वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में नरमी आने से भारत सरकार को उर्वरक सब्सिडी के मोर्चे पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। सितंबर 2026 में यूरिया की आयात लागत घटकर 392 डॉलर प्रति टन रह गई, जबकि मई 2026 में यह 947 डॉलर प्रति टन के उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। इस तरह कुछ ही महीनों में यूरिया की आयात लागत में लगभग 60 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, यूरिया की कीमतों में कमी के बावजूद डीएपी, पोटाश और सल्फर जैसे दूसरे प्रमुख उर्वरक कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से सरकार पर सब्सिडी का दबाव बना हुआ है।
उर्वरक विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में यूरिया की वैश्विक कीमत पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 15 प्रतिशत से अधिक नीचे रही। पश्चिम एशिया में युद्ध और आपूर्ति व्यवस्था में आई बाधाओं के कारण इस वर्ष उर्वरक बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिलने वाली राहत के बावजूद सरकार को उर्वरक सब्सिडी के कुल खर्च का लगातार आकलन करना पड़ रहा है।
उर्वरक सब्सिडी के बजट की दोबारा समीक्षा
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने शुरुआत में उर्वरक सब्सिडी के लिए 1.77 लाख करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया था। बाद में वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया संकट के प्रभावों के कारण सब्सिडी खर्च को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सरकार के मौजूदा बजट आकलन में यह राशि 1.84 लाख करोड़ रुपये बताई गई है।
अधिकारियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में आ रहे बदलावों को देखते हुए सरकार लगातार सब्सिडी की जरूरत का पुनर्मूल्यांकन कर रही है। अप्रैल और मई 2026 में जब उर्वरकों की आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं थीं, तब उर्वरक विभाग के आंतरिक आकलन में सब्सिडी का खर्च बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई थी।
हालांकि, यूरिया की कीमतों में आई हालिया गिरावट से इस दबाव में कुछ कमी आने की संभावना है। व्यापार जगत से जुड़े सूत्रों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में कुल उर्वरक सब्सिडी खर्च पिछले वित्त वर्ष के 2.17 लाख करोड़ रुपये से लगभग 15,000 से 25,000 करोड़ रुपये अधिक रह सकता है। इसका प्रमुख कारण डीएपी, म्यूरेट ऑफ पोटाश और सल्फर की महंगी खरीद है।
पिछले वित्त वर्ष में 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च
वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर कुल 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें यूरिया सब्सिडी के रूप में लगभग 1.42 लाख करोड़ रुपये और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी के तहत 74,999 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
यह खर्च संशोधित बजट अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये से लगभग 17 प्रतिशत अधिक था। अधिकारियों के अनुसार, मार्च 2026 से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में तेजी आने के कारण सरकार को अनुमान से अधिक राशि खर्च करनी पड़ी।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में सरकार उर्वरक सब्सिडी के तहत 1.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी थी। यह शुरुआती बजट अनुमान 1.77 लाख करोड़ रुपये का लगभग 65 प्रतिशत है। इस राशि में यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन पर 87,316 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि वैश्विक बाजार में कीमतों में होने वाला बदलाव सीधे तौर पर सरकारी खजाने पर असर डालता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं, तब किसानों को नियंत्रित दरों पर खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकार को अधिक सब्सिडी देनी पड़ती है।
कई देशों से यूरिया आयात कर रहा भारत
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन के साथ-साथ आयात पर भी निर्भर है। आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने के उद्देश्य से सरकार ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्किये और नीदरलैंड सहित कई देशों से यूरिया आयात कर रही है।
आयात के स्रोत बढ़ाने का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र या आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम करना और अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखना है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण समुद्री परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंकाओं के बीच यह रणनीति महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत में यूरिया का घरेलू उत्पादन भी काफी हद तक आयातित कच्चे माल पर निर्भर करता है। प्राकृतिक गैस, विशेषकर तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी से यूरिया उत्पादन की लागत प्रभावित हो सकती है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 1 करोड़ टन यूरिया का आयात किया था। इसी अवधि में देश में कुल उर्वरक खपत लगभग 7 करोड़ टन रही, जिसमें यूरिया की खपत करीब 4 करोड़ टन थी। इससे देश की कृषि व्यवस्था में यूरिया की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है।
डीएपी की कीमतों में तेजी, किसानों को राहत जारी
यूरिया की कीमतों में गिरावट के विपरीत, डाय-अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी की वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, डीएपी की कीमत अप्रैल 2026 में 853 डॉलर प्रति टन थी, जो सितंबर में बढ़कर 906 डॉलर प्रति टन हो गई।
व्यापार सूत्रों के अनुसार, सितंबर 2026 में डीएपी की वैश्विक कीमत पिछले वर्ष की समान अवधि के लगभग 799 डॉलर प्रति टन के मुकाबले करीब 13 प्रतिशत अधिक रही। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण माल ढुलाई की लागत बढ़ने को इसकी प्रमुख वजहों में शामिल किया गया है।
डीएपी फसल की शुरुआती वृद्धि और जड़ों के विकास के लिए महत्वपूर्ण फॉस्फोरस उपलब्ध कराने वाला प्रमुख उर्वरक है। इसकी कीमतों में बढ़ोतरी से आयात लागत बढ़ती है, जिसका असर सरकार के सब्सिडी खर्च पर पड़ता है।
हालांकि, किसानों को राहत देने के लिए घरेलू बाजार में डीएपी की खुदरा कीमत 50 किलोग्राम के बैग के लिए 1,350 रुपये पर बनाए रखी गई है। इसी तरह, यूरिया की कीमत मार्च 2018 से 45 किलोग्राम के बैग के लिए 266.50 रुपये पर स्थिर है।
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत 4,000 रुपये प्रति 45 किलोग्राम बैग से अधिक के बराबर होने के बावजूद किसानों को इसे काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय लागत और किसानों से ली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर सब्सिडी व्यवस्था की अहमियत को दर्शाता है।
सल्फर और पोटाश ने बढ़ाई सरकार की चिंता
उर्वरक उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले सल्फर की कीमतों में भी तेज वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में सल्फर की वैश्विक कीमत पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 213 प्रतिशत बढ़कर 1,030 डॉलर प्रति टन हो गई।
सल्फर का उपयोग डीएपी और सिंगल सुपर फॉस्फेट यानी एसएसपी सहित कई उर्वरकों के निर्माण में किया जाता है। इसलिए इसकी कीमतों में बढ़ोतरी उर्वरक उद्योग की उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती है।
इसी तरह, म्यूरेट ऑफ पोटाश यानी एमओपी की कीमत सितंबर में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 9 प्रतिशत बढ़कर 383 डॉलर प्रति टन हो गई।
डीएपी, पोटाश और सल्फर की महंगी खरीद के कारण यूरिया से मिलने वाली राहत का पूरा लाभ कुल सब्सिडी खर्च में दिखाई नहीं दे रहा है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितता के बीच किसानों को जरूरी पोषक तत्वों की उपलब्धता और कीमतों में स्थिरता कैसे बनाए रखी जाए।
दूसरे देशों से डीएपी और एनपीके की खरीद
भारत डीएपी और नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश युक्त एनपीके उर्वरकों की जरूरत पूरी करने के लिए भी कई देशों से आयात करता है। इनकी खरीद रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से की जाती है। कुछ खेपों की आपूर्ति लाल सागर के रास्ते होती है।
अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, माल ढुलाई की लागत और आपूर्ति मार्गों में संभावित व्यवधान के कारण इन उर्वरकों की खरीद महंगी हो सकती है। ऐसे में अलग-अलग देशों से आयात करने की रणनीति आपूर्ति के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन इससे वैश्विक कीमतों में होने वाली तेजी का असर पूरी तरह समाप्त नहीं होता।
किसानों के लिए क्या है इसका महत्व?
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत का संकेत है। इससे आयात की लागत कम हो सकती है और यूरिया सब्सिडी पर पड़ने वाला दबाव घट सकता है। हालांकि, डीएपी, पोटाश और सल्फर की बढ़ती कीमतें इस राहत को सीमित कर रही हैं।
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद यूरिया और डीएपी की घोषित खुदरा कीमतें स्थिर रखी गई हैं। लेकिन उर्वरक की उपलब्धता केवल कीमतों पर निर्भर नहीं करती। आयात, घरेलू उत्पादन, परिवहन और वितरण व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
आने वाले महीनों में सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च पर वैश्विक बाजार की स्थिति, कच्चे माल की लागत और आयात की कीमतों का प्रभाव बना रह सकता है। यूरिया की कीमतों में गिरावट से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन डीएपी, पोटाश और सल्फर की महंगी खरीद के कारण वित्त वर्ष 2026-27 में सब्सिडी का कुल खर्च पिछले वर्ष से अधिक रहने का अनुमान है।

