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Home कृषि समाचार

Bihar Cooperative Policy 2026: युवाओं के रोजगार पर जोर; हर जिले में बनेगा मॉडल सहकार ग्राम

Bihar Cooperative Policy 2026: Focus on youth employment; 'Model Cooperative Village' to be established in every district.

Fiza by Fiza
September 26, 2026
in कृषि समाचार
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Bihar Cooperative Policy 2026

Bihar Cooperative Policy 2026

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Bihar Cooperative Policy 2026: बिहार में सहकारिता क्षेत्र को गांव, रोजगार और स्थानीय कारोबार से जोड़ने की दिशा में सरकार ने गतिविधियां तेज की हैं। बिहार सहकारिता नीति 2026 (Bihar Cooperative Policy 2026) के क्रियान्वयन के तहत प्रत्येक जिले में एक मॉडल सहकार ग्राम (Model Cooperative Village) विकसित करने, युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने, सहकारी संस्थाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाने और स्थानीय उत्पादों को बेहतर बाजार से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। हाल में हुई विभागीय समीक्षा में नीति के विभिन्न प्रावधानों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर लागू करने की दिशा में काम तेज करने को कहा गया है।

सहकारिता को लंबे समय से मुख्य रूप से कृषि ऋण, पैक्स और खाद-बीज जैसी गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता रहा है। नई नीति का दायरा इससे अधिक व्यापक रखने की योजना है। इसमें डिजिटल व्यवस्था, बीमा, उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग, प्रशिक्षण, अनुसंधान, युवा और महिला नेतृत्व, नई सहकारी समितियों का गठन और बेहतर प्रशासन जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर तैयार करना है। हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि नीति में रोजगार के अवसर बढ़ाने की बात की गई है, इसका अर्थ प्रत्येक युवा को स्वतः सरकारी नौकरी मिलना नहीं है। उद्देश्य सहकारी कारोबार, प्रोसेसिंग, मार्केटिंग, डिजिटल सेवाओं और स्थानीय उद्यमों के माध्यम से रोजगार तथा स्वरोजगार की संभावनाएं विकसित करना है।

क्या है बिहार सहकारिता नीति 2026?

बिहार सहकारिता नीति 2026 राज्य में सहकारी संस्थाओं को मजबूत, आधुनिक और अधिक व्यवसायोन्मुख बनाने की दिशा में तैयार की गई नीति है। इसके तहत सहकारिता को केवल पारंपरिक कृषि गतिविधियों तक सीमित न रखते हुए ग्रामीण कारोबार, मार्केटिंग, प्रोसेसिंग, प्रशिक्षण, डिजिटल सेवाओं और नए आर्थिक क्षेत्रों से जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है।

सितंबर 2026 में हुई समीक्षा बैठक के दौरान नीति के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए आठ कार्य समूहों के काम की भी समीक्षा की गई। इन कार्य समूहों के जिम्मे विधिक और डिजिटल सुधार, बीमा, मॉडल सहकार ग्राम, उत्पाद ब्रांडिंग एवं विपणन, हरित विकास, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, अनुसंधान, इन्क्यूबेशन, सुशासन, महिला एवं युवा नेतृत्व तथा नए क्षेत्रों में सहकारिता के विस्तार जैसे विषय रखे गए हैं।

इस तरह Bihar Cooperative Policy 2026 को केवल सहकारी समितियों की संख्या बढ़ाने वाली नीति के रूप में नहीं, बल्कि सहकारिता के पूरे ढांचे को बदलने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। वास्तविक परिणाम, हालांकि, इस बात पर निर्भर करेंगे कि इन योजनाओं का जिलों और गांवों के स्तर पर कितना प्रभावी क्रियान्वयन होता है।

बिहार के हर जिले में बनेगा मॉडल सहकार ग्राम

नीति की सबसे प्रमुख पहलों में राज्य के प्रत्येक जिले में एक मॉडल सहकार ग्राम विकसित करने की योजना शामिल है। विभागीय समीक्षा में सहकारिता मंत्री राम कृपाल यादव ने हर जिले में ऐसा गांव विकसित करने का निर्देश दिया, जहां सहकारिता के सफल प्रयोगों और विभिन्न सेवाओं को एक साथ प्रदर्शित किया जा सके।Model Cooperative Village in Bihar की अवधारणा का मकसद एक ऐसा उदाहरण तैयार करना है जिसे बाद में अन्य गांवों और सहकारी संस्थाओं में भी अपनाया जा सके। किसी मॉडल सहकार ग्राम में कृषि उत्पादन से लेकर भंडारण, प्रोसेसिंग, मार्केटिंग, वित्तीय सेवाओं, डिजिटल व्यवस्था, प्रशिक्षण और स्थानीय उद्यम तक कई गतिविधियों को सहकारी ढांचे से जोड़ा जा सकता है।सरकार ने बेहतर प्रदर्शन करने वाली सहकारी समितियों की पहचान करके उनकी सफल कार्यप्रणाली को दूसरी समितियों में अपनाने की दिशा में भी कार्रवाई करने को कहा है।

यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो मॉडल सहकार ग्राम ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक प्रकार की प्रयोगशाला बन सकते हैं, जहां यह देखा जा सकेगा कि सामूहिक आर्थिक गतिविधियों के जरिए किसानों, महिलाओं और युवाओं की आय के अवसर किस तरह बढ़ाए जा सकते हैं।

युवाओं को सहकारिता से जोड़ने पर खास जोर

Bihar Cooperative Policy 2026 youth employment opportunities इस नीति का महत्वपूर्ण पहलू है। विभाग ने युवाओं को आवश्यक कौशल प्रशिक्षण देकर सहकारी गतिविधियों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया है। लक्ष्य यह है कि युवा केवल रोजगार तलाशने वाले न रहें, बल्कि सहकारी क्षेत्र में व्यवसाय, सेवा और उद्यम विकसित करने में भी भाग लें।आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार केवल खेती तक सीमित नहीं है। कृषि उपज की ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग, भंडारण, परिवहन, ऑनलाइन बिक्री, अकाउंटिंग, डेटा मैनेजमेंट और डिजिटल भुगतान जैसे क्षेत्रों में भी काम की जरूरत होती है।यहीं cooperative business opportunities for youth in Bihar का दायरा बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए किसी सहकारी संस्था को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए कंप्यूटर ऑपरेटर, अकाउंटिंग से जुड़े प्रशिक्षित युवा, मार्केटिंग कर्मचारी, पैकेजिंग विशेषज्ञ और लॉजिस्टिक्स से जुड़े लोगों की आवश्यकता हो सकती है।इसी तरह स्थानीय खाद्य उत्पादों की ब्रांडिंग और ऑनलाइन बिक्री शुरू होने पर सोशल मीडिया मार्केटिंग, ई-कॉमर्स प्रबंधन और डिजाइन जैसे क्षेत्रों में भी युवाओं की भूमिका बन सकती है।

रोजगार के साथ उद्यमिता पर भी फोकस

सहकारिता का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सामूहिक स्वामित्व और साझा आर्थिक हित है। इसलिए रोजगार की चर्चा केवल किसी संस्था में वेतन पर काम करने तक सीमित नहीं रहती। युवा मिलकर सहकारी संस्था बनाकर स्वयं भी व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।मान लीजिए किसी क्षेत्र में मखाना उत्पादन अधिक है। वहां किसान और युवा मिलकर प्रोसेसिंग एवं पैकेजिंग सहकारी संस्था तैयार कर सकते हैं। कुछ सदस्य उत्पादन से जुड़े रहेंगे, कुछ पैकेजिंग संभाल सकते हैं, कुछ मार्केटिंग और बिक्री पर काम कर सकते हैं।इसी तरह सब्जी, फल, दूध, शहद, मछली, हस्तशिल्प या दूसरे स्थानीय उत्पादों में सामूहिक व्यापार की संभावनाएं पैदा की जा सकती हैं।यही वजह है कि ग्रामीण युवाओं के लिए सहकारिता में रोजगार को केवल नौकरी के नजरिए से देखने के बजाय entrepreneurship और self-employment के नजरिए से भी देखना होगा।

मखाना और शहद जैसे स्थानीय उत्पादों पर विशेष ध्यान

बिहार के कई स्थानीय कृषि उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखते हैं। सहकारिता नीति में ऐसे उत्पादों के कारोबार को संगठित करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं।राज्य स्तर पर बिहार राज्य शहद प्रसंस्करण एवं विपणन फेडरेशन का निबंधन किए जाने और आठ प्रमंडलस्तरीय मार्केटिंग यूनियनों के गठन की जानकारी विभागीय समीक्षा में दी गई। इसके साथ मार्केटिंग फेडरेशन गठित करने की प्रक्रिया भी चल रही है।यह व्यवस्था उत्पाद तैयार करने वाले किसान और बाजार के बीच की दूरी कम करने में मदद कर सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर समस्या केवल उत्पादन की नहीं होती, बल्कि सही मूल्य, भंडारण, प्रोसेसिंग और बाजार तक पहुंच की भी होती है। Makhana and honey cooperative marketing in Bihar जैसे मॉडल में किसान सामूहिक रूप से उत्पाद बेच सकें तो उनकी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है। हालांकि इसके वास्तविक लाभ कीमतों, प्रबंधन, पारदर्शिता और बाजार से सफल जुड़ाव पर निर्भर करेंगे।

सहकारी उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग होगी अहम

किसी उत्पाद का अच्छा होना पर्याप्त नहीं है। आज बाजार में उसकी पैकेजिंग, गुणवत्ता, ब्रांड पहचान और उपभोक्ता तक पहुंच भी महत्वपूर्ण है।नई सहकारिता नीति में इसलिए उत्पादों की branding and marketing को प्रमुख रणनीतिक क्षेत्र के रूप में जगह दी गई है।यदि गांव स्तर पर तैयार मखाना, शहद, चावल, मसाले, फल-सब्जी आधारित उत्पाद या हस्तशिल्प को साझा ब्रांड के तहत बेचा जाता है, तो छोटे उत्पादकों के लिए बड़े बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है।युवा इस क्षेत्र में खास भूमिका निभा सकते हैं। डिजिटल मार्केटिंग, ऑनलाइन मार्केटप्लेस, उत्पाद फोटोग्राफी, पैकेज डिजाइन और ग्राहक प्रबंधन जैसे कौशल रखने वाले युवा स्थानीय सहकारी कारोबार को आधुनिक बाजार से जोड़ सकते हैं।इस प्रकार Bihar cooperative sector rural development में तकनीक और मार्केटिंग दोनों का योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है।

डिजिटल सहकारिता की तरफ बढ़ता बिहार

नीति में डिजिटल सुधार को भी प्राथमिकता दी गई है। नई समितियों के गठन के लिए ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना है। इसके साथ सहकारी संस्थाओं के प्रशासन और सेवाओं को तकनीक से जोड़ने पर जोर है।

बिहार सहकारिता विभाग की कुछ सेवाएं पहले से ऑनलाइन उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए विभाग के ई-सहकारी प्लेटफॉर्म पर कुछ सहकारी गतिविधियों और सदस्यता प्रक्रियाओं के लिए डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

डिजिटलीकरण से आवेदन, सदस्यता, वित्तीय रिकॉर्ड और विभिन्न सेवाओं की निगरानी अधिक व्यवस्थित हो सकती है। लेकिन इसके साथ ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल साक्षरता और डेटा सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी होगा।

शिक्षा और प्रशिक्षण से तैयार होंगे नए अवसर

किसी भी सहकारी संस्था की सफलता केवल धन या सदस्यों की संख्या से तय नहीं होती। संस्था चलाने वाले लोगों के पास व्यवसाय, वित्त, कानून और मार्केटिंग की समझ होना भी जरूरी है।इसी वजह से नीति में education and training network पर विशेष जोर दिया गया है। सहकारिता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की पहल के तहत शिक्षा विभाग को पत्र भेजे जाने और सहकारिता प्रशिक्षण केंद्र, पूसा को त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय, आनंद से संबद्ध कराने की दिशा में कार्रवाई की जानकारी भी दी गई है।यदि युवाओं को शुरुआती स्तर पर ही cooperative management, accounting, marketing, digital technology और entrepreneurship की जानकारी दी जाए तो वे भविष्य में सहकारी संस्थाओं का अधिक पेशेवर तरीके से संचालन कर सकते हैं।

महिलाओं के लिए भी बढ़ सकते हैं अवसर

नई सहकारिता नीति में महिला एवं युवा नेतृत्व को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। इसके साथ कमजोर वर्गों के सशक्तीकरण पर भी ध्यान देने की बात कही गई है।ग्रामीण बिहार में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों ने यह दिखाया है कि सामूहिक आर्थिक गतिविधियां परिवार की आय और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने में महिलाओं की भूमिका बढ़ा सकती हैं। सहकारी संस्थाओं में इसी प्रकार महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पादों और अन्य छोटे व्यवसायों में नए अवसर तैयार हो सकते हैं।हालांकि केवल समिति बना देना पर्याप्त नहीं होगा। महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण, वित्तीय पहुंच, नेतृत्व और बाजार से जुड़ाव जरूरी होगा।

PACS और सहकारी संस्थाओं की भूमिका

बिहार के ग्रामीण सहकारी ढांचे में प्राथमिक कृषि ऋण समितियां यानी PACS महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। नई नीति में मौजूदा संस्थाओं को मजबूत करने के साथ नए सेवा क्षेत्रों तक सहकारिता पहुंचाने की तैयारी है।समीक्षा के दौरान PACS में मॉडल बायलॉज और प्रभावी निगरानी व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।यदि PACS जैसी संस्थाएं केवल ऋण या खाद-बीज वितरण तक सीमित न रहकर भंडारण, प्रोसेसिंग, बाजार संपर्क और डिजिटल सेवाओं में सक्रिय होती हैं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका बढ़ सकती है।लेकिन इसके लिए पारदर्शिता, नियमित ऑडिट, पेशेवर प्रबंधन और सदस्यों की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण होगी।

सहकारिता क्यों बन सकती है ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत?

छोटे किसानों और छोटे कारोबारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका आकार होता है। अकेला किसान बहुत अधिक मात्रा में उत्पादन नहीं कर सकता और न ही उसके पास हमेशा भंडारण या मार्केटिंग के पर्याप्त संसाधन होते हैं।

सहकारिता कई छोटे उत्पादकों को एक साझा मंच उपलब्ध कराती है। इससे सामूहिक खरीद, बिक्री और प्रोसेसिंग संभव होती है।

उदाहरण के लिए 100 छोटे किसान अलग-अलग बाजार जाने के बजाय एक सहकारी संस्था के माध्यम से उत्पाद बेचें तो परिवहन और मार्केटिंग की लागत कम हो सकती है। यही व्यवस्था स्थानीय रोजगार भी पैदा कर सकती है।

इस संदर्भ में Cooperative Sector in Bihar को कृषि और ग्रामीण विकास के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विकसित करने की संभावना है।

मॉडल सहकार ग्राम में क्या-क्या हो सकता है?

सरकार की हालिया घोषणा मॉडल सहकार ग्रामों को सहकारी गतिविधियों के सफल उदाहरण के रूप में विकसित करने की है।व्यवहार में ऐसे गांवों में कृषि उत्पादन, सामूहिक खरीद-बिक्री, भंडारण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, बैंकिंग या वित्तीय सेवाओं, बीमा, डिजिटल भुगतान, प्रशिक्षण और मार्केटिंग जैसी कई गतिविधियों को आपस में जोड़ा जा सकता है।युवा यहां डिजिटल और तकनीकी काम संभाल सकते हैं, किसान उत्पादन एवं आपूर्ति से जुड़ सकते हैं और महिलाएं प्रोसेसिंग तथा छोटे उद्यमों का संचालन कर सकती हैं।ऐसा मॉडल सफल रहता है तो उसे दूसरे गांवों तक विस्तार देने में आसानी होगी।

नई सहकारी समितियों के गठन को मिलेगा बढ़ावा

बिहार में सहकारी समितियों का विस्तार भी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बहुउद्देशीय समितियों और नए सेवा क्षेत्रों में सहकारी संस्थाओं के गठन पर काम करने की योजना है। ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से नई समितियों की गठन प्रक्रिया को सरल बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।इससे उन क्षेत्रों में भी सहकारिता का विस्तार हो सकता है जहां अभी मजबूत संस्थागत व्यवस्था नहीं है।

हालांकि नई समितियां बनाते समय उनकी आर्थिक व्यवहार्यता पर ध्यान देना आवश्यक होगा। केवल संख्या बढ़ने के बजाय यह जरूरी है कि समिति के पास स्पष्ट business model, पर्याप्त सदस्य, प्रशिक्षित प्रबंधन और स्थायी आय का स्रोत हो।

सहकारिता नीति के सामने क्या होंगी चुनौतियां?

योजना महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसकी सफलता जमीन पर क्रियान्वयन से तय होगी।मॉडल सहकार ग्राम बनाने के लिए गांवों के चयन से लेकर वहां बुनियादी ढांचा तैयार करने, लोगों को प्रशिक्षण देने और संस्थाओं को बाजार से जोड़ने तक कई चरण होंगे।दूसरी चुनौती सहकारी संस्थाओं में पेशेवर प्रबंधन की है। अकाउंटिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, ऑडिट और मार्केटिंग कमजोर होने पर अच्छी योजनाएं भी लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह पातीं।तीसरी चुनौती बाजार की है। यदि स्थानीय उत्पाद तैयार तो हो जाएं लेकिन नियमित खरीदार और सही कीमत न मिले, तो सहकारी संस्था की आय टिकाऊ नहीं होगी।इसलिए Bihar Cooperative Policy 2026 की सफलता का वास्तविक आकलन आने वाले समय में गांवों और जिलों में इसके परिणामों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

युवाओं के लिए किन क्षेत्रों में बन सकते हैं अवसर?

युवाओं के लिए सहकारिता के भीतर कई प्रकार की संभावनाएं बन सकती हैं। इनमें कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, गोदाम प्रबंधन, डिजिटल सेवाएं, अकाउंटिंग, मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता जांच और सहकारी संस्थाओं का प्रबंधन शामिल हो सकता है।यानी Youth Employment in Bihar through Cooperatives का मॉडल पारंपरिक नौकरी से अलग भी हो सकता है।किसी युवा को सहकारी संस्था में सीधे रोजगार मिल सकता है, कोई सेवा प्रदाता के रूप में काम कर सकता है और कुछ युवा मिलकर स्वयं सहकारी उद्यम स्थापित कर सकते हैं।

यह व्यवस्था कितने बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करेगी, इसका अनुमान अभी लगाना जल्दबाजी होगा। लेकिन यदि प्रशिक्षण, पूंजी, बाजार और संस्थागत समर्थन एक साथ उपलब्ध होते हैं तो ग्रामीण उद्यमिता के लिए नए विकल्प खुल सकते हैं।

बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों पर काफी निर्भर है। ऐसे में सहकारिता के माध्यम से उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग और मार्केटिंग को भी गांव के करीब लाया जाता है तो स्थानीय आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं।कच्चा माल गांव से बाहर भेजने के बजाय यदि उसकी सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग या प्रोसेसिंग स्थानीय स्तर पर होती है तो मूल्य संवर्धन का एक हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रह सकता है।इसका असर किसानों की आय के अलावा परिवहन, पैकेजिंग, मशीन संचालन, मार्केटिंग और दूसरी सेवाओं पर भी पड़ सकता है।यही कारण है कि Rural Economy Bihar और cooperative development को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जा रहा है।

बिहार सहकारिता नीति 2026 (Bihar Cooperative Policy 2026) के तहत प्रत्येक जिले में मॉडल सहकार ग्राम, युवाओं को कौशल प्रशिक्षण, नई सहकारी समितियों का विस्तार, महिला एवं युवा नेतृत्व, डिजिटल व्यवस्था और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग जैसे कई क्षेत्रों पर काम करने की तैयारी है। हालिया विभागीय समीक्षा में इन योजनाओं को निर्धारित समय-सीमा में लागू करने पर जोर दिया गया है।नीति में मखाना, शहद और दूसरे स्थानीय उत्पादों को संगठित बाजार से जोड़ने तथा सहकारी मार्केटिंग व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं।

युवाओं के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि सहकारिता में रोजगार के साथ-साथ entrepreneurship, digital services, food processing, branding, e-commerce और logistics जैसे क्षेत्रों में नए अवसर विकसित हो सकते हैं।

फिर भी इस पहल की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मॉडल सहकार ग्राम कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से विकसित होते हैं, सहकारी संस्थाओं का संचालन कितना पारदर्शी रहता है और स्थानीय उत्पादों को स्थायी बाजार मिल पाता है।

यदि प्रशिक्षण, तकनीक, वित्त, बेहतर प्रशासन और बाजार को एक साथ जोड़ा जा सका, तो Model Cooperative Village in every district of Bihar की अवधारणा राज्य के ग्रामीण विकास और स्थानीय रोजगार के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोग साबित हो सकती है।

 

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