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Home कृषि समाचार

Climate-Resilient Agriculture for Smallholders: जलवायु परिवर्तन के दौर में छोटे किसानों की खेती को सुरक्षित और लाभकारी बनाने की रणनीति

Climate-Resilient Agriculture for Smallholders: A strategy to make smallholder farming safe and profitable in the face of climate change.

Emran Khan by Emran Khan
November 3, 2026
in कृषि समाचार
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Climate-Resilient

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भारत की कृषि व्यवस्था लंबे समय से मानसून, तापमान और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रही है। देश के करोड़ों किसानों के लिए खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा का आधार भी है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम के बदलते स्वरूप ने कृषि उत्पादन की पारंपरिक व्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कहीं मानसून समय पर नहीं पहुंचता, कहीं कम अवधि में अत्यधिक बारिश हो जाती है, तो कहीं लंबे समय तक सूखे और गर्मी की स्थिति बनी रहती है। इसके अलावा बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, शीतलहर और Heat Stress जैसी परिस्थितियां भी फसलों को प्रभावित कर रही हैं।

इन परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रभाव छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है। सीमित भूमि, कम पूंजी, सिंचाई के साधनों की कमी और मौसम संबंधी जानकारी तक सीमित पहुंच के कारण छोटे किसानों के पास प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के विकल्प भी कम होते हैं। बड़े किसान जहां आधुनिक सिंचाई व्यवस्था, मशीनरी और अलग-अलग कृषि निवेशों के माध्यम से जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकते हैं, वहीं छोटे किसानों के लिए एक फसल का नुकसान भी पूरे साल की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे समय में Climate-Resilient Agriculture यानी जलवायु सहनशील कृषि का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य केवल मौसम की मार से फसल को बचाना नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करना है, जो बदलती जलवायु के अनुसार खुद को अनुकूलित कर सके और किसानों की उत्पादन क्षमता, आय तथा आजीविका को सुरक्षित रख सके।

इसके लिए Climate-Resilient Varieties, सही Sowing Decisions, Water Conservation, Crop Diversification और Integrated Farming Systems जैसे उपायों को एक साथ अपनाना जरूरी है।

  1. Climate-Resilient Agriculture क्या है?

Climate-Resilient Agriculture ऐसी कृषि प्रणाली है, जो सूखा, बाढ़, अत्यधिक तापमान, अनियमित वर्षा और अन्य जलवायु संबंधी जोखिमों के बावजूद उत्पादन तथा किसानों की आजीविका को बनाए रखने की क्षमता रखती है।

इसमें खेती के तरीकों को स्थानीय जलवायु, मिट्टी, पानी की उपलब्धता और किसानों की आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया जाता है। इसका उद्देश्य खेती की Vulnerability यानी संवेदनशीलता कम करना और Adaptation Capacity यानी अनुकूलन क्षमता बढ़ाना है।

Climate-Resilient Agriculture को समझने के लिए Climate-Smart Agriculture (CSA) की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है। इसमें तीन प्रमुख उद्देश्यों पर ध्यान दिया जाता है:

पहला, कृषि उत्पादकता और किसानों की आय को टिकाऊ तरीके से बढ़ाना।

दूसरा, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति कृषि और किसानों की अनुकूलन क्षमता मजबूत करना।

तीसरा, जहां संभव हो, कृषि गतिविधियों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना या कार्बन का बेहतर भंडारण करना।

यह जरूरी नहीं कि हर किसान एक साथ सभी तकनीकों को अपनाए। छोटे किसानों के लिए सबसे प्रभावी रणनीति वही होगी, जो उनके क्षेत्र की जलवायु, भूमि, उपलब्ध पानी और आर्थिक क्षमता के अनुरूप हो।

  1. छोटे और सीमांत किसान जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों हैं?

भारत में छोटे और सीमांत किसानों के सामने जलवायु परिवर्तन की चुनौती केवल मौसम तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध उनकी आर्थिक स्थिति, खेती के संसाधनों और बाजार तक पहुंच से भी है।

छोटी जोत होने के कारण किसानों के पास अलग-अलग फसलों और कृषि गतिविधियों के लिए भूमि का सीमित विकल्प होता है। कई किसान एक या दो प्रमुख फसलों पर निर्भर रहते हैं। यदि इन फसलों को सूखा, बाढ़ या अत्यधिक गर्मी से नुकसान पहुंचता है तो उनकी आय के दूसरे स्रोत भी सीमित हो सकते हैं।

इसके अलावा कई क्षेत्रों में किसान वर्षा आधारित खेती (Rainfed Agriculture) करते हैं। यहां सिंचाई के लिए पर्याप्त भूजल, नहर या अन्य जल स्रोत उपलब्ध नहीं होते। मानसून में देरी या बारिश के वितरण में बदलाव से बुवाई और फसल विकास दोनों प्रभावित होते हैं।

छोटे किसानों के लिए उन्नत बीज, ड्रिप सिंचाई, कृषि मशीनरी और मौसम आधारित डिजिटल सेवाओं में निवेश करना भी हमेशा आसान नहीं होता। कई बार तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद उसकी लागत, जानकारी और समय पर उपलब्धता अपनाने में बाधा बनती है।

इसलिए जलवायु अनुकूल खेती की रणनीति बनाते समय केवल नई तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक किसानों के लिए सस्ती, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध और आसानी से इस्तेमाल करने योग्य हो।

  1. Climate-Resilient Varieties: मौसम की चुनौती के अनुरूप बीजों का चयन

जलवायु अनुकूल खेती की शुरुआत सही बीज के चयन से होती है। फसल की किस्म यदि स्थानीय मौसम और मिट्टी की परिस्थितियों के अनुकूल हो तो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उत्पादन को बेहतर तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता है।

Climate-Resilient Crop Varieties ऐसी किस्में होती हैं, जिनमें सूखा, अधिक तापमान, जलभराव, लवणता या अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता विकसित की गई हो।

हालांकि, सभी जलवायु सहनशील किस्में हर प्रकार के तनाव को सहन नहीं करतीं। इसलिए किसान को अपनी खेती की वास्तविक समस्या के अनुसार किस्म का चुनाव करना चाहिए।

सूखा सहनशील किस्में (Drought-Tolerant Varieties)

कम बारिश या लंबे समय तक वर्षा न होने की स्थिति में सूखा सहनशील किस्में उपयोगी हो सकती हैं। इनमें ऐसी विशेषताएं विकसित की जाती हैं, जो पौधों को मिट्टी में उपलब्ध सीमित नमी का बेहतर उपयोग करने में मदद करती हैं।

बाजरा, ज्वार, रागी, अरहर, चना और कुछ धान एवं गेहूं की किस्में अलग-अलग क्षेत्रों में सूखा सहनशील कृषि के लिए महत्वपूर्ण विकल्प हो सकती हैं।

बाढ़ एवं जलभराव सहनशील किस्में (Flood and Submergence-Tolerant Varieties)

देश के पूर्वी और तटीय क्षेत्रों में कई बार अत्यधिक बारिश के कारण खेतों में पानी भर जाता है। ऐसी परिस्थितियों में सामान्य किस्मों की फसल प्रभावित हो सकती है।

जलभराव या अस्थायी जलमग्नता सहन करने वाली किस्में इन क्षेत्रों में नुकसान कम करने में मदद कर सकती हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ धान किस्मों में Submergence Tolerance की विशेषता विकसित की गई है।

गर्मी सहनशील किस्में (Heat-Tolerant Varieties)

फूल आने और दाना भरने की अवस्था में अत्यधिक तापमान कई फसलों की उपज को प्रभावित कर सकता है। गेहूं, सरसों और दलहनी फसलों में तापमान का प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।

Heat-Tolerant Varieties ऐसी परिस्थितियों में उत्पादन हानि को कम करने में मदद कर सकती हैं।

कम अवधि में तैयार होने वाली किस्में (Short-Duration Varieties)

जब मानसून में देरी हो या अगली फसल की बुवाई के लिए समय कम बचा हो, तब कम अवधि में तैयार होने वाली किस्में उपयोगी हो सकती हैं। इससे किसान उपलब्ध मौसम अवधि के भीतर फसल चक्र पूरा कर सकता है और अगली फसल के लिए खेत समय पर तैयार कर सकता है।

भारत में ICAR और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित किस्मों में इन विशेषताओं पर लगातार काम किया जा रहा है। ICAR के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच जारी 2,900 फसल किस्मों में से 2,661 किस्मों में एक या अधिक जैविक अथवा अजैविक तनावों के प्रति सहनशीलता पाई गई है।

इससे स्पष्ट होता है कि फसल सुधार कार्यक्रमों में Climate Resilience को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है।

  1. Sowing Decisions: बदलते मौसम में बुवाई का सही समय सबसे बड़ा निवेश

पारंपरिक कृषि में बुवाई का समय अक्सर स्थानीय अनुभव और सामान्य मानसून कैलेंडर के आधार पर तय किया जाता रहा है। लेकिन मौसम में बढ़ती अनिश्चितता के कारण अब केवल निर्धारित तारीख के आधार पर बुवाई करना पर्याप्त नहीं है।

Climate-Resilient Agriculture में Sowing Decisions को मौसम की वास्तविक स्थिति, मिट्टी में नमी, उपलब्ध सिंचाई और आने वाले दिनों के मौसम पूर्वानुमान से जोड़ना जरूरी है।

मानसून में देरी होने पर क्या करें?

यदि मानसून सामान्य समय से देर से आता है तो किसान को अपनी फसल योजना पर दोबारा विचार करना चाहिए। ऐसी स्थिति में अधिक अवधि में तैयार होने वाली फसल के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार Short-Duration Crops या कम अवधि वाली किस्मों का चुनाव किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, वर्षा आधारित क्षेत्रों में मूंग, उड़द, लोबिया, बाजरा और अन्य कम अवधि वाली फसलें कुछ परिस्थितियों में विकल्प बन सकती हैं। हालांकि, इनका चयन क्षेत्र की मिट्टी, बची हुई मानसूनी अवधि और स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय की सलाह के अनुसार होना चाहिए।

अत्यधिक बारिश की स्थिति में बुवाई प्रबंधन

अत्यधिक वर्षा होने पर खेतों में जलभराव और बीजों के सड़ने की समस्या उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थिति में उचित Drainage व्यवस्था, ऊंची क्यारियां और खेत की सतह का सही प्रबंधन महत्वपूर्ण होता है।

समय पर बुवाई और तापमान प्रबंधन

रबी फसलों में बुवाई के समय का उत्पादन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, गेहूं की बुवाई में देरी होने पर फसल के दाना भरने के समय तापमान बढ़ सकता है। इससे Grain Filling Duration कम होने और उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम रहता है।

इसलिए किसानों को स्थानीय कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा सुझाई गई बुवाई अवधि का पालन करना चाहिए।

Weather-Based Advisory का उपयोग

आज मौसम पूर्वानुमान, मोबाइल एप्लीकेशन और कृषि सलाह सेवाओं के माध्यम से किसानों को बारिश, तापमान और संभावित मौसम बदलाव की जानकारी मिल सकती है।

किसानों को IMD के मौसम पूर्वानुमान और कृषि मौसम सलाह (Agromet Advisory) का उपयोग करके बुवाई, सिंचाई, उर्वरक प्रयोग और फसल सुरक्षा संबंधी निर्णय लेने चाहिए।

महत्वपूर्ण बात यह है कि मौसम पूर्वानुमान को अंतिम निश्चितता नहीं मानना चाहिए, बल्कि उसे खेत की वास्तविक स्थिति के साथ जोड़कर निर्णय लेना चाहिए।

  1. Water Conservation: पानी बचाना ही भविष्य की खेती को सुरक्षित बनाना

जलवायु परिवर्तन के दौर में जल संसाधनों का संरक्षण छोटे किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में से एक है। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर गिर रहा है, सिंचाई की लागत बढ़ रही है और बारिश का वितरण अनिश्चित होता जा रहा है।

ऐसी स्थिति में केवल अधिक पानी उपलब्ध कराने के बजाय उपलब्ध पानी का बेहतर प्रबंधन करना जरूरी है।

Rainwater Harvesting

वर्षा जल संचयन के माध्यम से बारिश के पानी को खेतों, तालाबों और अन्य संरचनाओं में एकत्रित किया जा सकता है। इससे पानी का बहाव कम होता है और आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई के लिए अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध हो सकता है।

Farm Ponds, खेत तालाब, छोटे जल संग्रहण ढांचे और सामुदायिक जलाशय इस दिशा में उपयोगी विकल्प हैं।

Micro-Irrigation: ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक

Drip Irrigation में पानी सीधे पौधों के जड़ क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है। इससे पानी की अनावश्यक बर्बादी कम करने और सिंचाई को अधिक नियंत्रित बनाने में मदद मिलती है।

Sprinkler Irrigation में पानी का छिड़काव वर्षा जैसी बूंदों के रूप में किया जाता है। यह कई प्रकार की फसलों और भूमि परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है।

इन प्रणालियों का लाभ फसल, मिट्टी, पानी की गुणवत्ता और खेत की बनावट पर निर्भर करता है। छोटे किसानों के लिए समूह आधारित निवेश और सरकारी सहायता के माध्यम से इन तकनीकों को अधिक सुलभ बनाया जा सकता है।

Mulching: मिट्टी की नमी बनाए रखने की तकनीक

Mulching में मिट्टी की सतह को फसल अवशेष, सूखी घास, पत्तियों या उपयुक्त जैविक सामग्री से ढका जाता है।

इससे मिट्टी से पानी के वाष्पीकरण (Evaporation) को कम करने, खरपतवार नियंत्रित करने और मिट्टी के तापमान को संतुलित रखने में मदद मिल सकती है।

In-situ Moisture Conservation

खेत में ही वर्षा जल को रोककर मिट्टी में समाहित करने की व्यवस्था को In-situ Moisture Conservation कहा जाता है।

इसके लिए खेत की मेड़बंदी, कंटूर बंडिंग, रिज-फरो पद्धति, उचित जुताई और फसल अवशेषों का प्रबंधन उपयोगी हो सकता है।

विशेष रूप से ढलान वाले और वर्षा आधारित क्षेत्रों में इन उपायों से मिट्टी का कटाव कम करने और नमी संरक्षण में मदद मिलती है।

Irrigation Scheduling

किसान कई बार फसल को आवश्यकता से अधिक पानी दे देते हैं। जबकि वैज्ञानिक सिंचाई प्रबंधन में फसल की अवस्था, मिट्टी की नमी और मौसम को ध्यान में रखा जाता है।

मिट्टी की नमी के आधार पर सिंचाई करने से पानी और ऊर्जा दोनों की बचत हो सकती है।

  1. Crop Diversification: एक ही फसल पर निर्भरता कम करना

छोटे किसानों के लिए Climate Risk कम करने का एक प्रभावी तरीका Crop Diversification है। इसका अर्थ है कि किसान अपनी भूमि और संसाधनों के अनुसार अलग-अलग फसलों को खेती प्रणाली में शामिल करे।

यदि किसान पूरी भूमि पर केवल एक ही फसल उगाता है और उस फसल को मौसम से नुकसान पहुंचता है, तो उसकी पूरी कृषि आय प्रभावित हो सकती है।

इसके विपरीत, अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियां और चारा फसलों का संतुलित संयोजन जोखिम को बांटने में मदद कर सकता है।

उदाहरण के लिए, वर्षा आधारित क्षेत्रों में बाजरा और अरहर की अंतरफसल प्रणाली कुछ परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती है। इसी तरह मक्का के साथ दलहनी फसलें उगाने से भूमि उपयोग और उत्पादन प्रणाली में विविधता लाई जा सकती है।

Crop Diversification के संभावित लाभों में शामिल हैं:

  • एक फसल पर निर्भरता कम होना।
  • अलग-अलग समय पर आय प्राप्त होने की संभावना।
  • मिट्टी की उर्वरता और पोषण चक्र में सुधार।
  • कीट एवं रोगों के प्रकोप का जोखिम कम करने में सहायता।
  • परिवार के लिए विविध खाद्य पदार्थों की उपलब्धता।

हालांकि, फसल विविधीकरण अपनाने से पहले स्थानीय बाजार, खरीद व्यवस्था, भंडारण और परिवहन की उपलब्धता का आकलन भी जरूरी है। केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, किसान को उपज का लाभकारी बाजार भी मिलना चाहिए।

  1. Integrated Farming Systems: छोटे किसानों के लिए आय और जोखिम का संतुलन

Integrated Farming System (IFS) जलवायु अनुकूल कृषि का एक महत्वपूर्ण मॉडल है। इसमें फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, डेयरी, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, बागवानी और अन्य उपयुक्त गतिविधियों को एक-दूसरे से जोड़कर चलाया जाता है।

इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना और किसानों के लिए आय के अनेक स्रोत तैयार करना है।

उदाहरण के लिए, फसल उत्पादन से मिलने वाले अवशेषों का उपयोग पशुओं के चारे या अन्य उपयुक्त कार्यों में किया जा सकता है। पशुओं से मिलने वाले गोबर का इस्तेमाल खाद और बायोगैस उत्पादन में किया जा सकता है। इससे खेतों में जैविक पदार्थों की उपलब्धता बढ़ सकती है और बाहरी कृषि निवेशों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

छोटे किसानों के लिए IFS के प्रमुख घटक

Crop + Dairy Farming: फसल उत्पादन के साथ डेयरी गतिविधि से नियमित आय का अवसर मिल सकता है।

Crop + Goat Farming: सीमित भूमि और स्थानीय चारा उपलब्धता के अनुसार बकरी पालन अतिरिक्त आय का साधन बन सकता है।

Crop + Poultry: मुर्गी पालन से अंडे और मांस के माध्यम से आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो सकते हैं।

Crop + Horticulture: खेत के उपयुक्त हिस्से में फल और सब्जियों की खेती से उत्पादन में विविधता लाई जा सकती है।

Crop + Fishery: जहां पर्याप्त पानी और उपयुक्त तालाब उपलब्ध हों, वहां मत्स्य पालन को खेती के साथ जोड़ा जा सकता है।

IFS का कोई एक मॉडल सभी किसानों के लिए उपयुक्त नहीं होता। इसका चयन भूमि, पानी, श्रम, पूंजी, बाजार और परिवार की क्षमता के आधार पर होना चाहिए।

  1. Soil Health और Conservation Agriculture की भूमिका

जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की सहनशीलता बढ़ाने में मिट्टी का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

स्वस्थ मिट्टी में जैविक पदार्थ, उपयोगी सूक्ष्मजीव, बेहतर संरचना और पानी को रोककर रखने की क्षमता होती है। ऐसी मिट्टी सूखे के दौरान पौधों को कुछ समय तक नमी उपलब्ध कराने और अत्यधिक बारिश के दौरान पानी के अवशोषण में सहायता कर सकती है।

इसके लिए किसानों को Soil Organic Carbon बढ़ाने, फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन, हरी खाद, फसल चक्र और संतुलित पोषण प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।

Conservation Agriculture के तीन प्रमुख सिद्धांत हैं:

  1. न्यूनतम मिट्टी छेड़छाड़ (Minimum Soil Disturbance)।
  2. मिट्टी की सतह पर स्थायी जैविक आवरण (Permanent Soil Cover)।
  3. फसल विविधीकरण और Crop Rotation।

Zero Tillage और Residue Management जैसी तकनीकें कुछ कृषि प्रणालियों में मिट्टी की नमी बचाने, जुताई की लागत कम करने और समय पर बुवाई करने में उपयोगी हो सकती हैं।

हालांकि, इन तकनीकों का इस्तेमाल फसल, मिट्टी, खरपतवार और उपलब्ध मशीनरी के अनुसार करना चाहिए।

  1. Agroforestry: खेतों में पेड़ों के माध्यम से जलवायु सुरक्षा

Agroforestry में कृषि फसलों के साथ उपयुक्त पेड़ों और झाड़ियों को खेती प्रणाली में शामिल किया जाता है।

यह छोटे किसानों के लिए एक दीर्घकालिक विकल्प हो सकता है। उपयुक्त पेड़ मिट्टी के कटाव को कम करने, कार्बन संग्रहण, जैव विविधता और खेत के सूक्ष्म जलवायु संतुलन में मदद कर सकते हैं।

कुछ क्षेत्रों में खेत की मेड़ों पर पेड़ लगाकर लकड़ी, फल, चारा और अन्य उत्पादों से अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है।

लेकिन Agroforestry अपनाते समय पेड़ों की प्रजाति, जड़ों का फैलाव, छाया, पानी की जरूरत और मुख्य फसल के साथ प्रतिस्पर्धा का ध्यान रखना जरूरी है।

स्थानीय जलवायु और भूमि के अनुसार उपयुक्त प्रजातियों का चयन कृषि वानिकी विशेषज्ञों की सलाह से करना चाहिए।

  1. मौसम आधारित तकनीक और Digital Agriculture

Climate-Resilient Agriculture में डिजिटल तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

आज मौसम आधारित Advisory Systems, Satellite Monitoring, Remote Sensing, Soil Moisture Sensors और Mobile Applications के माध्यम से किसानों को कृषि संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।

Weather Forecasting: बारिश, तापमान और हवा की जानकारी से किसान बुवाई, सिंचाई और छिड़काव की योजना बना सकते हैं।

Soil Moisture Sensors: मिट्टी में उपलब्ध नमी की जानकारी से सिंचाई का समय निर्धारित करने में मदद मिलती है।

Satellite Monitoring: बड़े क्षेत्र में फसल की स्थिति और मौसम संबंधी जोखिमों का आकलन करने में उपयोगी हो सकती है।

Digital Agriculture Advisory: मोबाइल पर स्थानीय भाषा में मौसम और कृषि संबंधी जानकारी मिलने से किसानों की निर्णय क्षमता बेहतर हो सकती है।

हालांकि, डिजिटल तकनीक तभी प्रभावी होगी जब छोटे किसानों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट, स्थानीय भाषा में जानकारी और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता उपलब्ध हो।

  1. भारत में NICRA और जलवायु अनुकूल कृषि की पहल

भारत में जलवायु परिवर्तन से कृषि को होने वाले नुकसान का अध्ययन और समाधान विकसित करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) National Innovations in Climate Resilient Agriculture (NICRA) परियोजना संचालित कर रही है।

इस पहल के अंतर्गत जलवायु जोखिमों का आकलन, प्रतिरोधी फसल किस्मों का प्रदर्शन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और किसानों की क्षमता निर्माण जैसे कार्य किए जाते हैं।

भारत सरकार द्वारा 24 मार्च 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, NICRA के अंतर्गत 651 कृषि प्रधान जिलों में जलवायु जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन किया गया। इनमें 310 जिले जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पाए गए। इनमें 109 जिले Very High Vulnerability और 201 जिले High Vulnerability श्रेणी में रखे गए।

इन जिलों के लिए District Agriculture Contingency Plans (DACPs) भी तैयार किए गए हैं, जिनका उद्देश्य मौसम में असामान्य बदलाव की स्थिति में स्थानीय स्तर पर उपयुक्त फसल, किस्म और कृषि प्रबंधन संबंधी सलाह उपलब्ध कराना है।

इसके अतिरिक्त, 151 जलवायु संवेदनशील जिलों में कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से 448 Model Climate Resilient Villages में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।

इन प्रदर्शनों में सूखा और बाढ़ सहनशील किस्में, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, Integrated Farming Systems और अन्य प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तकनीकें शामिल हैं।

यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि जलवायु अनुकूल कृषि के लिए स्थानीय स्तर पर योजना बनाना और किसानों को खेतों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण देना कितना आवश्यक है।

  1. छोटे किसानों के लिए जलवायु अनुकूल खेती अपनाने में प्रमुख बाधाएं

Climate-Resilient Technologies के लाभ स्पष्ट होने के बावजूद छोटे किसानों के बीच इनका व्यापक विस्तार कई चुनौतियों से जुड़ा है।

सबसे पहली समस्या है प्रारंभिक निवेश। ड्रिप सिंचाई, खेत तालाब, सोलर पंप और आधुनिक कृषि उपकरणों के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है।

दूसरी समस्या है गुणवत्तापूर्ण बीजों और तकनीक की समय पर उपलब्धता। कई बार किसान को बुवाई के समय ही उपयुक्त किस्म का बीज नहीं मिल पाता।

तीसरी चुनौती है तकनीकी जानकारी। किसान को यह समझना जरूरी है कि उसकी भूमि और जलवायु के लिए कौन-सी तकनीक उपयोगी है।

चौथी समस्या बाजार से जुड़ी है। यदि किसान मौसम के जोखिम को कम करने के लिए नई फसल अपनाता है, लेकिन उसे उचित बाजार या खरीद व्यवस्था नहीं मिलती, तो आर्थिक नुकसान हो सकता है।

इन समस्याओं को दूर करने के लिए किसान उत्पादक संगठन (FPOs), सहकारी समितियों, KVKs, कृषि विश्वविद्यालयों, बैंकिंग संस्थानों और कृषि कंपनियों के बीच समन्वय मजबूत करना होगा।

  1. Climate-Resilient Agriculture को बढ़ावा देने के लिए आगे की रणनीति

छोटे किसानों के लिए जलवायु अनुकूल खेती को सफल बनाने के लिए केवल व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए गांव से लेकर जिला और राष्ट्रीय स्तर तक एक मजबूत व्यवस्था विकसित करनी होगी।

सबसे पहले प्रत्येक जिले की जलवायु, मिट्टी और पानी की उपलब्धता के आधार पर स्थानीय Crop Planning को बढ़ावा देना चाहिए।

दूसरा, जलवायु सहनशील बीजों का उत्पादन और वितरण मजबूत करना होगा। गांव स्तर पर Seed Banks और Community Nurseries की स्थापना से संकट के समय किसानों को बीज उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

तीसरा, सामुदायिक जल संरक्षण संरचनाओं, खेत तालाबों और Micro-Irrigation को बढ़ावा देना चाहिए।

चौथा, किसानों को स्थानीय भाषा में मौसम आधारित कृषि सलाह और समय पर पूर्वानुमान उपलब्ध कराने की जरूरत है।

पांचवां, FPOs और किसान समूहों के माध्यम से मशीनरी, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को आसान बनाया जा सकता है।

इसके अलावा, कृषि बीमा और वित्तीय सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसी योजनाएं अधिसूचित फसलों और निर्धारित जोखिमों के लिए किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने में भूमिका निभाती हैं। किसानों को अपने क्षेत्र में लागू बीमा शर्तों और समयसीमा की जानकारी रखनी चाहिए।

Climate-Resilient Agriculture for Smallholders: जलवायु परिवर्तन के दौर में छोटे किसानों की खेती को सुरक्षित और लाभकारी बनाने की रणनीति

भविष्य की खेती में उत्पादन के साथ सहनशीलता भी होगी महत्वपूर्ण

जलवायु परिवर्तन ने भारतीय कृषि के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य की खेती केवल अधिक उत्पादन प्राप्त करने तक सीमित नहीं रह सकती। अब ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जो कम पानी, बदलते तापमान, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी किसानों की आजीविका को सुरक्षित रख सके।

विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए Climate-Resilient Agriculture एक महत्वपूर्ण अवसर है। सही बीजों का चयन, मौसम के अनुसार बुवाई, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, मिट्टी का स्वास्थ्य और Integrated Farming Systems को अपनाकर कृषि जोखिमों को कम किया जा सकता है।

इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों और संस्थानों को ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हो और छोटे किसानों की आर्थिक क्षमता के भीतर उपलब्ध हो। सरकार को बीज, सिंचाई, कृषि बीमा और कृषि विस्तार सेवाओं को मजबूत करना होगा। वहीं, किसानों को मौसम की जानकारी, वैज्ञानिक सलाह और अपने क्षेत्र के सफल कृषि मॉडलों से जुड़ना होगा।

आखिरकार, Climate-Resilient Agriculture का वास्तविक उद्देश्य केवल फसल को मौसम से बचाना नहीं, बल्कि किसान को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाना है। जब किसान बदलती जलवायु के अनुसार अपनी खेती की योजना बना सकेगा, पानी और मिट्टी का बेहतर उपयोग कर सकेगा तथा एक से अधिक आय स्रोत विकसित कर सकेगा, तभी भारतीय कृषि का भविष्य अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी बन पाएगा।

 

 

 

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