दुनिया भर में फसलों को प्रभावित करने वाली बीमारियां कृषि उत्पादन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। फफूंद और दूसरे रोगजनक सूक्ष्मजीव पौधों की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को कमजोर करके उन्हें संक्रमित करते हैं। अब ब्रिटेन की डरहम यूनिवर्सिटी के बायोसाइंसेज विभाग के वैज्ञानिकों ने फसल रोगों से निपटने के लिए एक नई रणनीति की संभावनाओं पर प्रकाश डाला है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि रोगजनकों द्वारा पौधों पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोटीनों की साझा कमजोरियों को पहचाना जा सके, तो एक साथ कई रोगजनकों के खिलाफ फसल सुरक्षा विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।
वैज्ञानिकों ने अपने विचार एक हालिया समीक्षा लेख में प्रस्तुत किए हैं, जो The Plant Journal में प्रकाशित हुआ है। लेख में रोगजनक प्रोटीन, उनकी संरचना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रोटीन डिजाइन तकनीकों के इस्तेमाल से भविष्य में नई फसल सुरक्षा रणनीतियां विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है।
पौधों पर हमला करने के लिए रोगजनक इस्तेमाल करते हैं खास प्रोटीन
पौधों में संक्रमण फैलाने वाले फफूंद और ओओमाइसीट जैसे रोगजनक कई तरह के विशेष प्रोटीन बनाते हैं। इन्हें इफेक्टर प्रोटीन कहा जाता है। इनका काम पौधे की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को कमजोर करना और रोगजनक को पौधे के ऊतकों में संक्रमण स्थापित करने में मदद करना होता है।
पौधों की प्रतिरोधक क्षमता और रोगजनकों के हमले के बीच लगातार संघर्ष चलता रहता है। पौधे संक्रमण को पहचानकर अपनी रक्षा प्रणाली सक्रिय करते हैं, जबकि रोगजनक ऐसे प्रोटीन और तंत्र विकसित करते हैं जिनसे वे पौधे की सुरक्षा को कमजोर कर सकें।
वैज्ञानिकों के लिए चुनौती यह है कि रोगजनकों के इफेक्टर प्रोटीन बहुत विविध होते हैं। उनके जीन और अमीनो एसिड अनुक्रम कई बार एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देते हैं। लेकिन इन प्रोटीनों की त्रि-आयामी संरचना का अध्ययन करने पर कुछ प्रोटीनों में आश्चर्यजनक समानताएं दिखाई देती हैं।
SUSS इफेक्टर परिवार पर वैज्ञानिकों की नजर
डरहम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से ऐसे इफेक्टर प्रोटीन समूहों पर ध्यान दिया है जिनकी आनुवंशिक संरचना अलग होने के बावजूद उनकी त्रि-आयामी संरचना समान होती है। इन्हें SUSS यानी Sequence-Unrelated but Structurally Similar effector families कहा जाता है।
सरल भाषा में समझें तो दो रोगजनक प्रोटीनों के जीन और प्रोटीन अनुक्रम अलग हो सकते हैं, लेकिन जब उनकी संरचना को तीन आयामों में देखा जाता है तो दोनों का आकार या संरचनात्मक ढांचा काफी समान हो सकता है।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वैज्ञानिकों को रोगजनकों की एक नई समानता दिखाई देती है। यदि अलग-अलग रोगजनकों के प्रोटीनों में कुछ साझा संरचनात्मक विशेषताएं मौजूद हैं और वे संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण हैं, तो संभव है कि भविष्य में इन्हीं हिस्सों को निशाना बनाकर एक व्यापक फसल सुरक्षा रणनीति तैयार की जा सके।
एक-एक रोगजनक को निशाना बनाने के बजाय साझा कमजोरी पर हमला
परंपरागत रूप से किसी फसल रोग के खिलाफ प्रतिरोध विकसित करने के लिए किसी विशेष रोगजनक या उसके विशेष प्रोटीन को ध्यान में रखा जाता है। लेकिन रोगजनक लगातार बदलते रहते हैं। समय के साथ उनमें ऐसे परिवर्तन हो सकते हैं जो पौधों की प्रतिरोधी क्षमता या विकसित किए गए नियंत्रण उपायों को कम प्रभावी बना दें।
SUSS इफेक्टर परिवारों का विचार इस चुनौती से अलग तरीके से निपटने की संभावना दिखाता है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या अलग-अलग रोगजनकों के संरचनात्मक रूप से समान इफेक्टर प्रोटीन में कुछ ऐसे हिस्से हैं जो संक्रमण फैलाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यदि किसी प्रोटीन की ऐसी साझा विशेषता उसके लिए महत्वपूर्ण है, तो उसे बदलना रोगजनक के लिए आसान नहीं हो सकता। क्योंकि बहुत बड़ा बदलाव उसके संक्रमण फैलाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि यह अभी एक शोध संभावना है और इसे व्यावहारिक कृषि समाधान में बदलने के लिए आगे व्यापक परीक्षण की आवश्यकता होगी।
AI से खोजी जा सकती हैं प्रोटीन की कमजोरियां
इस शोध क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में AI आधारित प्रोटीन संरचना विश्लेषण और प्रोटीन डिजाइन तकनीकों में तेजी से विकास हुआ है।
इन तकनीकों की मदद से वैज्ञानिक जटिल प्रोटीन संरचनाओं का अध्ययन कर सकते हैं और यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि उनके कौन से हिस्से पौधों में संक्रमण स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भविष्य में AI का इस्तेमाल ऐसे नए अणुओं को डिजाइन करने के लिए किया जा सकता है जो रोगजनक प्रोटीन के महत्वपूर्ण हिस्सों को ब्लॉक कर सकें। इसी तरह ऐसी रणनीतियां भी विकसित की जा सकती हैं जिनसे पौधे रोगजनक के इफेक्टर प्रोटीन को बेहतर तरीके से पहचानकर अपनी प्रतिरोधक प्रतिक्रिया सक्रिय कर सकें।
इस तरह AI केवल रोग की पहचान या निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोग नियंत्रण के लिए नए जैविक समाधान विकसित करने में भी मदद कर सकता है।
रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की संभावना
फसल रोगों को नियंत्रित करने के लिए दुनिया के कई हिस्सों में फफूंदनाशी और अन्य रासायनिक उपचारों का इस्तेमाल किया जाता है। इनका कृषि उत्पादन बचाने में महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन लंबे समय में रासायनिक नियंत्रण की अपनी चुनौतियां भी हैं।
रोगजनकों में रासायनिक उत्पादों के प्रति प्रतिरोध विकसित होने की समस्या कई फसल रोगों में देखी गई है। इसके अलावा किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के सामने प्रभावी, टिकाऊ और पर्यावरणीय रूप से बेहतर रोग प्रबंधन विकसित करने की जरूरत भी बढ़ रही है।
यदि रोगजनकों की साझा संरचनात्मक कमजोरियों को निशाना बनाने वाली नई जैविक तकनीक विकसित होती है, तो यह मौजूदा रासायनिक नियंत्रण उपायों का विकल्प या पूरक बन सकती है। इससे भविष्य में कुछ परिस्थितियों में रासायनिक उपचारों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है शोध
फसल रोगों से होने वाला नुकसान केवल किसानों की आय तक सीमित नहीं है। बड़े पैमाने पर रोग फैलने से किसी क्षेत्र या देश में खाद्य उत्पादन प्रभावित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन, बदलते तापमान और बदलते कृषि वातावरण के कारण कुछ रोगजनकों के फैलाव और व्यवहार में भी बदलाव की संभावना पर वैज्ञानिक लगातार अध्ययन कर रहे हैं।
ऐसे में ऐसी तकनीक विकसित करना महत्वपूर्ण है जो एक ही समय में कई रोगजनकों के खिलाफ प्रभावी हो सके। SUSS इफेक्टर परिवारों पर आधारित रणनीति इसी दिशा में एक संभावित रास्ता प्रस्तुत करती है।
अगर रोगजनकों के कई अलग-अलग समूहों में मौजूद साझा कमजोरियों की पहचान और पुष्टि हो जाती है, तो वैज्ञानिक व्यापक प्रभाव वाले नए फसल सुरक्षा समाधान विकसित कर सकते हैं। इससे किसानों को फसल रोगों से होने वाले नुकसान को कम करने और कृषि उत्पादन को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
अभी शोध के शुरुआती चरण में है रणनीति
हालांकि इस अध्ययन में सामने रखे गए विचार काफी संभावनाएं दिखाते हैं, लेकिन इन्हें खेतों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक मानना अभी जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिकों को पहले यह पुष्टि करनी होगी कि जिन संरचनात्मक विशेषताओं को संभावित कमजोरियां माना जा रहा है, वे वास्तव में अलग-अलग रोगजनकों में संक्रमण के लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं।
इसके बाद प्रयोगशाला परीक्षण, पौधों पर परीक्षण और अंततः खेत स्तर पर परीक्षण की जरूरत होगी। यह भी देखना होगा कि रोगजनक इन लक्षित संरचनाओं में बदलाव करके नई प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकते हैं या नहीं।
इसलिए फिलहाल यह शोध भविष्य की फसल सुरक्षा तकनीकों के लिए एक वैज्ञानिक दिशा प्रदान करता है, न कि किसानों के लिए तत्काल उपलब्ध कोई नया उपचार।
फसल सुरक्षा में नई दिशा की उम्मीद
डरहम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन इस बात की ओर संकेत करता है कि भविष्य में फसल रोग नियंत्रण केवल किसी एक रोगजनक या एक प्रोटीन को निशाना बनाने तक सीमित नहीं रह सकता। रोगजनकों के बीच मौजूद साझा संरचनात्मक विशेषताओं की पहचान करके व्यापक स्तर पर रोग नियंत्रण की नई रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।
AI आधारित प्रोटीन विश्लेषण और डिजाइन तकनीकें इस काम को और तेज कर सकती हैं। यदि वैज्ञानिक रोगजनकों के इफेक्टर प्रोटीन की ऐसी साझा कमजोरियों को सफलतापूर्वक पहचान और लक्षित कर पाते हैं, तो इससे अधिक व्यापक और लंबे समय तक प्रभावी फसल सुरक्षा उपाय विकसित होने की संभावना है।
अंततः इस दिशा में सफलता किसानों के लिए फसल नुकसान कम करने, कृषि उत्पादन को सुरक्षित रखने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में मदद कर सकती है। हालांकि इसके लिए अभी कई चरणों के वैज्ञानिक परीक्षण बाकी हैं।

