देश इस समय भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। दिल्ली-NCR से लेकर उत्तर भारत, मध्य भारत और कई दक्षिणी राज्यों तक तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने कई राज्यों में 26 मई तक हीटवेव का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। दिन की झुलसा देने वाली गर्म हवाएं और रात में भी कम न होने वाली गर्मी ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षी भी इस तपिश से बेहाल हैं।
लेकिन इस बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा असर अगर किसी पर पड़ रहा है, तो वह है देश का किसान। खेतों में खड़ी फसलें, सूखती मिट्टी, घटता जलस्तर और बढ़ती लागत किसानों की चिंता को लगातार बढ़ा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि अल-नीनो, कमजोर मानसून और खाद संकट मिलकर भारतीय कृषि व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने भी चेतावनी दी है कि इस साल अल-नीनो के प्रभाव और जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे जैसी स्थिति बन सकती है, जिसका सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा। यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई, तो इसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की थाली तक दिखाई देगा।
अल-नीनो और कमजोर मानसून की बढ़ती आशंका
अमेरिका की राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने संकेत दिए हैं कि इस साल मई से जुलाई के बीच अल-नीनो सक्रिय हो सकता है और इसका असर साल के अंत तक बना रह सकता है। अल-नीनो एक ऐसी जलवायु स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ जाता है और इसका प्रभाव दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसका सबसे बड़ा असर मानसून पर देखने को मिलता है।
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है। यदि अगस्त और सितंबर जैसे महत्वपूर्ण महीनों में बारिश कम हुई, तो खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे। धान, मक्का, सोयाबीन और दालों जैसी फसलें सबसे ज्यादा जोखिम में रहेंगी।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसका असर सिर्फ खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रहेगा। यदि अक्टूबर और नवंबर तक अल-नीनो का प्रभाव बना रहा, तो रबी सीजन की तैयारी भी प्रभावित होगी। गेहूं, सरसों और चना जैसी फसलों पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।
बढ़ती गर्मी और खेती पर संकट
भारत में लगातार बढ़ते तापमान ने खेती की पारंपरिक व्यवस्था को चुनौती देना शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से गेहूं की पैदावार लगभग 10 प्रतिशत तक घट सकती है।
हीटवेव के कारण खेतों की मिट्टी तेजी से अपनी नमी खो रही है। भूजल स्तर नीचे जा रहा है और सिंचाई की लागत बढ़ रही है। किसान पहले ही डीजल, बिजली और मजदूरी की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, ऐसे में लगातार बढ़ती गर्मी खेती को और महंगा बना रही है।
गर्मी का असर सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं है। पशुपालन क्षेत्र भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अत्यधिक तापमान के कारण दुधारू पशुओं में तनाव बढ़ता है, जिससे दूध उत्पादन कम हो जाता है। यही वजह है कि विशेषज्ञों को आने वाले महीनों में दूध की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका दिखाई दे रही है।
खाद संकट और बढ़ती लागत
इस बार किसानों के सामने एक और बड़ी चुनौती खाद संकट के रूप में खड़ी हो सकती है। भारत यूरिया, पोटाश और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की सप्लाई प्रभावित हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री व्यापार मार्गों में बाधा आने से खाद की कीमतों में तेजी आई है। सरकार सब्सिडी बढ़ाकर किसानों को राहत देने की कोशिश कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग का खतरा भी बढ़ रहा है।
जब मौसम खराब होता है और किसान फसल बचाने के लिए ज्यादा खाद का इस्तेमाल करने लगते हैं, तब बाजार में कृत्रिम संकट पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ता है। खेती महंगी होने से किसानों की आमदनी घटती है और इसका प्रभाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देता है।
महंगाई और रोजगार पर असर
यदि कमजोर मानसून और गर्मी के कारण फसल उत्पादन घटता है, तो इसका असर बाजार में साफ दिखाई देगा। चावल, दालें, खाद्य तेल और दूध जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि ही रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है। जब फसल कमजोर होती है, तो खेतों में काम कम हो जाता है। धान की रोपाई, कटाई और अन्य कृषि कार्यों में कमी आने से कृषि मजदूरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो सकता है।
देश की लगभग आधी आबादी सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में खेती पर संकट का मतलब सिर्फ किसानों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ना है।
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती हीटवेव और मौसम का असामान्य व्यवहार जलवायु परिवर्तन का संकेत है। शहरों के विस्तार और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
आज जरूरत इस बात की है कि कृषि नीतियों को बदलते मौसम के अनुसार तैयार किया जाए। सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय टिकाऊ खेती को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है।
आंध्र प्रदेश मॉडल से उम्मीद
कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का मानना है कि अब समय आ गया है कि भारत खेती के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनाए। उनका कहना है कि आंध्र प्रदेश का कम्युनिटी मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग मॉडल देश के लिए एक बेहतर उदाहरण बन सकता है।
आंध्र प्रदेश में लाखों किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं और बिना रासायनिक उर्वरकों के खेती करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे खेती की लागत घट रही है और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।
यदि दूसरे राज्य भी इस मॉडल को अपनाते हैं, तो भविष्य में जलवायु परिवर्तन और खाद संकट जैसी चुनौतियों से निपटना आसान हो सकता है।
आगे क्या करना होगा?
भारत के लिए यह समय चेतावनी का है। बढ़ती गर्मी, कमजोर मानसून और खाद संकट जैसे खतरे साफ संकेत दे रहे हैं कि पारंपरिक खेती मॉडल अब दबाव में है। सरकार, वैज्ञानिकों और किसानों को मिलकर ऐसी रणनीति बनानी होगी, जो खेती को मौसम के बदलते स्वरूप के अनुरूप मजबूत बना सके।
जल संरक्षण, प्राकृतिक खेती, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा और कृषि तकनीक का बेहतर उपयोग आने वाले समय की जरूरत बन चुके हैं। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में खाद्यान्न सुरक्षा, महंगाई और ग्रामीण रोजगार जैसी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।


