लाल सड़न से राहत, Ganne ki kheti के लिए 12 नई किस्में मंजूर

Relief from red rot: 12 new Ganne ki kheti varieties approved for cultivation.

sugarcane

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Ganne ki kheti करने वाले किसानों के लिए राहत की खबर है। यूपी में लाल सड़न से बचाव और बेहतर उत्पादन के लिए 12 नई गन्ना किस्मों को मंजूरी मिली है।   राज्य में गन्ने की 12 नई किस्मों को खेती के लिए मंजूरी मिली है। इनमें चार किस्में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर और लखनऊ स्थित शोध संस्थानों से विकसित की गई हैं, जबकि आठ किस्में पहले केंद्र स्तर पर नोटिफाइड हो चुकी हैं। नई किस्मों में अधिक पैदावार, बेहतर चीनी परता और लाल सड़न रोग के प्रति बेहतर प्रतिरोध जैसी खूबियों पर खास ध्यान दिया गया है।

यह फैसला खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गन्ने की लोकप्रिय किस्म Co 0238 में पिछले वर्षों में लाल सड़न की समस्या चिंता का विषय रही है। सितंबर 2025 में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी Co 0238 की लाल सड़न के प्रति बढ़ी संवेदनशीलता का उल्लेख करते हुए इसके विकल्प तैयार करने की जरूरत बताई थी।

किसानों को मिलीं ये चार प्रमुख नई किस्में

उत्तर प्रदेश बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक में  Ganne ki kheti  के लिए उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर की तीन और ICAR-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ की एक नई किस्म को मंजूरी दी गई है। को.शा. 23232 अगेती किस्म है और इसे गन्ने की खेती में लोकप्रिय Co 0238 के बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। परीक्षणों में इसकी पौधा गन्ने की औसत उपज 95.56 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई, जो Co 0238 से करीब 9.44 प्रतिशत अधिक रही। इसकी पेड़ी की औसत उपज 80.57 टन प्रति हेक्टेयर रही। इसे लाल सड़न के प्रति रोगरोधी और अच्छी पेड़ी क्षमता वाली किस्म बताया गया है। को.लख. 21201 भी अगेती किस्म है। गन्ने की खेती करने वाले किसानों के लिए यह भी एक बेहतर विकल्प बन सकती है। इसकी औसत उपज करीब 86.57 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। परीक्षणों में इसका पोल प्रतिशत केन 13.94 प्रतिशत रहा, जो तुलना में इस्तेमाल की गई Co 0238 किस्म के 13.71 प्रतिशत से अधिक था। इसे लाल सड़न रोग के प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म बताया गया है। मध्य और देर से पकने वाली को.शा. 19235 की औसत पैदावार 87.58 टन प्रति हेक्टेयर रही। वहीं को.शा. 18232 की औसत पैदावार 92.38 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई और इसकी पेड़ी की उपज करीब 82.06 टन प्रति हेक्टेयर रही। दोनों किस्मों ने परीक्षण में पुरानी मानक किस्म CoS 767 की तुलना में बेहतर उत्पादन दिया, जिससे Ganne ki kheti में किसानों को अधिक उपज वाली किस्मों के नए विकल्प मिल सकते हैं।

आठ और किस्मों को भी मिली स्वीकृति

इसके अलावा केंद्र सरकार से नोटिफाइड आठ किस्मों को उत्तर प्रदेश में Ganne ki kheti  के लिए स्वीकार किया गया है। इनमें अगेती श्रेणी में CoP 16437, CoP 11438 और CoLk 16466 शामिल हैं।

मध्य और देर से पकने वाली किस्मों में Co 16030, Co 17018, Co 18022, CoPb 17215 और CoPb 18213 को शामिल किया गया है। इन किस्मों के आने से Ganne ki kheti करने वाले किसानों को अपने क्षेत्र, बुवाई के समय और चीनी मिल के पेराई कार्यक्रम के हिसाब से सही किस्म चुनने के ज्यादा विकल्प मिलेंगे।

ICAR-IISR के अनुसार CoLk 16466, जिसे Ikshu-15 नाम से भी जाना जाता है, अगेती किस्म है। यह गन्ने की खेती के लिए किसानों को एक और विकल्प देती है। संस्थान के आंकड़ों में इसकी औसत गन्ना उपज करीब 85.35 टन प्रति हेक्टेयर और सुक्रोज 17.31 प्रतिशत दर्ज है। साथ ही इसे लाल सड़न के प्रति resistant से moderately resistant श्रेणी में बताया गया है।

छह पुरानी किस्में धीरे-धीरे होंगी बाहर

नई किस्मों को मंजूरी देने के साथ उत्तर प्रदेश में छह पुरानी और कम प्रचलित गन्ना किस्मों को चरणबद्ध तरीके से बाहर करने का निर्णय भी लिया गया है। इनमें CoS 95255, CoS 97264, CoS 96275, CoS 97261, CoSe 96436 और CoSe 98231 शामिल हैं। इन किस्मों को अगले दो वर्षों में खेती से बाहर करने की योजना है। इसका उद्देश्य किसानों को ऐसी नई किस्मों की ओर ले जाना है जिनमें उत्पादन, चीनी परता और रोग प्रतिरोध की क्षमता बेहतर हो।

आखिर लाल सड़न से इतना खतरा क्यों?

लाल सड़न गन्ने की गंभीर बीमारियों में शामिल है। संक्रमित फसल में पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं और उत्पादन पर असर पड़ सकता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि लगातार एक ही संवेदनशील किस्म की बड़े क्षेत्र में खेती करने से रोग फैलने का जोखिम बढ़ सकता है।ICAR-IISR भी लंबे समय से लाल सड़न प्रबंधन के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों, स्वस्थ बीज और अलग-अलग किस्मों को अपनाने पर जोर देता रहा है। संस्थान ने एक ही किस्म की बहुत बड़े क्षेत्र में लगातार खेती से बचने की सलाह भी दी है।

किसानों को क्या करना चाहिए?

नई किस्म को केवल ज्यादा पैदावार देखकर पूरे खेत में लगाने के बजाय पहले अपने क्षेत्र की परिस्थितियों को ध्यान में रखना बेहतर है। पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मिट्टी, पानी, मौसम और रोग का दबाव अलग-अलग हो सकता है। किसानों को कोशिश करनी चाहिए कि प्रमाणित और रोगमुक्त बीज गन्ना ही लें। ICAR-IISR ने भी स्वस्थ रोपण सामग्री को लाल सड़न जैसे बीज से फैलने वाले रोगों से बचाव में महत्वपूर्ण माना है। संस्थान ने 2026 में किसानों के लिए Ikshu Beej पोर्टल भी शुरू किया है, जिसका उद्देश्य शोध आधारित और प्रमाणित गन्ना बीज की उपलब्धता को बेहतर करना है। यदि किसी खेत में लाल सड़न की समस्या सामने आ चुकी है तो प्रभावित फसल की पेड़ी लेने से बचना चाहिए। ICAR की किसान सलाह में भी रोग प्रतिरोधी किस्में लगाने और लाल सड़न प्रभावित फसल की रैटूनिंग यानी पेड़ी न लेने की सलाह दी गई है। किसान नई किस्म लगाने से पहले नजदीकी गन्ना विकास परिषद, चीनी मिल के गन्ना विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या गन्ना शोध केंद्र से यह जरूर पता करें कि उनके जिले के लिए कौन-सी किस्म सबसे उपयुक्त है और उसका प्रमाणित बीज कहां उपलब्ध है।

एक ही किस्म पर निर्भरता कम करना होगा फायदेमंद

नई किस्मों की मंजूरी का सबसे बड़ा फायदा केवल ज्यादा उपज नहीं है। इससे किसानों के पास अलग-अलग पकने वाली और अलग रोग प्रतिरोध क्षमता वाली किस्मों का विकल्प बढ़ेगा। इससे किसी एक किस्म पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सकती है। लाल सड़न जैसे रोग समय के साथ नई किस्मों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए किसी किस्म को रोग से हमेशा के लिए सुरक्षित मानना ठीक नहीं है। रोग प्रतिरोधी किस्म, स्वस्थ बीज, खेत की नियमित निगरानी और किस्मों में विविधता को साथ अपनाना ज्यादा सुरक्षित रणनीति है। कुल मिलाकर, 12 नई गन्ना किस्मों की मंजूरी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए उत्पादन और रोग प्रबंधन दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम है। खासकर CoS 23232 और CoLk 21201 जैसी अगेती किस्में Co 0238 पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती हैं। हालांकि किसान नई किस्म चुनते समय स्थानीय सिफारिश और प्रमाणित बीज को प्राथमिकता दें, तभी नई किस्मों का पूरा फायदा खेत तक पहुंच सकेगा।

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