भारत का उर्वरक सब्सिडी बिल चालू वित्त वर्ष में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच सकता है। अगर वैश्विक उर्वरक आपूर्ति में जारी व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो सरकार का सब्सिडी खर्च बजट में तय 1.71 लाख करोड़ रुपये के अनुमान से लगभग दोगुना हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया और फॉस्फेटिक उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण किसानों को नियंत्रित कीमतों पर खाद उपलब्ध कराने की सरकारी लागत लगातार बढ़ रही है।
उर्वरक विभाग के संयुक्त सचिव कृष्ण कांत पाठक ने एक ब्रीफिंग के दौरान कहा कि अगर वैश्विक आपूर्ति की समस्या बनी रहती है तो चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी का बिल 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। उन्होंने इस स्थिति के पीछे पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता से जुड़ी वैश्विक उर्वरक आपूर्ति श्रृंखलाओं में लंबे समय से चल रहे व्यवधान को प्रमुख कारण बताया।
इसी विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा ने भी माना कि यूरिया और अन्य उर्वरकों की लागत में स्पष्ट रूप से बढ़ोतरी का रुझान दिखाई दे रहा है। हालांकि, अधिकारियों ने फिलहाल सब्सिडी बिल का अंतिम आंकड़ा तय करने से परहेज किया है, क्योंकि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और आपूर्ति की स्थिति किस दिशा में जाती है, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा।
1.71 लाख करोड़ के बजट से 3 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए उर्वरक सब्सिडी के मद में करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है। लेकिन वैश्विक बाजार में उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में लगातार दबाव बना रहा तो वास्तविक खर्च बजट अनुमान से काफी ऊपर जा सकता है।
3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का संभावित सब्सिडी बिल सरकार के शुरुआती अनुमान की तुलना में बड़ा अंतर दिखाता है। इसका मतलब है कि वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों और आपूर्ति में लंबे समय तक रहने वाला बदलाव भारत के सरकारी वित्त पर सीधा असर डाल सकता है।
अधिकारियों ने तुलना के लिए लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के एक पहले के अनुमान का भी उल्लेख किया है। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक बाजार में हालिया दबाव बढ़ने से पहले भी सब्सिडी खर्च शुरुआती बजट अनुमान से ऊपर जाने की संभावना बन रही थी।
किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था
भारत में उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य किसानों को नियंत्रित और अपेक्षाकृत कम कीमत पर जरूरी खाद उपलब्ध कराना है। यूरिया, डीएपी, एनपीके कॉम्प्लेक्स और एसएसपी जैसे प्रमुख उर्वरकों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार की वास्तविक लागत के अनुरूप सीधे किसानों तक नहीं पहुंचती हैं।
सरकार इन उर्वरकों की लागत और किसानों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच के अंतर को सब्सिडी के माध्यम से पूरा करती है। इस व्यवस्था के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज बढ़ोतरी होने के बावजूद किसानों पर उसका पूरा असर खुदरा कीमतों के रूप में नहीं पड़ता।
लेकिन इसका दूसरा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। जब आयातित उर्वरक या उन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमत बढ़ती है, तो सरकार को समान मात्रा में खाद किसानों तक पहुंचाने के लिए अधिक सब्सिडी देनी पड़ सकती है।
यूरिया के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का असर आयात लागत पर पड़ता है। वहीं डीएपी और एनपीके जैसे फॉस्फेटिक उर्वरकों की लागत पर फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर जैसे कच्चे माल की कीमतों का प्रभाव पड़ता है।
पश्चिम एशिया संकट से आपूर्ति पर दबाव
अधिकारियों के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता ने वैश्विक उर्वरक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बढ़ाया है। उर्वरक कारोबार में अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति नेटवर्क, समुद्री परिवहन और कच्चे माल की उपलब्धता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
किसी प्रमुख क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर जहाजों की आवाजाही, परिवहन लागत और आपूर्ति के समय पर असर पड़ सकता है। इससे आयातकों के लिए खाद की वास्तविक लागत बढ़ सकती है।
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। खासकर फॉस्फेटिक और पोटाश आधारित उर्वरकों में अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता महत्वपूर्ण है। यूरिया की जरूरत का एक हिस्सा भी आयात से पूरा किया जाता है।
ऐसे में वैश्विक बाजार में कीमत बढ़ने का असर भारत की आयात लागत पर पड़ता है। अगर कीमतों में बढ़ोतरी लंबे समय तक जारी रहती है तो सरकारी सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है।
यूरिया और फॉस्फेटिक उर्वरकों की लागत में बढ़ोतरी
उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा ने कहा है कि यूरिया और अन्य उर्वरकों की लागत में बढ़ोतरी का रुझान दिखाई दे रहा है। हालांकि, आने वाले महीनों की बाजार स्थिति को देखते हुए अभी अंतिम सब्सिडी बिल का अनुमान तय नहीं किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत कई कारकों से प्रभावित होती है। कच्चे माल की कीमत, ऊर्जा लागत, उत्पादन क्षमता, निर्यात नीतियां, समुद्री परिवहन और भू-राजनीतिक परिस्थितियां इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
यदि इनमें से कई कारक एक साथ भारत के खिलाफ जाते हैं तो आयात लागत बढ़ सकती है। सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि किसानों को खाद की उपलब्धता और नियंत्रित कीमत दोनों बनाए रखते हुए बढ़ती लागत का प्रबंधन किया जाए।
बजट पर बढ़ सकता है अतिरिक्त बोझ
अगर सब्सिडी बिल वास्तव में 3 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंचता है तो सरकार को बजट में तय राशि की तुलना में काफी अधिक खर्च करना पड़ेगा। 1.71 लाख करोड़ रुपये के शुरुआती प्रावधान के मुकाबले 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का खर्च एक बड़ा अंतर होगा।
यह अंतर केवल उर्वरकों की कीमतों में बदलाव को नहीं दिखाएगा, बल्कि यह भी बताएगा कि वैश्विक आपूर्ति संकट का घरेलू कृषि व्यवस्था पर वित्तीय असर कितना व्यापक हो सकता है।
भारत में उर्वरक सब्सिडी लंबे समय से कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण सरकारी समर्थन का हिस्सा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को खेती के महत्वपूर्ण समय पर आवश्यक उर्वरक उपलब्ध रहें और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों में अचानक होने वाली तेजी का पूरा बोझ उन पर न पड़े।
लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो यही व्यवस्था सरकार के लिए वित्तीय चुनौती बन जाती है।
आने वाले महीनों पर टिकी नजर
फिलहाल 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आंकड़ा एक संभावित अनुमान है, अंतिम खर्च नहीं। वास्तविक सब्सिडी बिल इस बात पर निर्भर करेगा कि वैश्विक उर्वरक बाजार आने वाले महीनों में किस दिशा में जाता है।
अगर वैश्विक आपूर्ति में सुधार होता है और यूरिया तथा फॉस्फेटिक उर्वरकों की कीमतों में नरमी आती है तो सरकार की वास्तविक लागत कम हो सकती है। इसके विपरीत, यदि आपूर्ति बाधित रहती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी बनी रहती है तो सब्सिडी खर्च और बढ़ सकता है।
इसलिए चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी पर सबसे बड़ी नजर अंतरराष्ट्रीय कीमतों, कच्चे माल की उपलब्धता और पश्चिम एशिया से जुड़े आपूर्ति व्यवधान पर रहेगी। भारत के लिए चुनौती किसानों को समय पर और सस्ती खाद उपलब्ध कराने के साथ-साथ बढ़ते सब्सिडी बोझ को नियंत्रित करने की होगी।
उर्वरक विभाग के अधिकारियों के हालिया बयानों से साफ है कि इस समय सरकार के सामने केवल खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने की चुनौती नहीं है, बल्कि वैश्विक बाजार में बढ़ती लागत के बीच कृषि क्षेत्र के लिए सब्सिडी व्यवस्था को बनाए रखना भी एक बड़ी वित्तीय चुनौती बन गई है।

