है।
इसका उद्देश्य किसानों को केवल उत्पादक के रूप में नहीं बल्कि मूल्य श्रृंखला में सक्रिय भागीदार के रूप में स्थापित करना है।
बाजार कीमत में आया अंतर
इस पहल से जुड़े किसानों ने मगही पान की कीमतों में अंतर की जानकारी भी साझा की है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, किसानों ने 200 पत्तियों वाली एक ‘ढोली’ के लिए 280 से 300 रुपये तक के बाजार भाव की सूचना दी।
इसके मुकाबले पहले वाराणसी और गया के बाजारों में 120 से 140 रुपये प्रति ढोली के भाव मिलने की बात सामने आई थी।
यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि उपलब्ध विवरण कीमत में इस अंतर को केवल GI पंजीकरण का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं बताता। कीमत में बदलाव के पीछे बाजार की स्थिति, उत्पाद की गुणवत्ता, सामूहिक विपणन, ब्रांडिंग, मांग, आपूर्ति, बाजार संपर्क और पूरी value chain में हुए सुधार जैसे कई कारक हो सकते हैं।
इसलिए GI पहचान और किसानों को प्राप्त बाजार कीमत के बीच सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। बल्कि उपलब्ध जानकारी यह दर्शाती है कि GI पहचान के साथ किसानों की संस्थागत भागीदारी और मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
GI से किसानों को क्या लाभ हो सकता है?
किसी कृषि उत्पाद को GI पहचान मिलने का एक प्रमुख उद्देश्य उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान को संरक्षित करना और उसे बाजार में प्रमाणिक पहचान प्रदान करना है।
यदि GI उत्पाद के वास्तविक उत्पादक अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में पंजीकृत होते हैं और सामूहिक संस्था के माध्यम से बाजार से जुड़ते हैं, तो उत्पाद की पहचान को व्यवस्थित रूप से विकसित करने के अवसर बढ़ सकते हैं।
मगही पान के संदर्भ में GI पहचान किसानों के लिए ब्रांडिंग और बाजार संचार का आधार बन सकती है। इसके साथ किसान उत्पादक कंपनी सामूहिक बिक्री, प्रचार और बाजार संपर्क को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है।
हालांकि आर्थिक लाभ का स्तर बाजार की मांग, कीमत, उत्पादन लागत, गुणवत्ता और बिक्री व्यवस्था सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।
नवादा और नालंदा के किसानों के लिए महत्वपूर्ण पहल
नवादा और नालंदा बिहार में मगही पान उत्पादन से जुड़े प्रमुख क्षेत्र हैं। इन जिलों के किसानों को GI अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में जोड़ना स्थानीय कृषि उत्पाद को औपचारिक पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
1,001 किसानों का GI अधिकृत उपयोगकर्ता बनना इस पहल के संस्थागत विस्तार को दर्शाता है। इससे बड़ी संख्या में उत्पादक GI व्यवस्था से सीधे जुड़े हैं।
यदि आने वाले समय में इन किसानों को गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, डिजिटल मार्केटिंग, बाजार संपर्क और मूल्यवर्धन से जोड़ा जाता है, तो मगही पान की बाजार क्षमता को और विकसित किया जा सकता है।
पारंपरिक फसलों के लिए नई बाजार रणनीति
भारत में कई कृषि उत्पाद अपनी स्थानीय पहचान और पारंपरिक उत्पादन प्रणाली के कारण विशिष्ट हैं। लेकिन स्थानीय पहचान को बड़े बाजार में बदलने के लिए केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं होता।
ऐसे उत्पादों के लिए GI + Farmer Producer Company + Branding + Marketing का मॉडल उपयोगी हो सकता है। इससे एक तरफ उत्पाद की भौगोलिक पहचान को मजबूत किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर किसानों को सामूहिक रूप से बाजार से जोड़ा जा सकता है।
मगही पान के मामले में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है। GI पंजीकरण के बाद किसानों को अधिकृत उपयोगकर्ता बनाने और FPC के माध्यम से संगठित करने का प्रयास किया गया है।
किसानों की सामूहिक ताकत बढ़ाने की कोशिश
छोटे किसानों के लिए बाजार में व्यक्तिगत रूप से प्रतिस्पर्धा करना कई बार कठिन होता है। सामूहिक संगठन के माध्यम से किसान उत्पादन, खरीद, बिक्री और प्रचार जैसे कार्यों में बेहतर समन्वय स्थापित कर सकते हैं।
मगही पान उत्पादक कंपनी के माध्यम से किसानों को एक साझा मंच मिलने से भविष्य में उत्पाद की ब्रांड पहचान और बाजार संपर्क विकसित करने के अवसर बन सकते हैं।
इसके अलावा सामूहिक संगठन किसानों को बाजार की मांग समझने, गुणवत्ता मानकों पर काम करने और खरीदारों से सीधे संपर्क स्थापित करने में भी मदद कर सकता है।
GI पहचान को आर्थिक अवसर में बदलने की दिशा
मगही पान को वर्ष 2018 में मिली GI पहचान अब किसानों की संस्थागत भागीदारी के साथ एक नए चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। GI अधिकृत उपयोगकर्ता के रूप में 1,001 किसानों का पंजीकरण और नवादा में किसान उत्पादक कंपनी का गठन इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
किसानों द्वारा रिपोर्ट किए गए बाजार भाव में वृद्धि भी इस पहल के साथ सामने आई है, लेकिन इसे केवल GI टैग का प्रत्यक्ष परिणाम मानने के बजाय मजबूत होती मूल्य श्रृंखला और बाजार व्यवस्था के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।
आने वाले समय में यदि GI पहचान को गुणवत्ता उत्पादन, प्रमाणिकता, सामूहिक ब्रांडिंग, बेहतर पैकेजिंग, बाजार संपर्क और मूल्यवर्धन के साथ जोड़ा जाता है, तो मगही पान की बाजार स्थिति को और मजबूत करने की संभावनाएं बन सकती हैं।
बिहार का मगही पान अब केवल एक पारंपरिक कृषि उत्पाद की पहचान तक सीमित नहीं रहकर GI पहचान से संगठित किसान मूल्य श्रृंखला की ओर बढ़ रहा है। ICAR-DMAPR, ICAR-AICRP-MAP&B और बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के सहयोग से किसानों में जागरूकता और क्षमता निर्माण तथा GI अधिकृत उपयोगकर्ता पंजीकरण की पहल ने इस दिशा में आधार तैयार किया है।
नवादा और नालंदा के 1,001 किसानों का GI अधिकृत उपयोगकर्ता बनना तथा Renu and Rajendra Magahi Paan Producer Company Limited का गठन इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण परिणाम हैं।
मगही पान की वास्तविक आर्थिक क्षमता को आगे बढ़ाने के लिए अब GI पहचान के साथ गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, संगठित विपणन, ब्रांडिंग, प्रचार, मूल्यवर्धन और बेहतर बाजार संपर्क को लगातार मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा। यही प्रयास पारंपरिक कृषि उत्पाद की पहचान को किसानों के लिए टिकाऊ बाजार अवसर में बदलने में मदद कर सकता है।

