कृषि रसायन और फसल सुरक्षा के क्षेत्र में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। पीआई इंडस्ट्रीज ने पिऑक्सानिलिप्रोल के भारत में पंजीकरण की बड़ी उपलब्धि हासिल की है। कंपनी के अनुसार, पिऑक्सानिलिप्रोल का तकनीकी पदार्थ और इसका तैयार फार्मूलेशन, दोनों भारत में पंजीकृत हो गए हैं। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पीआई इंडस्ट्रीज के उस लंबे वैज्ञानिक सफर का परिणाम है, जिसमें कंपनी ने अपने पहले स्वदेशी और स्वामित्व वाले अणु को खोज से लेकर विकास और पंजीकरण तक पहुंचाया है।
कंपनी के मुताबिक, पिऑक्सानिलिप्रोल अब किसानों तक ‘पिऑक्साजोन’ नाम से पहुंचेगा। इसके साथ ही पीआई इंडस्ट्रीज की वैज्ञानिक खोज अब प्रयोगशाला और अनुसंधान के स्तर से आगे बढ़कर व्यावसायिक उपयोग और किसानों के खेतों तक पहुंचने की दिशा में आगे बढ़ गई है। कंपनी का लक्ष्य इस नवाचार को भविष्य में भारत से दुनिया के अन्य कृषि बाजारों तक पहुंचाना भी है।
भारत में खोजे गए पहले कीटनाशी सक्रिय घटक के रूप में पहचान
पिऑक्सानिलिप्रोल के पंजीकरण को भारत के फसल सुरक्षा उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड एवं पंजीकरण समिति यानी सीआईबीआरसी ने अपनी औपचारिक टिप्पणियों में पिऑक्सानिलिप्रोल को भारत में खोजे गए पहले कीटनाशी सक्रिय घटक के रूप में मान्यता दी है।
यह मान्यता केवल पीआई इंडस्ट्रीज के लिए ही नहीं, बल्कि देश के कृषि रसायन अनुसंधान और नवाचार तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत में लंबे समय से कृषि क्षेत्र में स्वदेशी अनुसंधान, नई तकनीक और देश में विकसित फसल सुरक्षा समाधानों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में किसी नए सक्रिय कीटनाशी घटक का देश में खोज से लेकर विकास और पंजीकरण तक पहुंचना भारतीय कृषि विज्ञान की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है।
पिऑक्सानिलिप्रोल को मंजूरी कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत पंजीकरण समिति की 476वीं बैठक के दौरान दी गई। इसके तहत पिऑक्सानिलिप्रोल 20 प्रतिशत डब्ल्यू/वी एससी फार्मूलेशन के उपयोग को विभिन्न फसलों और कीटों के लिए मंजूरी मिली है।
इन फसलों में किया जा सकेगा इस्तेमाल
पिऑक्सानिलिप्रोल 20 प्रतिशत डब्ल्यू/वी एससी फार्मूलेशन को कई प्रमुख फसलों में अलग-अलग कीटों के नियंत्रण के लिए पंजीकृत किया गया है। स्वीकृत उपयोग के अनुसार इसका इस्तेमाल धान, मिर्च, टमाटर और चना जैसी फसलों में किया जा सकेगा।
धान में इसे पीला तना छेदक, पत्ती लपेटक और फॉल आर्मीवर्म जैसे प्रमुख कीटों के नियंत्रण के लिए मंजूरी मिली है। धान देश की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में शामिल है और इसमें कीट प्रकोप से उत्पादन तथा गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। ऐसे में नए फसल सुरक्षा समाधान किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
मिर्च की फसल में पिऑक्सानिलिप्रोल को फल छेदक और तंबाकू इल्ली के नियंत्रण के लिए स्वीकृति दी गई है। मिर्च में फल और पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
टमाटर में इसका उपयोग फल छेदक के नियंत्रण के लिए किया जा सकेगा। वहीं बंगाल ग्राम यानी चना की फसल में इसे फली छेदक के नियंत्रण के लिए पंजीकृत किया गया है। चना देश की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है और फली छेदक इसके उत्पादन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कीटों में से एक है।
एक दशक से अधिक के अनुसंधान का परिणाम
पीआई इंडस्ट्रीज के लिए पिऑक्सानिलिप्रोल का पंजीकरण अचानक मिली उपलब्धि नहीं है। कंपनी के अनुसार, इसके पीछे एक दशक से अधिक समय का वैज्ञानिक अनुसंधान, निवेश, लगातार प्रयास और विभिन्न टीमों के बीच सहयोग रहा है।
किसी नए कृषि रसायन अणु की खोज के बाद उसे किसानों के उपयोग के लिए बाजार तक पहुंचाना लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है। इसमें शुरुआती वैज्ञानिक अनुसंधान से लेकर अणु का विकास, प्रभाव का परीक्षण, सुरक्षा संबंधी अध्ययन, नियामकीय प्रक्रिया और अंततः पंजीकरण जैसे कई चरण शामिल होते हैं।
पिऑक्सानिलिप्रोल के मामले में पीआई इंडस्ट्रीज ने इस पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अपने स्वामित्व वाले विज्ञान और बौद्धिक संपदा को व्यावसायिक उत्पाद में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कंपनी का कहना है कि यह उपलब्धि उसकी उस क्षमता को प्रदर्शित करती है, जिसमें वह किसी विचार को प्रयोगशाला की खोज से लेकर व्यावसायिक उपयोग तक पहुंचा सकती है।
भारत से दुनिया तक नवाचार पहुंचाने की तैयारी
पिऑक्सानिलिप्रोल के भारत में पंजीकरण के बाद अब कंपनी के लिए अगला महत्वपूर्ण चरण अपने इस नवाचार को वैश्विक स्तर पर ले जाना है। कंपनी के अनुसार, पिऑक्साजोन के रूप में यह उत्पाद किसानों तक पहुंचेगा और इसके साथ भारत में विकसित वैज्ञानिक नवाचार को देश के बाहर के कृषि बाजारों तक ले जाने की दिशा में भी यात्रा शुरू होगी।
कृषि रसायन उद्योग में किसी नए सक्रिय घटक की खोज किसी कंपनी के लिए महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मानी जाती है। इससे कंपनी को केवल मौजूदा उत्पादों के निर्माण तक सीमित रहने के बजाय नई तकनीक और बौद्धिक संपदा विकसित करने का अवसर मिलता है।
पीआई इंडस्ट्रीज के लिए पिऑक्सानिलिप्रोल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह कंपनी की अनुसंधान एवं विकास क्षमता को दर्शाने के साथ-साथ भारत में कृषि विज्ञान के क्षेत्र में निजी क्षेत्र द्वारा किए जा रहे अनुसंधान की संभावनाओं को भी सामने लाता है।
किसानों के लिए क्या मायने रखती है यह उपलब्धि
किसानों के स्तर पर किसी नए कीटनाशी उत्पाद का महत्व इस बात से जुड़ा होता है कि वह किस फसल में किन कीटों के नियंत्रण में उपयोगी है, उसका इस्तेमाल किस तरह किया जाना है और वह मौजूदा फसल सुरक्षा व्यवस्था में किस प्रकार शामिल किया जा सकता है।
पिऑक्सानिलिप्रोल को फिलहाल जिन फसलों और कीटों के लिए पंजीकृत किया गया है, उनमें धान, मिर्च, टमाटर और चना जैसी महत्वपूर्ण फसलें शामिल हैं। इन फसलों में तना छेदक, पत्ती लपेटक, फॉल आर्मीवर्म, फल छेदक और फली छेदक जैसे कीट किसानों के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं।
हालांकि किसी भी कृषि रसायन का इस्तेमाल किसानों को केवल संबंधित फसल और कीट के लिए स्वीकृत लेबल एवं निर्धारित मात्रा के अनुसार ही करना चाहिए। वैज्ञानिक सलाह और अनुशंसित उपयोग का पालन फसल सुरक्षा के साथ-साथ उत्पाद के प्रभावी इस्तेमाल के लिए भी आवश्यक है।
स्वदेशी कृषि रसायन अनुसंधान को बढ़ावा
भारत कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कृषि इनपुट के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है। बीज, उर्वरक, कीटनाशी और अन्य कृषि तकनीकों में देश के भीतर अनुसंधान और विकास को मजबूत करना इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
पिऑक्सानिलिप्रोल का भारत में खोज से लेकर पंजीकरण तक पहुंचना इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां अब केवल दूसरे देशों में विकसित सक्रिय घटकों के निर्माण और विपणन तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि अपनी स्वयं की नई रसायन तकनीक और बौद्धिक संपदा विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं।
पीआई इंडस्ट्रीज के लिए यह उपलब्धि उसके अनुसंधान, वैज्ञानिक क्षमता और लंबे समय के निवेश का परिणाम है। कंपनी के लिए यह पहला ऐसा स्वामित्व वाला अणु है, जिसे खोज, विकास और पंजीकरण की पूरी प्रक्रिया से आगे बढ़ाया गया है।
पिऑक्सानिलिप्रोल का पंजीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के कृषि रसायन क्षेत्र में स्वदेशी नवाचार की एक नई संभावना को सामने लाता है। अब पिऑक्साजोन के माध्यम से यह तकनीक किसानों के खेतों तक पहुंचेगी। आने वाले समय में इस उत्पाद का वास्तविक प्रभाव इसके स्वीकृत उपयोग, किसानों द्वारा अपनाने, कीट नियंत्रण की प्रभावशीलता और सुरक्षित एवं अनुशंसित इस्तेमाल के आधार पर सामने आएगा।
कुल मिलाकर, पिऑक्सानिलिप्रोल का पंजीकरण पीआई इंडस्ट्रीज की वैज्ञानिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह भारत में विकसित कृषि रसायन नवाचार को प्रयोगशाला से खेत तक ले जाने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है और देश के फसल सुरक्षा क्षेत्र में स्वदेशी अनुसंधान की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है।

