KVK Hapur: कृषि विज्ञान केंद्र, हापुड़ में फसल अवशेष प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को फसल अवशेषों के वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन, पराली जलाने से होने वाले नुकसान तथा फसल अवशेषों से जैविक खाद और अन्य उपयोगी संसाधन तैयार करने की आधुनिक तकनीकों के प्रति जागरूक करना था।
कार्यक्रम में डॉ. हरिओम कटियार एवं डॉ. पी.के. सिंह, निदेशालय प्रसार, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ तथा डॉ. विपिन कुमार, प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केंद्र, गौतमबुद्धनगर ने प्रतिभागियों को संबोधित किया। विशेषज्ञों ने फसल अवशेष प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों, अवशेषों के बेहतर उपयोग, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा कृषि में अवशेषों के पुनर्चक्रण के महत्व की विस्तृत जानकारी दी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अरविंद कुमार, प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केंद्र, हापुड़ ने कहा कि फसल अवशेष किसानों के लिए समस्या नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण कृषि संसाधन हैं। उन्होंने किसानों से फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका वैज्ञानिक प्रबंधन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि इससे मृदा की उर्वरता बढ़ाने, जैविक पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और कृषि लागत कम करने में मदद मिल सकती है।

प्रशिक्षण (Farmers Awareness Program) के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र, हापुड़ के वैज्ञानिकों ने भी किसानों को विभिन्न विषयों पर तकनीकी जानकारी दी। डॉ. पी.के. माडके, पशु विज्ञान वैज्ञानिक ने पशुपालन में फसल अवशेषों के उपयोग के बारे में बताया। डॉ. वीरेंद्र पाल गंगवार, उद्यान वैज्ञानिक ने उद्यानिकी गतिविधियों में फसल अवशेषों के उपयोग की जानकारी दी।
डॉ. नीलम कुमारी, कृषि प्रसार वैज्ञानिक ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन की व्यावहारिक एवं प्रसार संबंधी तकनीकों से अवगत कराया। वहीं डॉ. अशोक सिंह, मृदा विज्ञान विशेषज्ञ ने फसल अवशेषों के मृदा स्वास्थ्य, जैविक कार्बन और मृदा उर्वरता पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों की जानकारी दी। डॉ. विनिता सिंह, गृह विज्ञान वैज्ञानिक ने घरेलू स्तर पर जैविक संसाधनों के उपयोग एवं मूल्य संवर्धन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।
प्रशिक्षण के दौरान किसानों को फसल अवशेषों को खेत में मिलाने, कम्पोस्ट एवं जैविक खाद तैयार करने, अवशेषों के पुनर्चक्रण, मल्चिंग तथा पराली जलाने से पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से बताया गया।
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि किसानों ने विशेषज्ञों से सीधे संवाद कर अपनी समस्याओं और जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। वैज्ञानिकों ने किसानों को ऐसी तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिनसे फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग करते हुए खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सके।
समापन अवसर पर विशेषज्ञों ने प्रतिभागी किसानों से फसल अवशेष प्रबंधन तकनीकों को अपने खेतों में अपनाने के साथ-साथ अन्य किसानों को भी इसके प्रति जागरूक करने का आह्वान किया। कार्यक्रम के सफल आयोजन में कृषि विज्ञान केंद्र, हापुड़ के समस्त वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
