भारत में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के दौरान यूरिया आयात में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 40.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह वृद्धि देश में उर्वरकों की मांग, घरेलू उत्पादन की क्षमता और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। यूरिया देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन उर्वरकों में शामिल है। धान, गेहूं और दूसरी प्रमुख फसलों की उत्पादकता बनाए रखने में इसकी अहम भूमिका है। ऐसे में आयात में तेज बढ़ोतरी का असर केवल उर्वरक व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध कृषि लागत, सरकारी सब्सिडी और खाद की उपलब्धता से भी है।
यूरिया की मांग में बढ़ोतरी के पीछे खेती की जरूरतें, फसलों के पोषण प्रबंधन और घरेलू आपूर्ति की स्थिति जैसे कई कारक हो सकते हैं। हालांकि, आयात में हुई वृद्धि को समझने के लिए केवल एक आंकड़े पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू उत्पादन, खपत, उपलब्ध भंडार और आयात की समयावधि का भी आकलन करना जरूरी है।
छह महीने में 55.89 लाख टन पहुंचा यूरिया आयात
उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान भारत ने कुल 55.89 लाख टन यूरिया का आयात किया। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह मात्रा 39.79 लाख टन थी। इस तरह छह महीने में आयात लगभग 16.10 लाख टन बढ़ गया। दूसरी ओर, घरेलू यूरिया उत्पादन में करीब 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बावजूद आयात का बढ़ना बताता है कि देश की उर्वरक आपूर्ति व्यवस्था में घरेलू उत्पादन के साथ-साथ विदेशी आपूर्ति की भी महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है।
यह स्थिति इसलिए भी ध्यान देने योग्य है कि सरकार लंबे समय से घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने और रासायनिक खादों के संतुलित इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है। आयात में वृद्धि अपने आप में घरेलू उत्पादन की विफलता का प्रमाण नहीं है, लेकिन इससे यह समझने की जरूरत जरूर पैदा होती है कि उपलब्ध उत्पादन और वास्तविक जरूरत के बीच कितना अंतर है।
पश्चिम एशिया संकट से प्रभावित हुई आपूर्ति
यूरिया आयात में बढ़ोतरी को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर भी नजर डालना जरूरी है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने समुद्री व्यापार और उर्वरकों की आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित किया। इसके कारण वित्त वर्ष की शुरुआत में यूरिया की आवक अपेक्षाकृत धीमी रही।
अप्रैल 2026 में भारत का यूरिया आयात लगभग 5.83 लाख टन रहा। इसके बाद आयात में तेजी आई और जुलाई में यह बढ़कर करीब 15.34 लाख टन पहुंच गया। यह अप्रैल-सितंबर की अवधि में किसी एक महीने का सबसे अधिक आयात था।
इस घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि उर्वरक आयात केवल घरेलू मांग पर निर्भर नहीं करता। जहाजों की उपलब्धता, समुद्री मार्गों की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आपूर्तिकर्ता देशों की क्षमता का भी इस पर असर पड़ता है। यदि किसी संकट के कारण आयात में देरी होती है, तो घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए बाद के महीनों में अधिक मात्रा में खेप मंगानी पड़ सकती है।
भारत ने आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। अगस्त 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष की पहली तिमाही में मिस्र, अल्जीरिया, नाइजीरिया और जॉर्जिया से यूरिया की आपूर्ति का हिस्सा बढ़ा था। इससे पारंपरिक आपूर्ति मार्गों में व्यवधान के बीच वैकल्पिक स्रोतों की भूमिका सामने आई।
उत्पादन बढ़ा, फिर भी आयात की जरूरत क्यों?
यूरिया आयात में वृद्धि के साथ घरेलू उत्पादन का बढ़ना एक महत्वपूर्ण पहलू है। उद्योग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-सितंबर के दौरान घरेलू उत्पादन में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके बावजूद आयात में 40.5 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई।
इसका एक संभावित कारण यह है कि घरेलू उत्पादन और कुल जरूरत के बीच का अंतर केवल उत्पादन की वृद्धि दर से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए उत्पादन की वास्तविक मात्रा, पिछला भंडार, राज्यों की मांग, वितरण व्यवस्था और आयातित खेपों के पहुंचने के समय को एक साथ देखना पड़ता है।
सरकार भी उर्वरकों की जरूरत का आकलन फसल क्षेत्र, सिंचाई की स्थिति, पिछले मौसमों में खपत और फसलों की अनुशंसित पोषक तत्व जरूरत के आधार पर करती है। घरेलू उत्पादन से पूरी होने वाली मांग और अनुमानित जरूरत के बीच का अंतर आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है।
इसलिए आयात में वृद्धि को देखते हुए यह जरूरी है कि घरेलू उत्पादन क्षमता के साथ-साथ संयंत्रों के नियमित संचालन, कच्चे माल की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था की भी समीक्षा की जाए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि आयात में बढ़ोतरी अतिरिक्त मांग का परिणाम है, आपूर्ति संबंधी बाधाओं का या दोनों का।
खाद की बिक्री में गिरावट, फिर आयात में तेजी
इस साल उर्वरक बाजार की एक और दिलचस्प स्थिति सामने आई है। यूरिया का आयात बढ़ा, लेकिन घरेलू बाजार में प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई। अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान सभी प्रमुख उर्वरकों की कुल घरेलू बिक्री 4.1 प्रतिशत घटकर 185.2 लाख टन रह गई।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, देश के कई हिस्सों में कमजोर और अनियमित मानसूनी बारिश के कारण किसानों ने उर्वरकों पर खर्च करने में सावधानी बरती। इस साल मानसून की कुल बारिश सामान्य से 13 प्रतिशत कम रही। हालांकि, जून से सितंबर के बीच खरीफ फसलों की बुवाई का कुल क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में केवल 1 प्रतिशत कम था।
इससे संकेत मिलता है कि उर्वरक बाजार की स्थिति को केवल बिक्री या आयात के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। किसान खाद कब खरीदते हैं, खेतों में नमी कितनी है और फसल की स्थिति कैसी है, इन सभी बातों का खपत पर असर पड़ता है।
कम बारिश के कारण किसान खाद खरीदने से बच सकते हैं, जबकि कंपनियां और सरकार संभावित जरूरत को देखते हुए आपूर्ति की तैयारी पहले से कर सकती हैं। इसी वजह से आयात बढ़ने और घरेलू बिक्री घटने की स्थिति एक साथ दिखाई दे सकती है।
यूरिया के साथ दूसरे उर्वरकों का संतुलन भी जरूरी
देश में उर्वरकों के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण चुनौती पोषक तत्वों का संतुलन है। यूरिया मुख्य रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जबकि फसलों को फास्फोरस, पोटाश और अन्य पोषक तत्वों की भी जरूरत होती है। इनकी मात्रा फसल, मिट्टी की स्थिति और विकास के चरण के अनुसार अलग-अलग होती है।
अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान एनपी और एनपीके उर्वरकों के उत्पादन तथा आयात में गिरावट दर्ज की गई। इसी अवधि में इन उर्वरकों की बिक्री भी 22.2 प्रतिशत घटकर 60 लाख टन से कुछ अधिक रही। डीएपी का आयात 11.2 प्रतिशत कम हुआ, जबकि इसकी घरेलू बिक्री में 0.6 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई।
ऐसे में यूरिया की उपलब्धता बनाए रखने के साथ दूसरे पोषक तत्वों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी है। केवल नाइट्रोजन पर अधिक निर्भरता से मिट्टी की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। किसानों को मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञों की सिफारिश के आधार पर संतुलित उर्वरक इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
सब्सिडी और कृषि लागत पर भी पड़ेगा असर
भारत में किसानों को यूरिया नियंत्रित खुदरा कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है और इसकी लागत का बड़ा हिस्सा सरकार सब्सिडी के माध्यम से वहन करती है। इसलिए आयात की मात्रा और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव सरकारी खर्च को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, आयात में 40.5 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि उर्वरक सब्सिडी भी उसी अनुपात में बढ़ जाएगी। वास्तविक खर्च आयात मूल्य, माल ढुलाई, विनिमय दर, घरेलू उत्पादन की लागत और सब्सिडी व्यवस्था सहित कई कारकों पर निर्भर करता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने या आपूर्ति मार्गों में बाधा आने पर सरकार को किसानों के लिए खाद की उपलब्धता बनाए रखने के साथ वित्तीय बोझ का भी प्रबंधन करना पड़ता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन को मजबूत करना और आयात की योजना समय पर बनाना दोनों महत्वपूर्ण हैं।
आगे की राह
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के आंकड़े भारत के उर्वरक क्षेत्र की दोहरी चुनौती को सामने रखते हैं। एक ओर घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ा है, दूसरी ओर आयात में तेज वृद्धि हुई है। साथ ही, कमजोर बारिश और किसानों की सीमित खरीद के कारण प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है।
आगे की रणनीति में घरेलू उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति स्रोतों में विविधता, समय पर आयात और राज्यों तक खाद की प्रभावी आपूर्ति को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी जरूरी है।
यूरिया आयात में बढ़ोतरी का वास्तविक अर्थ तभी स्पष्ट होगा, जब उत्पादन, खपत, भंडार और आयात की लागत का संयुक्त आकलन किया जाए। केवल आयात के आंकड़े को आधार बनाकर न तो घरेलू उत्पादन की स्थिति पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है और न ही खाद की वास्तविक कमी का। चुनौती यह है कि किसानों को बुवाई और फसल की जरूरत के समय पर्याप्त खाद मिले, घरेलू उत्पादन मजबूत बने और आयात पर निर्भरता के आर्थिक जोखिम को भी नियंत्रित किया जा सके।

