देश में खरीफ सीजन 2026 के दौरान प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है। दिलचस्प बात यह है कि खाद की बिक्री में कमी के बावजूद यूरिया का आयात बढ़ा है। इसके पीछे कमजोर मानसून, बारिश का असमान वितरण, किसानों की खरीद में सतर्कता और कुछ उर्वरकों के उत्पादन तथा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां अहम मानी जा रही हैं। हालांकि, बिक्री में गिरावट का अर्थ यह नहीं है कि खेतों में उर्वरकों की जरूरत भी उसी अनुपात में कम हो गई है।
उर्वरक उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान देश में यूरिया की घरेलू बिक्री पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 4.1 प्रतिशत घटकर 185.2 लाख टन रह गई। इसी अवधि में एनपीके कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री 22.2 प्रतिशत गिरकर लगभग 60 लाख टन रह गई। म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) की बिक्री में 11.7 प्रतिशत और सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) में 1.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वहीं, डीएपी की बिक्री लगभग 0.6 प्रतिशत कम रही।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गिरावट सभी उर्वरकों में एक जैसी नहीं रही। एनपीके कॉम्प्लेक्स और एमओपी की बिक्री में अपेक्षाकृत अधिक कमी आई, जबकि डीएपी की बिक्री लगभग पिछले साल के स्तर पर बनी रही। ऐसे में खाद की मांग को समझने के लिए बारिश, फसल की स्थिति और उर्वरकों की उपलब्धता को अलग-अलग देखना जरूरी है।
कमजोर मानसून का खेती पर असर
भारत में खरीफ फसलों की बुवाई और शुरुआती बढ़वार काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी फसलों में बारिश की कमी या लंबे समय तक सूखा रहने से किसानों के फैसले प्रभावित होते हैं। जब खेतों में पर्याप्त नमी नहीं होती, तो किसान खाद डालने का समय आगे बढ़ा सकते हैं या फसल की स्थिति देखकर अतिरिक्त निवेश से बच सकते हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, जून से सितंबर 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन में देशभर में लगभग 759.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश करीब 868.6 मिलीमीटर होती है। इस तरह मौसमी बारिश में लगभग 12.6 प्रतिशत की कमी रही। यह 2015 के बाद सबसे कमजोर मानसून सीजन बताया गया।
कम बारिश का असर देश के सभी हिस्सों में एक जैसा नहीं था। कुछ क्षेत्रों में सामान्य बारिश हुई, जबकि कई इलाकों में बारिश की कमी और लंबे सूखे अंतराल ने खेती को प्रभावित किया। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर खाद की बिक्री में गिरावट को केवल एक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा।
बुवाई का रकबा ज्यादा नहीं घटा, फिर बिक्री क्यों कम हुई?
खाद की मांग का आकलन करते समय बुवाई के कुल रकबे के साथ फसल की स्थिति और प्रति हेक्टेयर निवेश पर भी ध्यान देना चाहिए। आईएमडी और कृषि क्षेत्र से संबंधित प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, 25 सितंबर तक खरीफ फसलों का रकबा लगभग 110.7 मिलियन हेक्टेयर था। यह पिछले साल की समान अवधि से करीब 1.2 प्रतिशत कम था।
यानी बुवाई के कुल क्षेत्र में गिरावट, उर्वरकों की बिक्री में आई कमी से काफी कम थी। इससे संकेत मिलता है कि बिक्री में गिरावट के पीछे केवल कम रकबा ही जिम्मेदार नहीं हो सकता।
किसानों ने कितनी खाद खरीदी, कितनी पहले से उनके पास उपलब्ध थी और बारिश की स्थिति ने उनकी खरीद को किस तरह प्रभावित किया, इन सभी बातों को देखना जरूरी है। उद्योग से जुड़े लोगों ने पहले भी बताया है कि सीजन की शुरुआत में किसानों के पास पर्याप्त खाद का स्टॉक होने से बाद के महीनों में नई खरीद कम हो सकती है।
इसके अलावा, एक ही रकबे में अलग-अलग फसलें उगाने पर पोषक तत्वों की जरूरत भी अलग होती है। धान, दलहन, तिलहन और मक्का की खाद संबंधी जरूरतें समान नहीं हैं। यदि फसल का चयन बदलता है, तो कुल बुवाई क्षेत्र में बड़ा बदलाव न होने पर भी उर्वरकों की किस्म और मात्रा की मांग बदल सकती है।
किसानों ने खाद पर खर्च में सावधानी क्यों बरती?
कमजोर बारिश की स्थिति में किसान अक्सर खेती की लागत और संभावित उपज के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। यदि खेत में नमी कम है और फसल की बढ़वार प्रभावित हो रही है, तो किसान अतिरिक्त खाद खरीदने से पहले मौसम और फसल की स्थिति का आकलन कर सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी किसानों ने खाद का इस्तेमाल कम किया। लेकिन अनिश्चित मौसम में निवेश को लेकर सतर्कता बाजार में खरीद को प्रभावित कर सकती है।
यहां यह समझना जरूरी है कि खाद की बिक्री, खेत में वास्तविक इस्तेमाल और फसल की पोषक तत्व संबंधी जरूरत तीन अलग-अलग संकेतक हैं। बिक्री का आंकड़ा यह बताता है कि बाजार में कितनी खाद बिकी। इससे सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसानों ने खेतों में कितनी खाद डाली या फसल को कितने पोषक तत्व मिले।
यदि किसान पहले खरीदी गई खाद का इस्तेमाल कर रहे हों, तो मौजूदा अवधि की बिक्री कम दिख सकती है। इसी तरह, बारिश की कमी से फसल की बढ़वार प्रभावित होने पर कुछ क्षेत्रों में खाद की मांग घट सकती है। इन दोनों परिस्थितियों का असर एक साथ भी हो सकता है।
यूरिया की बिक्री घटी, फिर भी आयात क्यों बढ़ा?
उर्वरक बाजार में सबसे महत्वपूर्ण संकेत यूरिया की बिक्री और आयात के बीच का अंतर है। अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान भारत का यूरिया आयात 40.5 प्रतिशत बढ़कर 55.89 लाख टन पहुंच गया। पिछले साल की समान अवधि में यह मात्रा 39.79 लाख टन थी। दूसरी ओर, घरेलू बिक्री 4.1 प्रतिशत घट गई।
इस अंतर को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि आयात और बिक्री एक ही अवधि में समान दिशा में चलें, यह आवश्यक नहीं है। आयात का संबंध घरेलू उत्पादन, उपलब्ध भंडार, भविष्य की मांग और आपूर्ति की सुरक्षा से भी होता है।
अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति में व्यवधान या घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार और कंपनियां अतिरिक्त आयात कर सकती हैं। आयातित खाद का कुछ हिस्सा भंडार में भी रह सकता है और जरूरी नहीं कि वह उसी महीने किसानों को बेच दिया जाए।
इसलिए यूरिया आयात में बढ़ोतरी को केवल घरेलू मांग में बढ़ोतरी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि अधिक आयात के बावजूद बिक्री कम रही। इसकी पूरी व्याख्या के लिए उत्पादन, आयात, स्टॉक और वितरण के आंकड़ों को साथ देखकर विश्लेषण करना होगा।
एनपीके और एमओपी की बिक्री में ज्यादा गिरावट
एनपीके कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री में 22.2 प्रतिशत की गिरावट विशेष ध्यान देने योग्य है। इन उर्वरकों में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्व अलग-अलग अनुपात में होते हैं। फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार इनका उपयोग किया जाता है।
इसी अवधि में एमओपी की बिक्री 11.7 प्रतिशत घटी। इन उर्वरकों की बिक्री पर मौसम के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कच्चे माल की कीमतें और आपूर्ति की स्थिति भी असर डाल सकती हैं। उद्योग से संबंधित रिपोर्टों में सल्फर की ऊंची वैश्विक कीमतों को कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के उत्पादन और आयात पर दबाव डालने वाले कारकों में शामिल किया गया है।
हालांकि, बिक्री में गिरावट को पूरी तरह ऊंची कीमतों या आपूर्ति की कमी का परिणाम बताने के लिए पर्याप्त आंकड़े जरूरी हैं। बाजार में कम बिक्री का कारण मांग में कमजोरी, उपलब्ध स्टॉक, उत्पादन में बदलाव या इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव हो सकता है।
किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए क्या मायने हैं?
उर्वरकों की बिक्री में गिरावट पर नजर रखते समय यह देखना जरूरी है कि किसानों को खाद समय पर मिल रही है या नहीं और खेतों में फसलों की पोषण संबंधी जरूरत पूरी हो रही है या नहीं। केवल राष्ट्रीय बिक्री के आंकड़ों के आधार पर किसी राज्य या जिले में खाद की कमी अथवा पर्याप्तता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
किसानों के लिए मिट्टी की जांच, संतुलित उर्वरक इस्तेमाल और फसल की जरूरत के अनुसार खाद डालना महत्वपूर्ण है। बारिश कम होने पर खाद की मात्रा या समय में बदलाव करने से पहले कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेना बेहतर है। बिना जरूरत खाद डालना लागत बढ़ा सकता है, जबकि फसल की जरूरत के समय पोषक तत्वों की कमी भी उपज को प्रभावित कर सकती है।
नीति-निर्माताओं के लिए भी यह जरूरी है कि खाद की उपलब्धता और बिक्री के साथ क्षेत्रवार बारिश, फसल रकबे, मिट्टी की नमी और वितरण के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए।
निष्कर्ष
खरीफ सीजन 2026 में उर्वरकों की बिक्री में गिरावट के पीछे कमजोर मानसून, बारिश का असमान वितरण, किसानों की खरीद में सतर्कता और उर्वरक बाजार की आपूर्ति संबंधी परिस्थितियां महत्वपूर्ण कारक हैं। यूरिया की बिक्री घटने के बावजूद आयात बढ़ना यह दिखाता है कि खाद की मांग और आपूर्ति को केवल एक आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।
आगे रबी सीजन में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बारिश की कमी का मिट्टी की नमी और बुवाई पर कितना असर पड़ता है, किसान खाद की खरीद कब करते हैं और विभिन्न उर्वरकों का स्टॉक किस स्थिति में रहता है। यही संकेत बताएंगे कि बिक्री में गिरावट अस्थायी बदलाव है या कृषि क्षेत्र में मांग का स्वरूप बदल रहा है।

