खेत में फसल की पत्तियां पीली पड़ने लगें, किनारे सूखने लगें या पौधों की बढ़वार रुक जाए तो किसान अक्सर इसे खाद की कमी मान लेते हैं। कई बार यह अनुमान सही होता है, लेकिन हर बार नहीं। नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण पत्तियों पर दिखाई देते हैं, मगर पानी की कमी, जलभराव, रोग, कीट और मिट्टी की खराब स्थिति भी ऐसे ही संकेत दे सकती है। ऐसे में बिना कारण पहचाने खाद डालना खेती की लागत बढ़ा सकता है, जबकि समस्या जस की तस बनी रह सकती है।
पौधों की पत्तियां उनकी पोषण स्थिति का महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। जरूरत इस बात की है कि किसान इन संकेतों को पहचानें और खाद डालने से पहले उनकी सही वजह समझें।
नाइट्रोजन की कमी में पुरानी पत्तियां पड़ती हैं पीली
नाइट्रोजन पौधों की बढ़वार और पत्तियों में हरित पदार्थ यानी क्लोरोफिल के निर्माण के लिए जरूरी है। इसकी कमी होने पर सबसे पहले आमतौर पर पुरानी और निचली पत्तियों का रंग हल्का हरा पड़ने लगता है। धीरे-धीरे पीलापन बढ़ता है और पौधों की बढ़वार प्रभावित होने लगती है। गेहूं, धान और मक्का जैसी फसलों में पौधे अपेक्षाकृत छोटे रह सकते हैं।
नाइट्रोजन की कमी का संदेह होने पर किसान को पिछली खाद की मात्रा, फसल की अवस्था और खेत में नमी की स्थिति देखनी चाहिए। केवल पत्तियों का पीलापन देखकर यूरिया डाल देना सही तरीका नहीं है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने से लागत बढ़ सकती है और फसल की संतुलित बढ़वार भी प्रभावित हो सकती है।
फास्फोरस की कमी से धीमी पड़ती है बढ़वार
फास्फोरस पौधों में ऊर्जा के हस्तांतरण, जड़ों के विकास और प्रजनन संबंधी प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण है। इसकी कमी से पौधों की शुरुआती बढ़वार धीमी हो सकती है। कुछ फसलों में पत्तियां गहरे हरे रंग की हो जाती हैं, जबकि कुछ परिस्थितियों में उन पर बैंगनी या लालिमा दिखाई देने लगती है।
हालांकि, पत्तियों का बैंगनी पड़ना फास्फोरस की कमी का पक्का प्रमाण नहीं है। कम तापमान और जड़ों की कमजोर सक्रियता के कारण भी पौधों को मिट्टी में मौजूद फास्फोरस पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता। इसलिए बिना जांच के डीएपी या अन्य फास्फोरस युक्त खाद डालने के बजाय पहले समस्या की वजह समझना जरूरी है।
पोटाश की कमी में सूखने लगते हैं पत्तियों के किनारे
पोटाश पौधों में जल संतुलन बनाए रखने और प्रतिकूल परिस्थितियों को सहने की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। इसकी कमी होने पर पुरानी पत्तियों के किनारे पहले पीले और बाद में भूरे पड़ सकते हैं। गंभीर स्थिति में किनारे सूखकर जले हुए दिखाई देने लगते हैं।
लेकिन यही लक्षण पानी की कमी, अधिक गर्मी और मिट्टी में लवणता के कारण भी उभर सकते हैं। ऐसे में केवल पत्तियों के किनारे सूखने के आधार पर पोटाश की कमी मान लेना उचित नहीं है। किसान को खेत की नमी और मिट्टी की स्थिति भी जांचनी चाहिए।
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के संकेत भी पहचानें
जिंक, आयरन, मैग्नीशियम और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत पौधों को कम मात्रा में होती है, लेकिन इनकी कमी से फसल का विकास प्रभावित हो सकता है।
जिंक की कमी में नई पत्तियां छोटी रह सकती हैं और पौधों की बढ़वार धीमी हो सकती है। धान में इसकी कमी के दौरान पत्तियों पर भूरे धब्बे भी दिखाई दे सकते हैं। आयरन की कमी में नई पत्तियों की नसों के बीच पीलापन उभरता है, जबकि नसें अपेक्षाकृत हरी रह सकती हैं। मैग्नीशियम की कमी में आमतौर पर पुरानी पत्तियों की नसों के बीच पीलापन दिखाई देता है। बोरॉन की कमी से नई बढ़वार और प्रजनन अंग प्रभावित हो सकते हैं।
इन लक्षणों में फसल के अनुसार अंतर होता है। कई पोषक तत्वों की कमी के संकेत एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। इसलिए केवल तस्वीर देखकर या पत्तियों का रंग देखकर किसी खास तत्व की कमी तय करना जोखिम भरा हो सकता है।
पानी, रोग और मिट्टी की स्थिति भी हो सकती है वजह
पत्तियों का पीला पड़ना या सूखना हमेशा खाद की कमी का परिणाम नहीं होता। लंबे समय तक सूखा रहने से जड़ों को पानी और पोषक तत्व ग्रहण करने में परेशानी होती है। दूसरी ओर, खेत में जलभराव होने पर जड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। दोनों ही परिस्थितियों में पौधों पर पोषण की कमी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
मिट्टी का पीएच भी महत्वपूर्ण है। मिट्टी अधिक अम्लीय या क्षारीय होने पर कुछ पोषक तत्व मौजूद होने के बावजूद पौधों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाते। इसके अलावा, रोग, कीट, खरपतवारनाशी का गलत इस्तेमाल और मौसम में अचानक बदलाव भी पत्तियों के रंग और बनावट को प्रभावित कर सकते हैं।
किसान यह भी देखें कि लक्षण पूरे खेत में दिखाई दे रहे हैं या कुछ हिस्सों तक सीमित हैं। यदि समस्या खेत के कुछ स्थानों पर ही है, तो वहां मिट्टी की स्थिति, जलनिकासी या अन्य स्थानीय कारणों की जांच करना उपयोगी हो सकता है।
खाद डालने से पहले कराएं मिट्टी की जांच
फसल में पोषक तत्वों की कमी का संदेह होने पर सबसे पहले खेत की स्थिति का आकलन करें। फसल की अवस्था, सिंचाई, पहले डाली गई खाद और लक्षणों के फैलाव को ध्यान में रखें। इसके बाद मिट्टी की जांच कराएं। जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से पौधों या पत्तियों की जांच भी कराई जा सकती है।
जांच के परिणामों के आधार पर ही तय करें कि किस पोषक तत्व की जरूरत है और उसकी कितनी मात्रा देनी चाहिए। बिना जरूरत सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव या अतिरिक्त खाद का इस्तेमाल करने से खर्च बढ़ सकता है और पौधों को नुकसान भी पहुंच सकता है।
फसल की पत्तियां किसानों को पोषण संबंधी समस्या का शुरुआती संकेत जरूर देती हैं, लेकिन वे अपने आप में अंतिम निदान नहीं हैं। नाइट्रोजन की कमी में पुरानी पत्तियों का पीलापन, फास्फोरस की कमी में धीमी बढ़वार और पोटाश की कमी में पत्तियों के किनारों का सूखना उपयोगी संकेत हैं। सही निर्णय के लिए इन संकेतों की पुष्टि जरूरी है। समय पर जांच और संतुलित पोषण प्रबंधन से किसान अनावश्यक खाद खर्च से बच सकते हैं और फसल की सेहत बेहतर बनाए रख सकते हैं।

