उत्तर भारत में धान की कटाई का सीजन शुरू होने के साथ ही पराली प्रबंधन (Paddy Straw Management) को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। खेतों में फसल अवशेष जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने और किसानों को पराली के बेहतर उपयोग का विकल्प उपलब्ध कराने के उद्देश्य से Renewable Energy Company SAEL Industries Ltd. ने करीब 20 लाख टन धान की पराली (Paddy Straw) की खरीद शुरू कर दी है। कंपनी इस खरीद प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से पूरा करेगी। एकत्रित की जाने वाली पराली का इस्तेमाल कंपनी के 11 कृषि अवशेष आधारित Waste-to-Energy Plants में ईंधन के रूप में किया जाएगा। इन संयंत्रों की कुल स्थापित क्षमता 164.9 मेगावाट (MW) है।
कंपनी की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब उत्तर भारत के कई राज्यों में धान की कटाई के बाद खेतों में बचे फसल अवशेषों के प्रबंधन की चुनौती बनी हुई है। विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के एनसीआर से जुड़े जिलों में पराली जलाने की घटनाएं वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारण बनती हैं। ऐसे में पराली को जलाने के बजाय ऊर्जा उत्पादन में इस्तेमाल करना किसानों, पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तीनों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकता है।
SAEL का कहना है कि इस वार्षिक Biomass Procurement Campaign के माध्यम से कृषि अवशेषों को उपयोगी संसाधन में बदला जाएगा। इससे किसानों को फसल अवशेषों के निपटान का एक वैकल्पिक रास्ता मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में पराली संग्रह, परिवहन तथा प्रसंस्करण से जुड़े रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
20 लाख टन पराली से तैयार होगी नवीकरणीय ऊर्जा
SAEL Industries ने अपने 11 Agri Waste-to-Energy (AgWTE) Plants के संचालन के लिए लगभग 20 लाख टन धान की पराली खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। कंपनी के अनुसार, यह खरीद फसल कटाई के सीजन के दौरान चरणबद्ध तरीके से की जाएगी, ताकि ऊर्जा संयंत्रों के लिए आवश्यक Biomass Fuel की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
धान की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में पराली बच जाती है। अगली फसल, विशेष रूप से गेहूं की बुवाई के लिए किसानों के पास सीमित समय होता है। ऐसे में कई किसान खेतों को जल्दी खाली करने के लिए पराली जलाने का रास्ता अपनाते हैं। हालांकि, इससे मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
SAEL का मॉडल इस समस्या का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। इसके तहत खेतों से धान की पराली एकत्रित कर उसे ऊर्जा संयंत्रों तक पहुंचाया जाएगा। वहां इस Biomass का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा।
कंपनी के 11 Agri Waste-to-Energy Plants की कुल क्षमता 164.9 MW है। इन संयंत्रों के लिए कृषि अवशेषों की नियमित आपूर्ति जरूरी है। इसलिए कंपनी की यह खरीद केवल एक मौसमी गतिविधि नहीं, बल्कि उसके Renewable Energy Business की महत्वपूर्ण परिचालन व्यवस्था का हिस्सा है।
पराली जलाने के बजाय ऊर्जा उत्पादन में होगा इस्तेमाल
भारत में Paddy Stubble Burning लंबे समय से कृषि और पर्यावरण से जुड़ी बड़ी चुनौतियों में शामिल रही है। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच कम समय होने के कारण किसान अक्सर फसल अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं। इससे निकलने वाला धुआं आसपास के क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर और अन्य प्रदूषक तत्व वातावरण में पहुंचते हैं। इसके अलावा आग के कारण मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीवों और जैविक पदार्थों को भी नुकसान पहुंच सकता है। इससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और स्वास्थ्य प्रभावित होने की आशंका रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, Crop Residue Management के लिए केवल किसानों को पराली नहीं जलाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए खेतों से फसल अवशेषों को हटाने, उनका संग्रह करने, परिवहन करने और औद्योगिक उपयोग सुनिश्चित करने की मजबूत व्यवस्था जरूरी है।
यही वजह है कि Biomass Power Generation, बायोमास पेलेट्स, ब्रिकेट्स और अन्य औद्योगिक उपयोगों को पराली प्रबंधन के महत्वपूर्ण विकल्पों के रूप में देखा जा रहा है।
SAEL की पहल इसी दिशा में एक व्यावसायिक मॉडल तैयार करने का प्रयास है, जिसमें कृषि अवशेषों को बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी कच्चे माल में बदला जा सके।
सरकार भी पराली प्रबंधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर दे रही जोर
उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कंपनी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में Commission for Air Quality Management (CAQM) ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के एनसीआर से जुड़े जिलों को धान की पराली जलाने की घटनाओं को पूरी तरह समाप्त करने के उद्देश्य से कार्ययोजनाएं लागू करने के निर्देश दिए हैं।
इन कार्ययोजनाओं में खेत स्तर पर निगरानी, फसल अवशेष प्रबंधन मशीनरी की उपलब्धता और पराली के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
सरकारी रणनीति में Ex-situ Crop Residue Management को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। इसके तहत पराली को खेत से बाहर निकालकर Biomass Power Plants, Pellet Manufacturing Units, Briquette Production और अन्य औद्योगिक गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह व्यवस्था किसानों को पराली प्रबंधन के लिए एक व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध करा सकती है। साथ ही कृषि अवशेषों को औद्योगिक कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने से ग्रामीण क्षेत्रों में नई आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
कंपनी के अनुसार, भारत सरकार के आंकड़ों में खेतों में आग लगाने की घटनाओं में कमी के संकेत मिले हैं। हालांकि, इस सुधार को बनाए रखने के लिए किसानों को समय पर और आसानी से उपलब्ध होने वाले विकल्प प्रदान करना जरूरी है।
किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती 15 से 18 दिनों का समय
धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच का समय किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। Council on Energy, Environment and Water (CEEW) के एक हालिया अध्ययन का हवाला देते हुए कंपनी ने बताया कि सर्वेक्षण में शामिल करीब 90 प्रतिशत किसान व्यक्तिगत रूप से पराली जलाने को सही नहीं मानते।
इसके बावजूद खेतों में पराली जलाने की घटनाएं होती हैं। इसका एक बड़ा कारण जागरूकता की कमी के बजाय व्यावहारिक समस्याएं हैं। इनमें कृषि मशीनरी की अनुपलब्धता, मजदूरों की कमी, अतिरिक्त खर्च, सही जानकारी का अभाव और समय पर पराली उठाने की व्यवस्था नहीं होना शामिल है।
विशेष रूप से धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के लिए किसानों के पास लगभग 15 से 18 दिनों का समय होता है। इस सीमित अवधि में खेत को अगली फसल के लिए तैयार करना किसानों की प्राथमिकता होती है।
अगर इस दौरान पराली का संग्रह और परिवहन सुनिश्चित नहीं हो पाता, तो किसानों के सामने खेत खाली करने की चुनौती पैदा हो जाती है। ऐसे में पराली जलाने के बजाय उसका संग्रह करने के लिए एक मजबूत Supply Chain का होना जरूरी है।
किसानों को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां उनकी पराली समय पर खेत से उठाई जाए और उन्हें इसके बदले उचित आर्थिक लाभ भी मिल सके।
SAEL इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर पराली संग्रह और खरीद की व्यवस्था विकसित कर रही है।
स्थानीय एग्रीगेटर्स के माध्यम से किसानों तक पहुंचेगी खरीद व्यवस्था
SAEL का Biomass Procurement Model किसानों, स्थानीय एग्रीगेटर्स और संग्रह टीमों को एक साथ जोड़ने पर आधारित है। इसके तहत स्थानीय स्तर पर किसानों से धान की पराली एकत्रित की जाएगी और फिर उसे कंपनी के ऊर्जा संयंत्रों तक पहुंचाया जाएगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों के लिए पराली प्रबंधन की प्रक्रिया को आसान बनाना है। आमतौर पर पराली को खेत से बाहर निकालने में मशीनरी, श्रम और परिवहन पर अतिरिक्त खर्च आता है। इसके अलावा, किसानों को यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि निर्धारित समय के भीतर खेत अगली फसल के लिए तैयार हो जाए।
स्थानीय Collection Teams और Aggregators की भागीदारी से पराली एकत्र करने तथा उसे संयंत्रों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है।
इस मॉडल के कई संभावित लाभ हैं।
पहला, किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर: पराली को बेकार समझकर जलाने के बजाय उसकी बिक्री के माध्यम से किसान अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं। इससे कृषि अवशेष भी आर्थिक संसाधन बन सकते हैं।
दूसरा, खेतों से पराली हटाने में मदद: समय पर संग्रह और खरीद की व्यवस्था किसानों को फसल अवशेषों के निपटान का वैकल्पिक माध्यम उपलब्ध करा सकती है।
तीसरा, ग्रामीण रोजगार का सृजन: पराली की कटाई, बेलिंग, संग्रह, लोडिंग, परिवहन और प्रोसेसिंग से जुड़ी गतिविधियों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सकता है।
चौथा, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन: कृषि अवशेषों को Biomass Fuel के रूप में इस्तेमाल करके बिजली उत्पादन में योगदान दिया जा सकता है।
हालांकि, इस मॉडल की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों को पराली के बदले कितना लाभ मिलता है, संग्रह व्यवस्था कितनी समयबद्ध रहती है और खरीद केंद्र खेतों के कितने नजदीक उपलब्ध होते हैं।
SAEL के CEO ने क्या कहा?
SAEL Industries Limited के CEO और Executive Director लक्षित आवला (Laxit Awla) ने इस पहल पर कहा कि भारत अब धान की पराली और अन्य कृषि अवशेषों को केवल मौसमी Waste Management की समस्या के रूप में देखने से आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि कंपनी किसान समुदायों को पराली प्रबंधन के बेहतर तरीके अपनाने और कृषि अवशेषों के वास्तविक आर्थिक मूल्य को समझने में सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है।
उनके अनुसार, पंजाब, राजस्थान और हरियाणा में स्थित SAEL के Agri Waste-to-Energy Plants स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे रहे हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से कृषि अवशेषों से आय के नए स्रोत विकसित करने, ईंधन लागत को कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी बताया कि पराली संग्रह, प्रसंस्करण और ऊर्जा संयंत्रों के संचालन से जुड़े कार्यों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
कंपनी का मानना है कि कृषि अवशेषों को ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने से पर्यावरणीय लाभ के साथ-साथ ग्रामीण समुदायों के लिए आर्थिक अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं।
बायोमास आधारित ऊर्जा से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
भारत में Renewable Energy की मांग लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के साथ Biomass Energy भी स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के विभिन्न विकल्पों में शामिल है।
बायोमास ऊर्जा उत्पादन में कृषि अवशेष, फसल के डंठल, भूसा, लकड़ी के अवशेष और अन्य जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में धान, गेहूं, गन्ना और अन्य फसलों से बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष उत्पन्न होते हैं।
यदि इन अवशेषों का वैज्ञानिक और व्यावसायिक तरीके से उपयोग किया जाए, तो इससे ऊर्जा उत्पादन के साथ Waste-to-Wealth की अवधारणा को भी बढ़ावा मिल सकता है।
SAEL का मॉडल इसी विचार पर आधारित है। कंपनी किसानों से पराली खरीदकर उसे अपने ऊर्जा संयंत्रों के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है।
इससे कृषि अवशेषों की मांग विकसित हो सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों में एक नई Biomass Supply Chain तैयार हो सकती है। इस Supply Chain में स्थानीय उद्यमियों, परिवहनकर्ताओं, मशीनरी संचालकों और कृषि श्रमिकों के लिए भी काम के अवसर बन सकते हैं।
हालांकि, बायोमास आधारित ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नियमित कच्चे माल की आपूर्ति, संग्रहण की लागत, परिवहन दूरी और ईंधन की गुणवत्ता जैसे पहलुओं का प्रभावी प्रबंधन भी आवश्यक है।
SAEL का Renewable Energy Business और विस्तार
SAEL Industries Limited एक Integrated Renewable Energy Company है, जो Utility-connected Solar Power, Solar Module Manufacturing और Agri Waste-to-Energy जैसे क्षेत्रों में काम करती है।
कंपनी की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक SAEL के पास भारत में Solar Independent Power Producer (IPP) और Battery Energy Storage System (BESS) से जुड़ी कुल 8,299.51 MWp की Contracted and Awarded Capacity थी।
इसके अलावा कंपनी की Solar Module Assembly Capacity 3,625 MW और Agri Waste-to-Energy Capacity 164.9 MW बताई गई है।
कंपनी उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में 5 GW Solar Cell और 5 GW Solar Module Manufacturing Facility स्थापित करने की दिशा में भी काम कर रही है।
SAEL का कारोबार सौर ऊर्जा उत्पादन से लेकर सोलर मॉड्यूल निर्माण और कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन तक फैला हुआ है। इस तरह कंपनी भारत के Clean Energy Transition में अपनी भूमिका मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
पराली से कमाई और प्रदूषण नियंत्रण, दोनों के लिए जरूरी है मजबूत व्यवस्था
भारत में पराली प्रबंधन की चुनौती का स्थायी समाधान केवल प्रशासनिक निगरानी और जुर्माने तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें किसान को पराली नहीं जलाने का आर्थिक और व्यावहारिक विकल्प मिले।
SAEL द्वारा करीब 20 लाख टन धान की पराली खरीदने की पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रयास है। इससे कृषि अवशेषों को ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने और ग्रामीण क्षेत्रों में Biomass आधारित आर्थिक गतिविधियां विकसित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
हालांकि, पराली जलाने की समस्या का व्यापक समाधान तभी संभव है, जब ऊर्जा कंपनियों, राज्य सरकारों, कृषि विभागों, किसानों और स्थानीय उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो।
किसानों को समय पर मशीनरी, उचित खरीद मूल्य, पारदर्शी भुगतान और खेत से पराली उठाने की भरोसेमंद सुविधा मिलना जरूरी है। वहीं, ऊर्जा कंपनियों को भी अपने संयंत्रों के लिए नियमित Biomass Supply सुनिश्चित करनी होगी।
कुल मिलाकर, SAEL की यह पहल कृषि अवशेषों को Waste से Wealth में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि इस तरह के मॉडल को बड़े स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे किसानों की अतिरिक्त आय, ग्रामीण रोजगार, कृषि अवशेषों का बेहतर उपयोग और उत्तर भारत में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है।
