कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाने, दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने तथा किसानों की आय में सुधार के लिए सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण बीजों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना आवश्यक है। यह बात कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने उत्तर प्रदेश के मऊ स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय कृषि महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव ब्यूरो (ICAR-NBAIM), कुशमौर में आयोजित किसान सम्मेलन के दौरान कही। 18 अक्टूबर 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम में कृषि अनुसंधान को किसानों की जरूरतों से जोड़ने, जैविक संसाधनों के बेहतर उपयोग और टिकाऊ कृषि प्रणालियों को विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय कृषि महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह (NAIMCC) के भवन का शिलान्यास भी किया गया। यह आयोजन कृषि क्षेत्र में उपयोगी सूक्ष्मजीवों से संबंधित अनुसंधान, संरक्षण और उनके व्यावहारिक उपयोग को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा। सम्मेलन में पूर्वी उत्तर प्रदेश के सात कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के प्रतिनिधियों सहित 800 से अधिक किसान, महिला किसान, वैज्ञानिक, अधिकारी और कृषि क्षेत्र से जुड़े अन्य हितधारक शामिल हुए।
दलहन और तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर जोर
डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि भारत में दलहन और तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए गुणवत्तापूर्ण बीजों, आधुनिक कृषि तकनीकों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों का प्रभावी उपयोग महत्वपूर्ण है। कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए उत्पादन प्रणालियों को अधिक वैज्ञानिक, टिकाऊ और संसाधन-कुशल बनाने की जरूरत है।
दलहन और तिलहन भारतीय कृषि तथा खाद्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण घटक हैं। दलहन प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं, जबकि तिलहन से खाद्य तेल प्राप्त होता है। इन फसलों का घरेलू उत्पादन बढ़ने से किसानों के लिए विविध फसल विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं और देश की आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।
उन्होंने कृषि उत्पादन में सुधार के लिए बेहतर बीजों, फसल प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों और सूक्ष्मजीव आधारित समाधानों के बीच समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाना और उन्हें स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुसार अपनाने में सहायता देना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण है।
सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकें बदल सकती हैं खेती का स्वरूप
कृषि में उपयोगी सूक्ष्मजीव मिट्टी के स्वास्थ्य, पोषक तत्वों की उपलब्धता और पौधों की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कुछ लाभकारी सूक्ष्मजीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और पौधों की वृद्धि में सहायता करते हैं। इनका वैज्ञानिक उपयोग कृषि संसाधनों की दक्षता बढ़ाने और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों को प्रोत्साहित करने में सहायक हो सकता है।
डॉ. जाट ने सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों को कृषि परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और प्राकृतिक खेती सहित विज्ञान आधारित कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन में सुधार के लिए ऐसी तकनीकों को अपनाना जरूरी है, जो किसानों की जरूरतों के अनुरूप हों और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करें।
हालांकि, सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों का प्रभाव मिट्टी की प्रकृति, फसल, जलवायु और उपयोग की विधि पर निर्भर करता है। इसलिए इन तकनीकों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह और वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार अपनाना महत्वपूर्ण है। रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में बदलाव भी फसल की पोषण संबंधी आवश्यकताओं तथा मिट्टी की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
आयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में पहल
भारत में कृषि उत्पादन की बढ़ती जरूरतों के बीच उर्वरकों की उपलब्धता और उनके कुशल उपयोग का विषय महत्वपूर्ण बना हुआ है। इस संदर्भ में डॉ. जाट ने आयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम करने तथा कृषि में प्राकृतिक संसाधनों और लाभकारी सूक्ष्मजीवों के उपयोग को बढ़ावा देने पर बल दिया।
उन्होंने गुणवत्तापूर्ण बीजों, प्राकृतिक खेती और विज्ञान आधारित उत्पादन प्रणालियों को कृषि की उत्पादकता तथा किसानों की आय में सुधार के लिए महत्वपूर्ण बताया। सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों का उचित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता और उर्वरक उपयोग की दक्षता को बेहतर बनाने में योगदान दे सकता है।
कृषि में आत्मनिर्भरता का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना, खेती की लागत को नियंत्रित करने के अवसर तलाशना और कृषि प्रणाली को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाना भी है। इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और किसानों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
गोबरधन योजना, बायो-सीएनजी और हरित ऊर्जा की संभावनाएं
किसान सम्मेलन के दौरान डॉ. जाट ने जैविक संसाधनों के प्रभावी उपयोग और वैकल्पिक ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं पर भी चर्चा की। उन्होंने गोबरधन योजना, बायो-सीएनजी, राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन और ग्रीन अमोनिया जैसे विषयों का उल्लेख करते हुए कृषि तथा ऊर्जा क्षेत्र के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता को रेखांकित किया।
कृषि और पशुपालन से निकलने वाले जैविक अवशेषों का उचित प्रबंधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी अवसर उपलब्ध करा सकता है। गोबर और अन्य उपयुक्त जैविक अपशिष्टों से बायोगैस तथा जैव-सीएनजी का उत्पादन किया जा सकता है। इससे अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा मिलने के साथ वैकल्पिक ऊर्जा के उत्पादन की संभावनाएं भी विकसित होती हैं।
इसी तरह, हरित हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया जैसी तकनीकों पर अनुसंधान भविष्य में ऊर्जा तथा उर्वरक उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में योगदान दे सकता है। हालांकि, इनके व्यापक उपयोग के लिए तकनीकी विकास, लागत, बुनियादी ढांचे और व्यावसायिक व्यवहार्यता जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
डॉ. जाट के संबोधन में इन पहलों का उल्लेख कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग और वैकल्पिक ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देने के व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा रहा।
भोजन, पोषण और स्वास्थ्य के बीच संबंध
कृषि उत्पादन का उद्देश्य केवल खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि लोगों को पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराने में योगदान देना भी है। इसी संदर्भ में डॉ. जाट ने कृषि, पोषण और स्वास्थ्य के आपसी संबंध पर प्रकाश डाला।
उन्होंने ‘फूड ऐज मेडिसिन’ यानी भोजन को स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखने की अवधारणा का उल्लेख किया। इसके साथ ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की ‘सेहत’ पहल का भी संदर्भ दिया।
यह दृष्टिकोण कृषि अनुसंधान को पोषण सुरक्षा और जनस्वास्थ्य से जोड़ने की आवश्यकता को सामने लाता है। संतुलित आहार, पोषक तत्वों से भरपूर फसलें और खाद्य गुणवत्ता से जुड़े विषय कृषि अनुसंधान के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। ऐसे प्रयासों से कृषि उत्पादन, पोषण और स्वास्थ्य के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में काम किया जा सकता है।
NAIMCC के शिलान्यास से सूक्ष्मजीव अनुसंधान को मिलेगा प्रोत्साहन
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण राष्ट्रीय कृषि महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव कल्चर संग्रह (NAIMCC) के भवन का शिलान्यास रहा। यह पहल ICAR-NBAIM में कृषि की दृष्टि से महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीवों के संरक्षण और उनसे संबंधित अनुसंधान गतिविधियों के लिए संस्थागत आधार को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कृषि में उपयोगी सूक्ष्मजीवों की पहचान, उनका वैज्ञानिक अध्ययन, सुरक्षित संरक्षण और आवश्यकतानुसार उपलब्धता अनुसंधान तथा तकनीकी विकास के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे कल्चर संग्रह वैज्ञानिकों को सूक्ष्मजीवों की विविधता को समझने और उनके संभावित कृषि उपयोगों पर काम करने में सहायता प्रदान कर सकते हैं।
सूक्ष्मजीव संसाधनों का व्यवस्थित संरक्षण भविष्य में जैव उर्वरकों, पौधों की वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाले सूक्ष्मजीवों और अन्य कृषि जैव-प्रौद्योगिकी समाधानों के विकास के लिए उपयोगी हो सकता है।
NAIMCC से जुड़ी इस पहल का महत्व कृषि अनुसंधान की आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने और उपयोगी सूक्ष्मजीवों पर वैज्ञानिक कार्यों को प्रोत्साहित करने के संदर्भ में देखा जा सकता है।
किसानों की जरूरतों के अनुरूप अनुसंधान जरूरी: डॉ. डी.के. यादव
कार्यक्रम में ICAR के उपमहानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी.के. यादव ने किसान केंद्रित अनुसंधान, तकनीक हस्तांतरण और अनुसंधान तथा विस्तार प्रणालियों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया।
उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। कृषि अनुसंधान का वास्तविक लाभ तभी व्यापक स्तर पर मिल सकता है, जब नई तकनीकों को किसानों की स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और खेती की व्यावहारिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनाने में सहायता दी जाए।
किसान केंद्रित अनुसंधान के तहत खेती की वास्तविक समस्याओं की पहचान, समाधान आधारित तकनीकों का विकास और उनके प्रभाव का मूल्यांकन महत्वपूर्ण है। इसके लिए वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद तथा कृषि विस्तार सेवाओं की सक्रिय भूमिका आवश्यक है।
फसल विविधीकरण और मूल्य संवर्धन से बढ़ेगी किसानों की आय: डॉ. राजबीर सिंह
ICAR के उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. राजबीर सिंह ने फसल विविधीकरण, एकीकृत फसल प्रणालियों, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की भूमिका पर प्रकाश डाला।
उन्होंने किसानों को बेहतर आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए खेती को विविध गतिविधियों से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। फसल विविधीकरण के माध्यम से किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग फसलों को अपनाने पर विचार कर सकते हैं। वहीं, एकीकृत फसल प्रणालियां उपलब्ध भूमि, जल और अन्य संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकती हैं।
कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन से उपज को अधिक उपयोगी उत्पादों में बदलने तथा बाजार तक पहुंच बनाने के अवसर विकसित हो सकते हैं। किसान उत्पादक संगठन भी सामूहिक खरीद, विपणन, प्रसंस्करण और बाजार संपर्क के माध्यम से किसानों की आर्थिक गतिविधियों को मजबूती देने में भूमिका निभा सकते हैं।
800 से अधिक किसानों की भागीदारी
ICAR-NBAIM, कुशमौर, मऊ में आयोजित इस सम्मेलन में 800 से अधिक किसान और महिला किसान शामिल हुए। इसके अलावा वैज्ञानिकों, अधिकारियों तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के सात कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रतिनिधियों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।
इतनी बड़ी संख्या में किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े हितधारकों की उपस्थिति ने कृषि अनुसंधान को खेतों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने के महत्व को रेखांकित किया। किसान सम्मेलन जैसे आयोजन वैज्ञानिक जानकारी साझा करने, नई तकनीकों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और कृषि क्षेत्र की चुनौतियों पर संवाद स्थापित करने का अवसर प्रदान करते हैं।
कुल मिलाकर, यह कार्यक्रम दलहन और तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता, सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग, वैकल्पिक ऊर्जा और किसान केंद्रित अनुसंधान को बढ़ावा देने के व्यापक दृष्टिकोण को सामने लाया। NAIMCC के शिलान्यास के साथ इस आयोजन ने कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच संपर्क मजबूत करने तथा टिकाऊ, उत्पादक और आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था की दिशा में प्रयासों को आगे बढ़ाने के महत्व को रेखांकित किया।
