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Home कृषि समाचार

UP Sugarcane Farmers के लिए बड़ी खुशखबरी: 4 नई Sugarcane Varieties से बढ़ेगी Yield और Sugar Recovery

Great news for UP sugarcane farmers: 4 new sugarcane varieties to boost yield and sugar recovery.

Fiza by Fiza
October 3, 2026
in कृषि समाचार
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UP Sugarcane Farmers

UP Sugarcane Farmers

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UP Sugarcane Farmers: उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए नई किस्मों का इंतजार अब खत्म हो गया है। प्रदेश में खेती के लिए गन्ने की चार नई किस्मों को मंजूरी मिली है। इन किस्मों से किसानों को केवल अधिक उत्पादन मिलने की उम्मीद नहीं है, बल्कि बेहतर Sugar Recovery, अच्छी पेड़ी क्षमता और प्रमुख रोगों से बचाव में भी मदद मिल सकती है।

नई स्वीकृत किस्मों में को.शा.23232 (Co.Sha. 23232), को.लख.21201 (Co.Lk. 21201), को.शा.19235 (Co.Sha. 19235) और को.शा.18232 (Co.Sha. 18232) शामिल हैं। इनमें अलग-अलग पकने की अवधि वाली किस्में हैं, जिससे किसान अपने क्षेत्र, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता और चीनी मिल के पेराई कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए किस्म का चुनाव कर सकेंगे।

उत्तर प्रदेश देश के सबसे महत्वपूर्ण गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल है। बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों की आय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से Sugarcane Farming से जुड़ी हुई है। ऐसे में कोई भी नई किस्म, जो प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाने के साथ बेहतर चीनी परता दे सके, किसानों और चीनी उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

29 सितंबर की बैठक में चार नई किस्मों को मिली मंजूरी

उत्तर प्रदेश में नई गन्ना किस्मों को स्वीकृति देने के लिए 29 सितंबर 2026 को बीज गन्ना एवं गन्ना किस्म स्वीकृति उप समिति की बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता गन्ना एवं चीनी आयुक्त ने की। इसमें नई किस्मों की उपज, चीनी की मात्रा, पेड़ी प्रदर्शन और रोग प्रतिरोध जैसी विशेषताओं के परीक्षण परिणामों पर विचार किया गया।

बैठक के बाद उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर द्वारा विकसित तीन किस्मों और भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ द्वारा विकसित एक किस्म को प्रदेश में खेती के लिए मंजूरी दी गई।

नई किस्मों को किसानों तक पहुंचाना इसलिए भी जरूरी माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय तक किसी एक लोकप्रिय किस्म पर अधिक निर्भरता खेती के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। किसी क्षेत्र में एक ही किस्म बड़े पैमाने पर बोई जाए और वह किसी बीमारी के प्रति संवेदनशील हो जाए तो रोग तेजी से फैल सकता है। इसलिए Varietal Diversification यानी अलग-अलग उन्नत किस्मों को खेतों में स्थान देना गन्ने की खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

1. को.शा.23232: अधिक उत्पादन वाली अगेती किस्म

चार नई किस्मों में को.शा.23232 किसानों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बन सकती है। इसे अगेती श्रेणी में रखा गया है। परीक्षणों में इस किस्म की औसत उपज लगभग 95.56 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। तुलना के लिए इस्तेमाल की गई मानक किस्म को.0238 के मुकाबले इसका उत्पादन लगभग 9.44 प्रतिशत अधिक बताया गया है।

अच्छी उपज के साथ इस किस्म का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष चीनी से जुड़ा है। परीक्षण के अलग-अलग चरणों में इसके Pol Percentage in Cane के आंकड़े भी उत्साहजनक रहे। नवंबर, जनवरी और मार्च में इसके पोल प्रतिशत केन क्रमशः करीब 13.10, 13.77 और 14.31 दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार ये आंकड़े संबंधित अवधि में मानक किस्म को.0238 से कुछ बेहतर रहे। सरल भाषा में समझें तो गन्ने में चीनी की मात्रा जितनी बेहतर होगी, उतना ही चीनी मिलों को उससे अधिक उपयोगी उत्पादन मिलने की संभावना रहती है।

पेड़ी फसल में भी अच्छा प्रदर्शन

गन्ने में केवल पहली फसल की उपज देखना पर्याप्त नहीं होता। किसान के लिए Ratoon Crop, यानी पेड़ी फसल का प्रदर्शन भी बहुत मायने रखता है। गन्ने की कटाई के बाद जड़ों से दोबारा निकलने वाली फसल को पेड़ी कहा जाता है। इसमें दोबारा खेत तैयार करने और नया बीज लगाने की आवश्यकता कम होती है। इससे किसानों की लागत घट सकती है।

को.शा.23232 की पेड़ी उपज लगभग 80.57 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। यह मानक किस्म को.0238 की तुलना में करीब 3.16 प्रतिशत अधिक बताई गई है। इसके अलावा इस किस्म में Red Rot Resistance यानी लाल सड़न रोग के प्रति प्रतिरोध की विशेषता भी बताई गई है। यदि ये गुण किसानों के खेतों में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थिर रहते हैं तो यह किस्म अगेती गन्ने के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।

2. को.लख.21201: बेहतर चीनी परता पर रहेगा ध्यान

नई स्वीकृत किस्मों में को.लख.21201 भी अगेती श्रेणी की किस्म है। इसे भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ ने विकसित किया है। इसकी औसत उपज करीब 86.57 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। उत्पादन के मामले में इसका प्रदर्शन लोकप्रिय मानक किस्म को.0238 के आसपास पाया गया, लेकिन इसकी महत्वपूर्ण विशेषता गन्ने में दर्ज बेहतर पोल प्रतिशत है। को.लख.21201 में Pol in Cane लगभग 13.94 प्रतिशत दर्ज हुआ, जबकि तुलना वाली को.0238 में यह करीब 13.71 प्रतिशत था। इस किस्म को पूरे उत्तर प्रदेश में खेती के लिए अनुमोदित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इसमें लाल सड़न रोग के प्रति उच्च प्रतिरोधक क्षमता और अच्छी पेड़ी क्षमता भी देखी गई है। यह विशेषता उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है जो केवल खेत से निकलने वाले कुल गन्ने को ही नहीं, बल्कि ऐसी किस्म को प्राथमिकता देना चाहते हैं जिसकी गुणवत्ता भी अच्छी हो।

3. को.शा.19235: मध्य और देर से पकने वाली उपयोगी किस्म

हर किसान अगेती गन्ना ही नहीं लगाता। चीनी मिलों को पूरे पेराई सत्र में नियमित रूप से गुणवत्तापूर्ण गन्ना मिलता रहे, इसके लिए अगेती के साथ Mid-Late Maturing Sugarcane Varieties की भी जरूरत होती है। इसी श्रेणी में को.शा.19235 को मंजूरी दी गई है।

परीक्षण में इस किस्म की औसत उपज करीब 87.58 टन प्रति हेक्टेयर रही। तुलना के लिए इस्तेमाल की गई को.शा.767 की औसत उपज लगभग 77.20 टन प्रति हेक्टेयर थी। इस आधार पर नई किस्म का प्रदर्शन लगभग 11.81 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया। इसके पोल प्रतिशत से जुड़े परिणाम भी बेहतर रहे। नवंबर, जनवरी और मार्च में को.शा.19235 का पोल प्रतिशत केन क्रमशः लगभग 11.89, 13.07 और 13.74 दर्ज किया गया।

पेड़ी में भी ज्यादा उपज

इस किस्म की पेड़ी की औसत उपज करीब 73.90 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। परीक्षण में यह मानक किस्म की तुलना में करीब 11.36 प्रतिशत अधिक रही। गन्ना किसानों के लिए यह बड़ा फायदा हो सकता है, क्योंकि अच्छी Ratooning Ability वाली किस्म खेत की समग्र लाभप्रदता को बेहतर करने में मदद करती है।

हालांकि किसानों को यह याद रखना चाहिए कि अनुसंधान केंद्र पर प्राप्त उत्पादन और किसी गांव के खेत में मिलने वाले वास्तविक उत्पादन में अंतर हो सकता है। मिट्टी, मौसम, सिंचाई, पोषण प्रबंधन, पौधों की संख्या और रोग नियंत्रण जैसे कई कारण अंतिम उपज को प्रभावित करते हैं।

4. को.शा.18232: उत्पादन के आंकड़ों में सबसे मजबूत प्रदर्शन

चार नई स्वीकृत किस्मों में को.शा.18232 ने उपज के मामले में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। यह भी मध्य एवं देर से पकने वाली श्रेणी की किस्म है।इसके परीक्षणों में औसत उपज लगभग 92.38 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। मानक किस्म को.शा.767 की तुलना में यह आंकड़ा करीब 26.51 प्रतिशत अधिक बताया गया है।इस अंतर के कारण किसानों के बीच इस किस्म को लेकर दिलचस्पी बढ़ सकती है।इसके पोल प्रतिशत केन के आंकड़े नवंबर में करीब 11.57, जनवरी में 12.87 और मार्च में 14.05 दर्ज किए गए।

पेड़ी में 82 टन प्रति हेक्टेयर से ज्यादा उत्पादन

को.शा.18232 ने पेड़ी फसल में भी अच्छा प्रदर्शन किया। इसकी औसत Ratoon Yield लगभग 82.06 टन प्रति हेक्टेयर रही। परीक्षण में यह मानक किस्म की तुलना में करीब 23.70 प्रतिशत अधिक थी।यदि किसी किसान के क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु इस किस्म के अनुकूल है तो अच्छी पेड़ी क्षमता उत्पादन लागत को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।

किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं नई गन्ना किस्में?

नई किस्मों की चर्चा केवल इसलिए नहीं हो रही कि इनके नाम नए हैं। असली महत्व उनकी उन विशेषताओं में है जो खेती की मौजूदा समस्याओं का समाधान देने में मदद कर सकती हैं।किसान के लिए एक अच्छी High Yielding Sugarcane Variety में कई गुण होने चाहिए। पौधे का अच्छा जमाव हो, फसल तेजी से बढ़े, डंठल की संख्या पर्याप्त हो, रोगों का असर कम हो, गिरने की समस्या सीमित हो, पेड़ी अच्छी आए और अंतिम समय तक गन्ने में पर्याप्त चीनी मौजूद रहे।इन चार नई किस्मों के परीक्षण परिणामों में उपज के साथ चीनी परता और पेड़ी प्रदर्शन पर भी ध्यान दिया गया है। यही कारण है कि इनका महत्व केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है।

Sugar Recovery क्या होती है?

गन्ना किसानों की बातचीत में Sugar Recovery शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। इसका अर्थ समझना जरूरी है।सरल रूप में, चीनी मिल में पेराई किए गए गन्ने से जितनी मात्रा में चीनी प्राप्त होती है, उससे संबंधित प्रतिशत को रिकवरी कहा जाता है। उदाहरण के लिए, समान मात्रा में गन्ना देने वाली दो किस्मों में यदि एक में सुक्रोज अधिक है तो उससे मिल को अधिक चीनी मिल सकती है।इसीलिए केवल खेत में अधिक वजन वाला गन्ना पैदा करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। गन्ने की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है।

प्रदेश स्तर पर बेहतर Sugar Content वाली किस्मों का क्षेत्रफल बढ़ने से चीनी उद्योग की औसत रिकवरी सुधारने में मदद मिल सकती है। हालांकि वास्तविक रिकवरी पर गन्ने की परिपक्वता, कटाई का समय, खेत से मिल तक पहुंचने में लगा समय, मौसम और मिल की तकनीकी क्षमता जैसे कई दूसरे कारण भी प्रभाव डालते हैं।

Red Rot Disease से बचाव क्यों जरूरी?

उत्तर भारत में गन्ने की खेती के लिए Red Rot, यानी लाल सड़न रोग, एक गंभीर समस्या माना जाता है। किसी संवेदनशील किस्म पर रोग का दबाव बढ़ने पर किसान को उत्पादन में नुकसान उठाना पड़ सकता है।इसी वजह से वैज्ञानिक समय-समय पर ऐसी नई किस्में विकसित करते हैं जिनमें प्रमुख बीमारियों के खिलाफ बेहतर प्रतिरोध या सहनशीलता हो।

नई स्वीकृत किस्मों में भी रोग प्रतिरोधी गुणों को महत्व दिया गया है। विशेष रूप से को.शा.23232 और को.लख.21201 के बारे में लाल सड़न रोग के प्रति बेहतर प्रतिरोध की जानकारी सामने आई है।

लेकिन केवल रोगरोधी किस्म लगा देने से रोग प्रबंधन का काम पूरा नहीं हो जाता। किसान को स्वस्थ Seed Cane का चयन, खेत की नियमित निगरानी और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार रोग प्रबंधन भी करना चाहिए।

एक ही किस्म पर निर्भरता से क्यों बचना चाहिए?

गन्ने की खेती में अक्सर ऐसा होता है कि कोई किस्म शानदार उत्पादन देने लगती है तो कुछ ही वर्षों में बहुत बड़े क्षेत्र में उसी किस्म की खेती होने लगती है।शुरुआत में इसका फायदा दिखाई देता है, लेकिन लंबे समय में Single Variety Dominance जोखिम पैदा कर सकती है। किसी नए रोग या पहले से मौजूद रोग के नए रूप का असर उस किस्म पर बढ़ा तो बहुत बड़े क्षेत्र में एक साथ नुकसान हो सकता है। इसीलिए कृषि वैज्ञानिक Variety Diversification की सलाह देते हैं।

नई किस्मों की मंजूरी से किसानों के पास विकल्प बढ़ेंगे। अगेती, मध्य और देर से पकने वाली किस्मों का संतुलित क्षेत्र रखने से किसान खेती का जोखिम भी बांट सकते हैं और चीनी मिलों को अलग-अलग अवधि में परिपक्व गन्ना उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

पुरानी किस्मों को भी धीरे-धीरे हटाने की तैयारी

नई किस्मों को शामिल करने के साथ उत्तर प्रदेश में कुछ पुरानी और बहुत कम क्षेत्र में बोई जाने वाली किस्मों को चरणबद्ध तरीके से हटाने का निर्णय भी लिया गया है।रिपोर्टों के मुताबिक अनुपयुक्त या बहुत कम क्षेत्रफल वाली कई पुरानी किस्मों को आने वाले समय में खेती की अनुशंसित सूची से बाहर किया जाएगा।यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि में नई किस्मों को शामिल करने के साथ कमजोर हो चुकी या कम उपयोगी किस्मों को बदलना भी जरूरी होता है। किसान को इसलिए हर साल स्थानीय गन्ना विभाग, गन्ना समिति या संबंधित शोध संस्थान की नवीनतम Recommended Sugarcane Variety List देखनी चाहिए।

क्या नई किस्म लगाने से अपने आप बढ़ जाएगी आमदनी?

नई किस्मों के अच्छे परीक्षण परिणाम उम्मीद जरूर बढ़ाते हैं, लेकिन सिर्फ बीज बदल देने से किसान की आमदनी अपने आप नहीं बढ़ती।उत्पादन कई चीजों के मेल से बनता है।सही किस्म के साथ स्वस्थ बीज, उचित बुवाई समय, खेत की तैयारी, सिंचाई, संतुलित पोषण, खरपतवार प्रबंधन, कीट और रोग नियंत्रण तथा समय पर कटाई जरूरी है।इसे आधुनिक खेती की भाषा में Integrated Crop Management कहा जा सकता है।

यदि किसान उच्च उत्पादन वाली किस्म तो लगा दे लेकिन बीज रोगग्रस्त हो, खेत में पौधों की संख्या कम हो जाए या सिंचाई समय पर न मिले, तो उस किस्म की आनुवंशिक उत्पादन क्षमता का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा।

किसानों को नई किस्म चुनते समय किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?

नई किस्म का नाम सुनकर पूरे खेत में तुरंत बदलाव करना सही रणनीति नहीं है।किसान को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि किस्म उसके क्षेत्र के लिए आधिकारिक रूप से अनुशंसित है या नहीं। इसके बाद मिट्टी, सिंचाई और स्थानीय रोगों की स्थिति देखी जानी चाहिए।अगेती किस्म चुनने वाले किसान को Early Maturing Variety की वास्तविक परिपक्वता और चीनी मिल के पेराई कार्यक्रम पर ध्यान देना चाहिए। वहीं मध्य या देर से पकने वाली किस्म के लिए कटाई की संभावित अवधि को समझना जरूरी है।

पहले वर्ष सीमित क्षेत्र में नई किस्म लगाकर उसके प्रदर्शन को देखना भी व्यावहारिक तरीका हो सकता है। इससे किसान अपने खेत की परिस्थितियों में जमाव, बढ़वार, रोग, सिंचाई जरूरत, गन्ने की मोटाई और वास्तविक उपज को समझ सकता है।

प्रमाणित और स्वस्थ बीज सबसे महत्वपूर्ण

नई गन्ना किस्म तभी अच्छा प्रदर्शन करेगी जब रोपाई के लिए इस्तेमाल किया गया बीज स्वस्थ हो।किसान को जहां संभव हो वहां अधिकृत स्रोत से Certified Seed Cane या स्वस्थ बीज सामग्री प्राप्त करनी चाहिए। सिर्फ यह सुनकर कि किसी दूसरे किसान के पास नई किस्म है, बिना उसकी शुद्धता और स्वास्थ्य की जानकारी के बीज ले लेना नुकसानदेह हो सकता है।नई किस्मों की मांग बढ़ने पर कई बार बाजार में गलत नाम से पुरानी किस्म भी बेची जा सकती है। इसलिए किस्म की पहचान और बीज स्रोत की विश्वसनीयता दोनों जरूरी हैं।गन्ना विभाग, शोध संस्थान, चीनी मिल और अधिकृत बीज नर्सरी इस मामले में बेहतर मार्गदर्शन दे सकते हैं।

पेड़ी फसल से कैसे जुड़ा है किसानों का फायदा?

गन्ने में Ratoon Management किसानों की लाभप्रदता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।जब पहली फसल काटने के बाद उसी जड़ से अगली फसल ली जाती है तो खेत की दोबारा पूरी तैयारी और नया बीज लगाने पर होने वाला खर्च काफी हद तक बच सकता है। इसी कारण अच्छी पेड़ी वाली किस्म किसान के लिए आकर्षक होती है।नई किस्मों में को.शा.23232, को.शा.19235 और को.शा.18232 ने परीक्षणों में अच्छी पेड़ी उपज दिखाई है।

हालांकि पेड़ी की वास्तविक पैदावार इस बात पर भी निर्भर करेगी कि पहली फसल की कटाई कैसे हुई, खेत में नमी कितनी है, खाली स्थान कितने हैं और कटाई के बाद पोषक तत्व व सिंचाई प्रबंधन कैसा किया गया।

गन्ना किसानों के साथ चीनी मिलों को भी फायदा

नई किस्मों की उपयोगिता केवल किसानों तक सीमित नहीं रहती।किसान को ज्यादा प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है तो एक ही खेत से बेचने योग्य गन्ने की मात्रा बढ़ सकती है। दूसरी ओर, बेहतर चीनी मात्रा वाला गन्ना मिलने पर चीनी मिल की Sugar Recovery Percentage सुधारने में मदद मिलती है।इस तरह अच्छी किस्म किसान और मिल दोनों के हित को जोड़ती है।

यदि प्रदेश में ऐसी किस्मों का संतुलित विस्तार होता है जिनमें अधिक उपज, अच्छी परिपक्वता और बेहतर चीनी परता हो तो लंबे समय में पूरे Sugar Industry को इसका फायदा मिल सकता है।

केवल उपज का आंकड़ा देखकर निर्णय न लें

को.शा.23232 की करीब 95.56 टन, को.लख.21201 की 86.57 टन, को.शा.19235 की 87.58 टन और को.शा.18232 की 92.38 टन प्रति हेक्टेयर औसत परीक्षण उपज निश्चित रूप से ध्यान खींचती है।फिर भी इन आंकड़ों को किसान को गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।अनुसंधान परीक्षण वैज्ञानिक प्रबंधन और तय परिस्थितियों में होते हैं। किसी किसान के खेत में वास्तविक Farm Yield कम या ज्यादा हो सकती है।मिट्टी की उर्वरता, सिंचाई, वर्षा, तापमान, पौधों की संख्या, खाद प्रबंधन, खरपतवार, बीमारी और कटाई के समय का अंतिम उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है।इसलिए बेहतर तरीका यह है कि परीक्षण आंकड़ों को किस्म की क्षमता का संकेत माना जाए और स्थानीय सिफारिशों के आधार पर निर्णय लिया जाए।

उत्तर प्रदेश की गन्ना खेती में बदल सकती है Variety Strategy

नई किस्मों की मंजूरी का सबसे बड़ा प्रभाव आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की Sugarcane Variety Strategy पर दिखाई दे सकता है।किसानों को लंबे समय तक अच्छा उत्पादन तभी मिल सकता है जब खेतों में केवल एक लोकप्रिय किस्म का दबदबा न रहे। अलग-अलग क्षेत्र के लिए वहां की परिस्थितियों के अनुसार कई मजबूत विकल्प होने चाहिए।चार नई किस्मों की मंजूरी इसी दिशा में अवसर देती है।अगेती श्रेणी में को.शा.23232 और को.लख.21201 जैसे विकल्प हैं, जबकि मध्य और देर से पकने वाली श्रेणी में को.शा.19235 और को.शा.18232 जैसे विकल्प उपलब्ध हुए हैं।इससे पेराई सत्र के अलग-अलग हिस्सों में परिपक्व गन्ना उपलब्ध कराने की योजना बेहतर हो सकती है।

आगे किसानों के लिए सबसे जरूरी होगा बीज की उपलब्धता

किसी नई किस्म की स्वीकृति पहला चरण है। असली बदलाव तब दिखाई देता है जब उसका गुणवत्तापूर्ण बीज पर्याप्त मात्रा में किसानों तक पहुंचता है।नई किस्म की शुरुआत में Seed Multiplication में समय लगता है। पहले वैज्ञानिक और बीज उत्पादन केंद्र मूल बीज सामग्री बढ़ाते हैं, फिर चरणबद्ध तरीके से किसानों के लिए उसका क्षेत्र विस्तार होता है।ऐसे में हर किसान को पहले ही साल पर्याप्त मात्रा में नई किस्म का बीज मिल जाए, यह जरूरी नहीं है।

इसलिए किसानों को स्थानीय गन्ना विकास विभाग, सहकारी गन्ना समिति, चीनी मिल या मान्यता प्राप्त बीज केंद्र से जानकारी लेते रहना चाहिए कि उनके क्षेत्र में कौन सी नई किस्म का बीज उपलब्ध है।

चारों किस्मों पर एक नजर

को.शा.23232: अगेती किस्म, औसत परीक्षण उपज लगभग 95.56 टन प्रति हेक्टेयर, अच्छी पेड़ी क्षमता और लाल सड़न रोग के प्रति प्रतिरोध इसकी प्रमुख खूबियों में शामिल हैं।

को.लख.21201: अगेती किस्म, औसत उपज लगभग 86.57 टन प्रति हेक्टेयर और बेहतर Pol in Cane इसका प्रमुख आकर्षण है। लाल सड़न के प्रति बेहतर प्रतिरोध और अच्छी पेड़ी क्षमता की भी जानकारी दी गई है।

को.शा.19235: मध्य एवं देर से पकने वाली किस्म, औसत परीक्षण उपज लगभग 87.58 टन प्रति हेक्टेयर और पेड़ी में लगभग 73.90 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन दर्ज किया गया।

को.शा.18232: मध्य एवं देर से पकने वाली किस्म, औसत परीक्षण उपज लगभग 92.38 टन प्रति हेक्टेयर और पेड़ी उपज लगभग 82.06 टन प्रति हेक्टेयर रही।

गन्ना किसानों के लिए नई उम्मीद

उत्तर प्रदेश में चार नई गन्ना किस्मों की मंजूरी को केवल नई Sugarcane Varieties के जुड़ने के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसका संबंध प्रदेश की गन्ना खेती को अधिक उत्पादक, रोगों के प्रति मजबूत और बेहतर चीनी परता वाली बनाने से है।

को.शा.23232, को.लख.21201, को.शा.19235 और को.शा.18232 के परीक्षण आंकड़े सकारात्मक संकेत देते हैं। कुछ किस्मों ने मानक किस्मों से अधिक उपज दिखाई है, कुछ में बेहतर पोल प्रतिशत दर्ज किया गया है और कई किस्मों की पेड़ी क्षमता भी मजबूत रही है। किसानों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण बात सही किस्म का सही क्षेत्र में चुनाव करना होगा।

नई किस्म देखकर जल्दबाजी में पूरे खेत का बीज बदलने के बजाय स्थानीय गन्ना विशेषज्ञों की सलाह, आधिकारिक सिफारिश और प्रमाणित बीज की उपलब्धता को प्राथमिकता देना बेहतर रहेगा।

यदि स्वस्थ बीज, सही Crop Management, संतुलित पोषण, सिंचाई और रोग प्रबंधन के साथ इन नई किस्मों का विस्तार किया जाता है तो किसानों को प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन पाने का अवसर मिल सकता है। साथ ही अच्छी Sugar Recovery से चीनी मिलों और प्रदेश के पूरे चीनी उद्योग को भी लाभ पहुंच सकता है।

आने वाले कुछ पेराई सत्र यह बताएंगे कि प्रयोग और परीक्षण में अच्छा प्रदर्शन करने वाली ये किस्में किसानों के वास्तविक खेतों में किस हद तक सफल होती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नई किस्मों ने उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को पुराने विकल्पों के साथ कुछ नए और संभावनाशील विकल्प जरूर दे दिए हैं।

 

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