भारत के लिए उर्वरक और उर्वरक निर्माण में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल लेकर जा रहे 20 जहाजों में से 15 के होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकलने की खबर है। इन जहाजों में बड़ी मात्रा में यूरिया, डीएपी और सल्फर सहित कृषि क्षेत्र के लिए जरूरी सामग्री शामिल है। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चिंता बनी हुई है, इन जहाजों का सुरक्षित निकलना भारत की उर्वरक आपूर्ति व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन जहाजों में 3.32 लाख टन यूरिया, 2.57 लाख टन डीएपी और 1.11 लाख टन सल्फर शामिल है। सरकार के अनुसार, फिलहाल उर्वरकों की आपूर्ति व्यवस्था पर किसी बड़े असर की सूचना नहीं है। हालांकि, शेष पांच जहाजों की स्थिति और आगे की समुद्री आवाजाही पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मार्गों में किसी भी तरह की बाधा से माल की ढुलाई, लागत और आपूर्ति के समय पर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इस मार्ग की अहम भूमिका है। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य औद्योगिक वस्तुओं का परिवहन होता है। पश्चिम एशिया से आने वाले कई उत्पादों और कच्चे माल की आपूर्ति के लिए भी यह मार्ग महत्वपूर्ण है।
भारत अपनी कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू उर्वरक उत्पादन के साथ-साथ आयात पर भी निर्भर करता है। यूरिया, डीएपी और उर्वरक निर्माण में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न कच्चे माल की उपलब्धता देश की खेती और उर्वरक उद्योग दोनों के लिए जरूरी है। ऐसे में इस क्षेत्र में समुद्री परिवहन प्रभावित होने की आशंका भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
जहाजों के सुरक्षित निकलने से संबंधित खबर ऐसे समय में आई है, जब कृषि क्षेत्र में उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखना महत्वपूर्ण है। हालांकि, केवल जहाजों के सुरक्षित निकलने की सूचना से पूरे आयात तंत्र की स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। इसके लिए जहाजों के गंतव्य, बंदरगाहों पर पहुंचने की स्थिति और आगे की आपूर्ति संबंधी जानकारी भी आवश्यक होगी।
यूरिया और डीएपी की उपलब्धता पर रहेगा ध्यान
खेती में यूरिया और डीएपी का व्यापक इस्तेमाल होता है। यूरिया नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत है, जो पौधों की वानस्पतिक वृद्धि में मदद करता है। वहीं, डीएपी यानी डाई-अमोनियम फॉस्फेट से फसलों को नाइट्रोजन और फॉस्फोरस मिलता है। फसल की जरूरत और मिट्टी की स्थिति के अनुसार इन पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल किया जाता है।
रबी सीजन के दौरान गेहूं, सरसों, चना और अन्य फसलों की खेती के लिए उर्वरकों की मांग महत्वपूर्ण रहती है। इस दौरान किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराना कृषि उत्पादन व्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा है। यदि आयातित उर्वरकों या उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की आपूर्ति में देरी होती है, तो कुछ क्षेत्रों में वितरण व्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, उपलब्ध सूचना के अनुसार, सरकार ने फिलहाल उर्वरक आपूर्ति पर किसी बड़े प्रभाव की बात नहीं कही है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में किसी प्रकार की बाधा की आशंका पूरी तरह समाप्त हो गई है। वास्तविक स्थिति का आकलन देश में उपलब्ध भंडार, घरेलू उत्पादन, आयात की निरंतरता और राज्यों में वितरण की स्थिति को देखकर ही किया जा सकता है।
सल्फर की आपूर्ति भी उर्वरक उद्योग के लिए अहम
इन जहाजों में 1.11 लाख टन सल्फर शामिल होने की जानकारी भी महत्वपूर्ण है। सल्फर कई औद्योगिक प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होता है और उर्वरक उद्योग में भी इसकी भूमिका है। फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के उत्पादन से जुड़ी प्रक्रियाओं में सल्फर से बनने वाला सल्फ्यूरिक एसिड महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
इसलिए सल्फर की आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा आने पर उर्वरक निर्माण की लागत और उत्पादन व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि घरेलू उद्योगों के पास कितना भंडार उपलब्ध है, अन्य स्रोतों से कितनी आपूर्ति मिल रही है और आयातित सामग्री की समय पर उपलब्धता कैसी रहती है।
ऐसे में उर्वरक क्षेत्र के लिए केवल तैयार यूरिया और डीएपी की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि इनके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की नियमित आपूर्ति भी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों में स्थिरता रहने से उद्योगों को उत्पादन की योजना बनाने और आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिलती है।
जहाजों की आवाजाही और आयात लागत पर नजर
समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ने की स्थिति में जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने, प्रतीक्षा करने या परिवहन संबंधी अतिरिक्त व्यवस्थाएं करने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी परिस्थितियों में माल की डिलीवरी में देरी और बीमा या ढुलाई लागत बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि, इस मामले में भारतीय उर्वरक जहाजों की वास्तविक लागत पर कितना असर पड़ा है, इसकी पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
भारत के लिए आयातित उर्वरकों की लागत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि घरेलू बाजार में किसानों को उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था में सरकार की सब्सिडी की अहम भूमिका रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों, कच्चे माल की लागत और परिवहन खर्च में बदलाव होने पर उर्वरक क्षेत्र की कुल लागत प्रभावित हो सकती है। लेकिन किसी एक समुद्री घटना के आधार पर सब्सिडी या किसानों के लिए खुदरा कीमतों में बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने ऐसी परिस्थितियों में आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत बनाए रखने, उपलब्ध भंडार का आकलन करने और बंदरगाहों से राज्यों तक उर्वरकों की समय पर आवाजाही सुनिश्चित करने की चुनौती रहती है।
रबी सीजन में किसानों के लिए क्या मायने हैं?
भारत में रबी फसलों की बुवाई के समय उर्वरकों की मांग और वितरण व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाता है। गेहूं सहित कई प्रमुख फसलों के लिए किसानों को बुवाई के समय और फसल की शुरुआती वृद्धि के दौरान पोषक तत्वों की जरूरत होती है। ऐसे में उर्वरकों की आपूर्ति में निरंतरता बनाए रखना जरूरी है।
यदि आयातित उर्वरकों की आवाजाही सामान्य रहती है और घरेलू उत्पादन पर्याप्त बना रहता है, तो किसानों की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। इसके विपरीत, लंबे समय तक आयात में देरी होने पर कुछ स्थानों पर मांग और उपलब्धता के बीच असंतुलन पैदा होने की आशंका रहती है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी में देशभर में उर्वरक संकट या किसानों को होने वाली किसी व्यापक परेशानी की पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए किसानों के लिए जरूरी है कि वे खाद की खरीदारी अपनी फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार करें और अनावश्यक भंडारण से बचें। उर्वरकों की उपलब्धता से संबंधित जानकारी के लिए स्थानीय कृषि विभाग, सहकारी समितियों और अधिकृत विक्रेताओं से संपर्क किया जा सकता है।
सरकार के सामने आपूर्ति बनाए रखने की चुनौती
भारत के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। इसके लिए घरेलू उत्पादन, आयात, बंदरगाहों पर माल की आवाजाही और देश के विभिन्न राज्यों में वितरण के बीच तालमेल जरूरी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से 15 जहाजों के सुरक्षित निकलने की खबर से उर्वरक आपूर्ति के लिहाज से राहत मिली है। इसके बावजूद शेष पांच जहाजों की स्थिति, माल की निर्धारित गंतव्य तक पहुंच और भविष्य में समुद्री मार्गों की परिस्थितियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा।
सरकार के अनुसार, फिलहाल आपूर्ति व्यवस्था पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है। आने वाले समय में स्थिति कैसी रहती है, यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आयात की निरंतरता, घरेलू उत्पादन और उपलब्ध भंडार पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, भारत के लिए उर्वरक लेकर जा रहे 20 जहाजों में से 15 का सुरक्षित निकलना सकारात्मक घटनाक्रम है। इन जहाजों में शामिल यूरिया, डीएपी और सल्फर की मात्रा कृषि क्षेत्र तथा उर्वरक उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। अब यह देखना होगा कि शेष जहाजों की आवाजाही और आगे की आपूर्ति व्यवस्था किस तरह बनी रहती है। फिलहाल किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें और फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित खाद का इस्तेमाल करें।

