Maize Top 5 Varieties: भारत में मक्का की खेती अब केवल अनाज उत्पादन तक सीमित नहीं रही है। पशु आहार, पोल्ट्री फीड, स्टार्च उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण और एथेनॉल उत्पादन जैसे क्षेत्रों में भी मक्का की महत्वपूर्ण भूमिका है। यही वजह है कि किसान अब ऐसी उन्नत किस्मों की तलाश कर रहे हैं, जिनसे अच्छी उपज के साथ बाजार की जरूरतों के अनुसार बेहतर कीमत मिलने की संभावना हो।
मक्का की खेती में किसान अक्सर बीज की कीमत, फसल तैयार होने की अवधि और संभावित पैदावार देखकर किस्म चुनते हैं। लेकिन हर किस्म हर इलाके के लिए उपयुक्त नहीं होती। किसी क्षेत्र में अधिक उत्पादन देने वाली किस्म दूसरी जगह मिट्टी, तापमान या वर्षा की परिस्थितियों के कारण उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकती।
Maize Top 5 Varieties की इस जानकारी में हम पांच ऐसी उन्नत संकर किस्मों के बारे में बता रहे हैं, जिनकी विशेषताओं का विवरण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने प्रकाशित किया है। इनमें अधिक अनाज उत्पादन, पोषण गुणवत्ता और स्वीट कॉर्न बाजार के लिए विकसित किस्में शामिल हैं।
2026 में मक्का की खेती को लेकर क्या है नया अपडेट?
मक्का अनुसंधान में वर्ष 2026 के दौरान भी महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली है। 12 जनवरी 2026 को ICAR ने जानकारी दी कि विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा विकसित दो मक्का संकर, वी एल मधुबाला और वी एल लोफाई, अधिसूचित किए गए हैं। इनमें एक स्वीट कॉर्न उत्पादन के लिए विकसित किया गया है, जबकि दूसरी कम फाइटेट वाली पोषण-संवर्धित किस्म है।
इसके अलावा ICAR-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना ने अपने विकसित संकर बीजों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए विभिन्न राज्यों में बीज उत्पादन और वितरण से जुड़े प्रयासों की जानकारी दी है। इनमें DMRH 1308 और LQMH 1 जैसे संकर भी शामिल हैं। इसका उद्देश्य किसानों तक गुणवत्ता वाले बीज की पहुंच बेहतर बनाना है।
हालांकि किसी भी किस्म को पूरे भारत की सबसे अच्छी किस्म कहना सही नहीं होगा। नीचे चुनी गई पांच किस्में अलग-अलग कृषि परिस्थितियों और उत्पादन उद्देश्यों के आधार पर उपयोगी विकल्प हैं।
मक्का की टॉप 5 उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं
1. DMRH 1308
अधिक अनाज उत्पादन के उद्देश्य से विकसित संकर। ICAR ने इसकी उपज क्षमता 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई है। उपयोग: अनाज उत्पादन
2. LQMH 1
Quality Protein Maize श्रेणी का संकर, जिसमें पोषण गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया है। उपयोग: पोषण-संबंधी गुणवत्ता वाला मक्का
3. Pusa Vivek QPM 9 Improved
प्रोविटामिन-A से भरपूर संकर। लगभग 83 से 93 दिनों में तैयार होने वाला विकल्प। उपयोग: पोषण-संवर्धित अनाज
वर्ष 2026 में अधिसूचित स्वीट कॉर्न संकर। लगभग 72 से 75 दिनों में हरे भुट्टों की तुड़ाई। उपयोग: ताजा स्वीट कॉर्न बाजार
वर्ष 2026 में अधिसूचित कम फाइटेट वाली संकर किस्म, जिसकी पकने की अवधि लगभग 90 से 95 दिन है। उपयोग: पोषण गुणवत्ता वाला अनाज, विशेषकर उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र
1. DMRH 1308: अधिक उपज की संभावना वाली मक्का की उन्नत किस्म
DMRH 1308 भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित महत्वपूर्ण संकर किस्मों में शामिल है। इसे अधिक अनाज उत्पादन और विभिन्न कृषि परिस्थितियों में अनुकूलन की क्षमता के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
ICAR की प्रकाशित जानकारी के अनुसार इस संकर की अनाज उपज क्षमता 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, यानी लगभग 40.5 क्विंटल प्रति एकड़ तक बताई गई है। यह अनुसंधान में दर्ज क्षमता है, हर खेत में मिलने वाली निश्चित पैदावार नहीं। वास्तविक उत्पादन मिट्टी की उर्वरता, मौसम, पोषक तत्वों के प्रबंधन और सिंचाई पर निर्भर करेगा।
DMRH 1308 उन किसानों के लिए विचार करने योग्य विकल्प है जो व्यावसायिक स्तर पर दाने वाला मक्का उगाना चाहते हैं। विशेष रूप से जहां सिंचाई, जल निकासी और फसल प्रबंधन की उचित व्यवस्था है, वहां इसकी उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
इसकी खेती से पहले किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से यह जरूर पता करें कि उनके क्षेत्र और बुवाई के मौसम के लिए इस संकर की अनुशंसा है या नहीं।
2. LQMH 1: बेहतर प्रोटीन गुणवत्ता वाला मक्का
LQMH 1 एक Quality Protein Maize (QPM) संकर है। सामान्य मक्का की तुलना में QPM श्रेणी में प्रोटीन की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान दिया जाता है, विशेष रूप से लाइसिन और ट्रिप्टोफैन जैसे आवश्यक अमीनो अम्लों के संदर्भ में। ICAR-IIMR ने LQMH 1 को अपने विकसित और वितरित किए जा रहे संकरों में शामिल किया है। हिमाचल प्रदेश के चंबा क्षेत्र में किए गए कृषि हस्तक्षेपों में भी इस संकर का उपयोग हुआ है। वहां बेहतर बीज, प्रशिक्षण और यंत्रीकरण सहित कई उपायों से किसानों के उत्पादन में सुधार दर्ज किया गया।
इस किस्म की खास बात यह है कि किसानों को केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि अनाज की पोषण गुणवत्ता के बारे में भी सोचने का अवसर मिलता है। हालांकि QPM मक्का की खेती करने से अपने आप अधिक बाजार भाव मिलने की गारंटी नहीं होती। यदि किसान इसे विशेष पोषण उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण या निर्धारित खरीदार के लिए उगा रहे हैं तो पहले खरीद की शर्तें और गुणवत्ता मानक समझना जरूरी है।
3. Pusa Vivek QPM 9 Improved: पोषण से भरपूर मक्का की किस्म
पूसा विवेक QPM 9 इम्प्रूव्ड पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण मक्का संकर है। इसे विशेष रूप से प्रोविटामिन-A की मात्रा बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। ICAR के अनुसार इस किस्म में प्रोविटामिन-A की मात्रा लगभग 8.15 पीपीएम दर्ज की गई है। इसके प्रोटीन में लाइसिन की मात्रा 2.67 प्रतिशत और ट्रिप्टोफैन की मात्रा 0.74 प्रतिशत बताई गई है।
इसकी औसत अनाज उपज उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र में लगभग 55.9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और प्रायद्वीपीय क्षेत्र में 59.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। फसल तैयार होने में क्षेत्र के अनुसार लगभग 83 से 93 दिन लगते हैं।
इस किस्म की अनुशंसा सिंचित खरीफ परिस्थितियों के लिए जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों, पूर्वोत्तर राज्यों तथा महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में की गई है। जो किसान पोषण-संवर्धित मक्का की खेती करना चाहते हैं, उनके लिए यह उपयोगी विकल्प हो सकता है। हालांकि व्यावसायिक खेती करने से पहले स्थानीय बीज उपलब्धता और बाजार मांग की जानकारी लेना जरूरी है।
4. VL Madhubala: स्वीट कॉर्न की खेती के लिए नई उन्नत किस्म
वी एल मधुबाला (VL Madhubala) वर्ष 2026 में अधिसूचित हुई स्वीट कॉर्न की एक महत्वपूर्ण संकर किस्म है। इसे ICAR-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा ने विकसित किया है।
इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी मिठास और कम समय में हरे भुट्टों की तुड़ाई के लिए तैयार होना है। संस्थान के अनुसार, वी एल मधुबाला में हरे भुट्टों की तुड़ाई 72 से 75 दिनों में की जा सकती है। अखिल भारतीय परीक्षणों में इस किस्म के छिले हुए हरे भुट्टों का औसत उत्पादन उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र में 114.38 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में 114.54 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया। इसमें कुल घुलनशील ठोस पदार्थों की मात्रा लगभग 15.7 प्रतिशत पाई गई है, जो इसकी मिठास से संबंधित एक महत्वपूर्ण गुणवत्ता संकेतक है। किस्म ने टर्किकम पर्ण झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोध भी दिखाया है।
किन राज्यों के किसानों को फायदा मिल सकता है?
वी एल मधुबाला को पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तरी पर्वतीय और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के लिए अधिसूचित किया गया है।यह किस्म उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है जिनके आसपास शहर, सब्जी मंडी, होटल, स्वीट कॉर्न विक्रेता या खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े खरीदार मौजूद हैं। किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि स्वीट कॉर्न की बिक्री और सामान्य सूखे मक्का दानों की बिक्री अलग होती है। स्वीट कॉर्न के भुट्टों की गुणवत्ता और मिठास बनाए रखने के लिए समय पर तुड़ाई और तेजी से विपणन महत्वपूर्ण है।
5. VL Lofai: पोषण-संवर्धित मक्का की नई किस्म
वी एल लोफाई (VL Lofai) को भी वर्ष 2026 में अधिसूचित किया गया है। इसकी विशेषता कम फाइटेट सामग्री है। फाइटेट अनाज में पाया जाने वाला एक प्राकृतिक यौगिक है, जो कुछ खनिज तत्वों के अवशोषण को प्रभावित कर सकता है। कम फाइटेट वाली किस्मों का विकास मक्का के पोषण मूल्य को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है। ICAR के अनुसार, वी एल लोफाई में फाइटेट की मात्रा लगभग 2.16 मिलीग्राम प्रति ग्राम दर्ज की गई है, जबकि सामान्य मक्का में यह औसतन लगभग 3 मिलीग्राम प्रति ग्राम बताई गई है। इस संकर की पकने की अवधि लगभग 90 से 95 दिन है। उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र के अखिल भारतीय परीक्षणों में इसकी औसत अनाज उपज 60.46 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इसने टर्किकम पर्ण झुलसा के प्रति मध्यम प्रतिरोध दिखाया है।
वी एल लोफाई विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर राज्यों के किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। यहां यह समझना जरूरी है कि पोषण गुणवत्ता अधिक होने का अर्थ हमेशा बाजार मूल्य अधिक होना नहीं है। किसान यदि इस किस्म को व्यावसायिक खेती के लिए चुन रहे हैं तो उन्हें स्थानीय मांग और खरीदारों की जानकारी पहले जुटानी चाहिए।
Maize Top 5 Varieties: एक नजर में पांचों किस्मों की तुलना
| मक्का की किस्म | उत्पादन या अवधि | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| DMRH 1308 | 100 क्विंटल/हेक्टेयर तक की प्रकाशित उपज क्षमता | अधिक अनाज उत्पादन |
| LQMH 1 | स्थानीय अनुशंसा के अनुसार | बेहतर प्रोटीन गुणवत्ता |
| Pusa Vivek QPM 9 Improved | 83–93 दिन | प्रोविटामिन-A से भरपूर |
| VL Madhubala | 72–75 दिन में हरे भुट्टों की तुड़ाई | मीठे भुट्टे |
| VL Lofai | 90–95 दिन | कम फाइटेट वाला मक्का |
नोट: तालिका में उपज और अवधि की जानकारी अलग-अलग आधिकारिक परीक्षणों पर आधारित है। ये आंकड़े सभी राज्यों, मौसमों और खेतों में समान उत्पादन की गारंटी नहीं देते।
मक्का की खेती में अच्छी पैदावार के लिए अपनाएं ये जरूरी तरीके
सही समय पर बुवाई करें: खरीफ मक्का की बुवाई सामान्यतः मानसून की शुरुआत के आसपास की जाती है। हालांकि उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पर्वतीय क्षेत्रों में बुवाई का उचित समय अलग हो सकता है। रबी और वसंतकालीन मक्का का कैलेंडर भी अलग होता है।
बीज की मात्रा और दूरी पर ध्यान दें: मक्का की अधिक पैदावार के लिए पौधों की उचित संख्या जरूरी है। उदाहरण के लिए 60 से 75 सेंटीमीटर कतार दूरी और 20 से 25 सेंटीमीटर पौध दूरी कुछ उत्पादन प्रणालियों में उपयोग की जाती है। लेकिन वास्तविक दूरी किस्म, मौसम और स्थानीय अनुशंसा के अनुसार तय करनी चाहिए। मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद दें: केवल यूरिया की मात्रा बढ़ाने से अच्छी पैदावार सुनिश्चित नहीं होती। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर और जिंक जैसे पोषक तत्वों का संतुलन जरूरी है। किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद की मात्रा तय करें। खेत में पानी जमा न होने दें: मक्का की फसल जलभराव के प्रति संवेदनशील होती है। विशेष रूप से भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में खेत की जल निकासी की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए।
कीटों की निगरानी करें: मक्का में फॉल आर्मीवर्म जैसे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। किसान नियमित रूप से पौधों की ऊपरी पत्तियों और नई बढ़वार की जांच करें। कीट मिलने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उपयुक्त एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाएं। कटाई और भंडारण सही करें: दाने वाले मक्का को उचित परिपक्वता पर काटें। भंडारण से पहले दानों को अच्छी तरह सुखाना जरूरी है। ICAR के प्रकाशित कृषि मार्गदर्शन में सुरक्षित भंडारण के लिए लगभग 12 से 14 प्रतिशत नमी का उल्लेख है।
मक्का की खेती में सबसे ज्यादा फायदा किस किस्म से मिल सकता है?
इस सवाल का जवाब केवल उपज देखकर नहीं दिया जा सकता। यदि किसान दाना उत्पादन करके मंडी या फीड उद्योग में बेचने की योजना बना रहा है तो DMRH 1308 जैसी किस्म का स्थानीय प्रदर्शन देखना उपयोगी रहेगा।
यदि किसान के पास शहरी बाजार तक पहुंच है तो VL Madhubala जैसी स्वीट कॉर्न किस्म एक विकल्प हो सकती है। लेकिन इस खेती में बाजार और समय पर बिक्री की व्यवस्था पहले से होना जरूरी है। वहीं पोषण गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले किसान Pusa Vivek QPM 9 Improved, LQMH 1 या VL Lofai जैसी किस्मों के बारे में जानकारी ले सकते हैं। बीज खरीदने से पहले प्रमाणित विक्रेता, पैकेट पर लिखी किस्म की पहचान, अंकुरण संबंधी विवरण, उपयुक्त क्षेत्र और मौसम की जांच जरूर करें। संकर बीज की अगली पीढ़ी से समान उत्पादन की उम्मीद करना सही नहीं है, इसलिए नई फसल के लिए अधिकृत स्रोत से उचित बीज खरीदना बेहतर रहता है।
मक्का की उन्नत किस्मों से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1. मक्का की सबसे अधिक उपज देने वाली किस्म कौन-सी है?
DMRH 1308 की उपज क्षमता ICAR ने 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई है। हालांकि इसे भारत की सभी मक्का किस्मों में सबसे अधिक उपज देने वाली किस्म कहना सही नहीं होगा।
प्रश्न 2. जल्दी तैयार होने वाली स्वीट कॉर्न की किस्म कौन-सी है?
VL Madhubala में लगभग 72 से 75 दिनों में हरे भुट्टों की तुड़ाई की जा सकती है। यह सामान्य सूखे अनाज की कटाई अवधि नहीं है।
प्रश्न 3. पोषण के लिए कौन-सी मक्का किस्म अच्छी है?
Pusa Vivek QPM 9 Improved प्रोविटामिन-A से भरपूर है। इसके अलावा LQMH 1 बेहतर प्रोटीन गुणवत्ता वाला तथा VL Lofai कम फाइटेट वाला मक्का संकर है।
प्रश्न 4. क्या सभी उन्नत किस्में उत्तर प्रदेश और बिहार में उगाई जा सकती हैं?
नहीं। प्रत्येक किस्म के लिए उपयुक्त कृषि क्षेत्र अलग हो सकता है। VL Madhubala को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अधिसूचित किया गया है, लेकिन दूसरी किस्मों की उपयुक्तता स्थानीय कृषि अनुशंसा से जांचनी चाहिए।
प्रश्न 5. क्या महंगे हाइब्रिड बीज से हमेशा ज्यादा उत्पादन मिलता है?
नहीं। अच्छी पैदावार के लिए बीज की गुणवत्ता के साथ उचित मिट्टी, मौसम, सिंचाई, पोषण और फसल प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हैं।
Maize Top 5 Varieties की जानकारी से साफ है कि मक्का की उन्नत खेती में अब केवल अधिक अनाज उत्पादन ही एकमात्र लक्ष्य नहीं रह गया है। किसानों के सामने पोषण-संवर्धित मक्का, स्वीट कॉर्न और अधिक उपज क्षमता वाले संकरों के अलग-अलग विकल्प उपलब्ध हैं। वर्ष 2026 में VL Madhubala और VL Lofai जैसी किस्मों की अधिसूचना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकास है। किसानों को सलाह है कि वे किसी भी नई किस्म को बड़े क्षेत्र में अपनाने से पहले उसकी स्थानीय उपयुक्तता, बाजार मांग, बीज उपलब्धता और खेती की लागत का आकलन करें। सही किस्म, सही मौसम और सही बाजार का चुनाव ही मक्का की खेती को अधिक लाभकारी बनाने की मजबूत शुरुआत है।
