• About
  • Advertise
  • Privacy & Policy
  • Contact
Fasal Kranti Agriculture News
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
  • Login
No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
No Result
View All Result
Fasal Kranti Agriculture News
No Result
View All Result
Home कृषि समाचार

उर्वरक सब्सिडी का खर्च ₹3.32 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान, किसानों को नकद सहायता की सिफारिश

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी ₹3.32 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान। ICRIER ने किसानों को सीधे नकद सहायता देने पर विचार की सिफारिश की।

Vipin Mishra by Vipin Mishra
October 23, 2026
in कृषि समाचार
0
भारत में उर्वरक सब्सिडी, किसानों को नकद सहायता और AgriStack डिजिटल व्यवस्था
0
SHARES
4
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

भारत में उर्वरक सब्सिडी का बढ़ता खर्च केंद्र सरकार के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और ऊर्जा की कीमतों पर पड़ने वाले असर के बीच वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का बिल बढ़कर 2.42 लाख करोड़ से 3.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। यह राशि केंद्रीय बजट में निर्धारित 1.70 लाख करोड़ रुपये के शुरुआती प्रावधान से काफी अधिक है। इस स्थिति को देखते हुए भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) के दो नीतिगत शोधपत्रों में किसानों को सीधे नकद सहायता देने की व्यवस्था पर विचार करने की सिफारिश की गई है।

शोधपत्रों में कहा गया है कि उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में सुधार के लिए प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालना नहीं, बल्कि सहायता प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना होना चाहिए। साथ ही, उर्वरक उपयोग को तर्कसंगत बनाने के लिए AgriStack और किसान पहचान पत्र जैसे डिजिटल ढांचों का इस्तेमाल करने से पहले उनकी विश्वसनीयता, पारदर्शिता और व्यावहारिकता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीय संकट से बढ़ सकती है सब्सिडी की लागत

ICRIER के शोधपत्रों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में फरवरी 2026 के अंत में उत्पन्न व्यवधान का असर भारत के उर्वरक आयात और उसकी लागत पर पड़ सकता है। संकट कितने समय तक बना रहता है और इसकी गंभीरता कितनी होती है, इसके आधार पर वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का खर्च 2.42 लाख करोड़ से 3.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

यह स्थिति सरकार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। यदि अनुमानित खर्च इस सीमा से काफी ऊपर जाता है, तो सरकार को अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करनी पड़ सकती है। इससे सार्वजनिक खर्च की दूसरी प्राथमिकताओं पर भी दबाव पड़ने की आशंका रहेगी।

भारत में किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सरकार सब्सिडी देती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और उनके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा की कीमतें बढ़ने पर सरकार की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था के साथ सरकारी वित्त को भी प्रभावित कर सकता है।

दो दशकों में कई गुना बढ़ा उर्वरक सब्सिडी का खर्च

ICRIER के शोधपत्रों में उर्वरक सब्सिडी के ऐतिहासिक आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि वित्त वर्ष 2000-01 में इसका खर्च लगभग 14,000 करोड़ रुपये था। उस समय यह फसल क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) का करीब 4.7 प्रतिशत था।

समय के साथ सब्सिडी का कुल खर्च बढ़ता गया। वित्त वर्ष 2022-23 में यह लगभग 2.51 लाख करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो फसल क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन का 8.6 प्रतिशत था। उस वर्ष रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक उर्वरक और ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि हुई थी।

इसके बाद अगले तीन वर्षों में सब्सिडी का खर्च घटकर लगभग 1.70 लाख करोड़ से 1.90 लाख करोड़ रुपये के दायरे में रहा। हालांकि, वित्त वर्ष 2026-27 में होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितता ने एक बार फिर सब्सिडी खर्च बढ़ने की आशंका पैदा कर दी है।

ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से काफी प्रभावित होती है। इसलिए दीर्घकालीन नीति बनाते समय किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के साथ-साथ सरकारी खर्च की स्थिरता पर भी ध्यान देना जरूरी है।

पंजाब और हरियाणा में प्रति हेक्टेयर अधिक सहायता

शोधपत्रों में उर्वरक सब्सिडी के राज्यों के बीच वितरण में भी बड़ा अंतर सामने आया है। विशेष रूप से नाइट्रोजन आधारित उर्वरक सहायता के मामले में पंजाब और हरियाणा अन्य कई राज्यों से काफी आगे हैं।

वर्ष 2024-25 पर समाप्त होने वाली तीन वर्षीय अवधि के औसत के अनुसार, पंजाब में शुद्ध बोए गए क्षेत्र के प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन सब्सिडी लगभग 25,701 रुपये रही। हरियाणा में यह राशि करीब 21,071 रुपये प्रति हेक्टेयर थी।

इसके मुकाबले केरल में यह लगभग 2,540 रुपये, असम में 4,703 रुपये और हिमाचल प्रदेश में 4,710 रुपये प्रति हेक्टेयर रही। इस तरह पंजाब और हरियाणा में प्रति हेक्टेयर सहायता कुछ राज्यों की तुलना में पांच से दस गुना तक अधिक रही।

फसल उत्पादन के मूल्य के अनुपात में भी अंतर दिखाई देता है। पंजाब में उर्वरक सब्सिडी फसल उत्पादन के मूल्य का लगभग 9.9 प्रतिशत और हरियाणा में 9.2 प्रतिशत रही। वहीं, केरल और हिमाचल प्रदेश में यह अनुपात करीब 1.4 से 1.5 प्रतिशत था।

शोधपत्रों के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में सहायता का संबंध सीधे उर्वरक के इस्तेमाल से है। इस कारण सरकारी सहायता को जल संरक्षण, फसल विविधीकरण या खेती के दूसरे उद्देश्यों की ओर स्थानांतरित करना आसान नहीं होता। शोधकर्ताओं का मानना है कि सहायता प्रणाली की समीक्षा करते समय क्षेत्रीय कृषि परिस्थितियों और अलग-अलग राज्यों की जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।

किसानों को सीधे नकद हस्तांतरण का विकल्प

ICRIER के शोधपत्रों में किसानों को प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण देने की संभावना पर विचार करने की सिफारिश की गई है। इस व्यवस्था में सहायता का एक हिस्सा उर्वरक की बिक्री पर दी जाने वाली मौजूदा सब्सिडी के बजाय सीधे किसानों तक पहुंचाया जा सकता है।

हालांकि, शोधपत्रों का जोर इस बात पर है कि नकद हस्तांतरण की व्यवस्था का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जिससे किसानों को सहायता प्राप्त करने में परेशानी न हो और उनकी उर्वरक खरीदने की क्षमता प्रभावित न हो। इसे मौजूदा व्यवस्था का तत्काल और पूर्ण विकल्प बनाने के बजाय, जरूरी शर्तें पूरी होने के बाद संभावित सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।

प्रत्यक्ष नकद सहायता लागू करने से पहले यह तय करना आवश्यक होगा कि किस किसान को कितनी सहायता दी जाए। भारत में खेती की परिस्थितियां, फसलें, सिंचाई की उपलब्धता, मिट्टी की प्रकृति और पोषक तत्वों की जरूरतें अलग-अलग हैं। इसलिए सभी किसानों के लिए एक समान उर्वरक सीमा या सहायता राशि निर्धारित करना व्यावहारिक नहीं होगा।

AgriStack के इस्तेमाल से पहले चार चुनौतियां

उर्वरक सहायता को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए AgriStack और किसान पहचान पत्र जैसे डिजिटल ढांचे उपयोगी साबित हो सकते हैं। लेकिन शोधपत्रों में स्पष्ट किया गया है कि इन प्रणालियों के इस्तेमाल से पहले कई बुनियादी समस्याओं का समाधान करना जरूरी है।

पहली चुनौती किसानों की वास्तविक जरूरत का आकलन है। उर्वरक की आवश्यकता फसल, क्षेत्रफल, मिट्टी और खेती की परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। इसलिए पूरे देश के लिए एक समान पात्रता तय करने के बजाय स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था विकसित करनी होगी।

दूसरी चुनौती वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति की पहचान है। कई मामलों में जमीन का मालिक कोई और होता है, जबकि खेती कोई दूसरा व्यक्ति करता है। यदि सहायता केवल जमीन के स्वामित्व के आधार पर निर्धारित की गई, तो वास्तविक किसान इसके लाभ से वंचित हो सकता है। इसलिए पात्रता तय करते समय वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति की भूमिका को ध्यान में रखना होगा।

तीसरी चुनौती सहायता को समय और मौसम के अनुसार बदलने की है। किसान हर मौसम में एक ही फसल नहीं उगाते। फसल का चयन, बोया गया क्षेत्र और खेती की परिस्थितियां बदल सकती हैं। इसलिए डिजिटल व्यवस्था में पात्रता को स्थायी वार्षिक सीमा के बजाय फसल और मौसम की जरूरत के अनुसार अद्यतन करने की क्षमता होनी चाहिए।

चौथी चुनौती आंकड़ों की गुणवत्ता और किसानों के अधिकारों से जुड़ी है। भूमि और फसल संबंधी रिकॉर्ड में गलतियों को सुधारने, व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा, सहमति, विभिन्न डिजिटल प्रणालियों के बीच तालमेल और शिकायतों के समाधान की मजबूत व्यवस्था आवश्यक होगी।

सुधार के साथ किसानों के हितों की सुरक्षा जरूरी

ICRIER के ये शोधपत्र उर्वरक सब्सिडी को लेकर एक महत्वपूर्ण नीतिगत बहस सामने रखते हैं। एक ओर किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराना कृषि उत्पादन और खेती की लागत के लिहाज से जरूरी है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से सरकारी खर्च पर पड़ने वाला दबाव भी बढ़ रहा है।

प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और डिजिटल पहचान व्यवस्था इस चुनौती से निपटने के संभावित विकल्प हो सकते हैं। लेकिन इनका लाभ तभी मिलेगा, जब वास्तविक किसानों की पहचान सही हो, सहायता की गणना कृषि जरूरतों के आधार पर हो और रिकॉर्ड में गलतियों को सुधारने की व्यवस्था उपलब्ध हो।

फिलहाल शोधपत्रों में मौजूदा उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने की सिफारिश नहीं की गई है। उनका सुझाव है कि पहले जरूरी बुनियादी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए और उसके बाद यह तय किया जाए कि किसानों को सीधे नकद सहायता किस रूप में दी जा सकती है तथा वह मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था की जगह लेगी या उसके पूरक के रूप में काम करेगी।

भारत के लिए चुनौती केवल उर्वरक सब्सिडी का बढ़ता बिल नियंत्रित करना नहीं है, बल्कि ऐसा संतुलित मॉडल तैयार करना भी है, जिसमें सरकारी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो और किसानों को समय पर, पर्याप्त तथा जरूरत के अनुरूप सहायता मिलती रहे।

 

Tags: AgriStackICRIERउर्वरक सब्सिडीकिसान सहायताकृषि अर्थव्यवस्थाकृषि समाचारखाद नीतिभारत सरकार
Previous Post

Fish Farming in Mountain Areas: किसानों के लिए स्वरोजगार और अच्छी कमाई का बेहतरीन अवसर

Recent Posts

  • उर्वरक सब्सिडी का खर्च ₹3.32 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान, किसानों को नकद सहायता की सिफारिश
  • Fish Farming in Mountain Areas: किसानों के लिए स्वरोजगार और अच्छी कमाई का बेहतरीन अवसर
  • सौर ऊर्जा से आटा प्रसंस्करण की नई पहल, हमीरपुर में 751 किसानों की एफपीओ ने स्थापित की यूनिट
  • प्राकृतिक खेती से अरंडी उत्पादन की नई मिसाल पेश कर रही बाड़मेर की किसान उत्पादक कंपनी
  • Top 5 Richest Farmers: 100 करोड़ की खेती से लेकर आधुनिक एग्री-बिजनेस तक, जानिए इनकी पूरी कहानी

Recent Comments

No comments to show.
Fasal Kranti is a leading monthly agricultural magazine dedicated to empowering Indian farmers. Published scince 2013 in Hindi, Punjabi, Marathi, and Gujarati, it provides valuable insights, modern farming techniques, and the latest agricultural updates. With a vision to support 21st-century farmers, Fasal Kranti strives to be a trusted source of knowledge and innovation in the agricultural sector.

Category

  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes

Newsletter

Subscribe to our Newsletter. You choose the topics of your interest and we’ll send you handpicked news and latest updates based on your choice.

Quick Links

  • Privacy policy
  • Terms and Conditions

Contact

Promote your brand with Fasalkranti. Connect with us for advertising.
  • E-Mail: info@fasalkranti.in
  • Phone: +91 9625941688
Copyrights © 2026. Fasal Kranti, Inc. All Rights Reserved. Maintained By Fasalkranti Team .

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry

© 2026 Fasalkranti - News and Magazine by Fasalkranti news.

Go to mobile version