Crop Residue Management: कृषि विज्ञान केन्द्र, हापुड़ द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन परियोजना के अंतर्गत किसानों के लिए पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण में हापुड़ जनपद के 25 किसानों ने सक्रिय रूप से प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को फसल अवशेषों के वैज्ञानिक एवं उपयोगी प्रबंधन के प्रति जागरूक करना, पराली जलाने की प्रवृत्ति को रोकना तथा कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग के लिए प्रेरित करना रहा।
प्रशिक्षण के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के विभिन्न तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी। किसानों को बताया गया कि फसल अवशेष खेतों के लिए बोझ नहीं, बल्कि मृदा स्वास्थ्य सुधारने और खेती की लागत घटाने वाला उपयोगी संसाधन बन सकते हैं।
डॉ. नवीन चन्द्र, प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, हस्तिनापुर ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि फसल अवशेषों को समस्या के बजाय कृषि के उपयोगी संसाधन के रूप में अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों से पराली न जलाने की अपील करते हुए हैप्पी सीडर, सुपर सीडर तथा अन्य आधुनिक कृषि यंत्रों के माध्यम से अवशेष प्रबंधन अपनाने पर जोर दिया।

डॉ. अरविन्द कुमार, प्रभारी अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, हापुड़ने फसल अवशेष प्रबंधन की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अवशेषों का खेत में वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने से मृदा की उर्वरता और जैविक कार्बन बढ़ाने के साथ-साथ नमी संरक्षण में भी मदद मिलती है। इससे किसानों की उत्पादन लागत में भी कमी लाई जा सकती है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. नीलम कुमारी ने किसानों को फसल अवशेषों के खेत में समावेशन, कम्पोस्ट एवं जैविक खाद निर्माण तथा अवशेषों से उपयोगी कृषि उत्पाद तैयार करने की तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने किसानों को सामूहिक रूप से इन तकनीकों को अपनाने और आसपास के किसानों को भी जागरूक करने के लिए प्रेरित किया।
पशु विज्ञान वैज्ञानिक डॉ. पी.के. मडके ने फसल अवशेषों के पशु आहार के रूप में उपयोग तथा भूसे की पोषण गुणवत्ता बढ़ाने की तकनीकों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उचित उपचार से धान एवं गेहूं के अवशेषों को पशुओं के लिए अधिक पौष्टिक और उपयोगी बनाया जा सकता है, जिससे पशुपालन की लागत कम करने में सहायता मिलती है।
मृदा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. अशोक सिंह ने फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने के लाभों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ एवं पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, नमी संरक्षण बेहतर होता है और मृदा स्वास्थ्य में सुधार आता है। उन्होंने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह भी दी। प्रशिक्षण के दौरान किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया और उन्हें पर्यावरण-अनुकूल एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
समापन अवसर पर किसानों ने फसल अवशेषों को न जलाने और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन को अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, वायु प्रदूषण में कमी, कृषि लागत में कटौती और सतत कृषि विकास का संदेश दिया गया।