रबी सीजन की तैयारियों के बीच भारत सरकार ने देश में यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आयात का बड़ा कदम उठाया है। भारतीय पोटाश लिमिटेड (IPL) ने करीब 17 लाख टन यूरिया आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया है। यह टेंडर ऐसे समय में आया है जब देश में रबी फसलों की बुवाई शुरू होने से पहले यूरिया की मांग बढ़ने की उम्मीद है। टेंडर के तहत पश्चिमी तट के लिए 10 लाख टन और पूर्वी तट के लिए 7 लाख टन यूरिया की आपूर्ति मांगी गई है। टेंडर नोटिस 23 सितंबर 2026 को जारी किया गया।
रबी सीजन से पहले क्यों बढ़ी यूरिया की तैयारी
भारत में रबी सीजन के दौरान गेहूं, सरसों, चना, जौ और अन्य फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इनमें गेहूं जैसी फसलों के लिए नाइट्रोजन की आवश्यकता अधिक होती है और किसान यूरिया का प्रमुख नाइट्रोजन उर्वरक के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अक्टूबर से शुरू होने वाले रबी सीजन से पहले राज्यों में यूरिया का पर्याप्त स्टॉक रखना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहता है।
कृषि मंत्रालय और उर्वरक विभाग हर फसल सीजन से पहले राज्यों के साथ मिलकर उर्वरक की संभावित जरूरत का आकलन करते हैं। इसके बाद घरेलू उत्पादन और आयात के माध्यम से उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। सरकार पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि घरेलू उत्पादन और मांग के बीच जो अंतर रहता है, उसे आयात के जरिए पूरा किया जाता है।
17 लाख टन के नए टेंडर को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका उद्देश्य रबी सीजन में किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराना और किसी भी क्षेत्र में आपूर्ति संबंधी दबाव को कम रखना है।
अप्रैल–अगस्त में यूरिया आयात दोगुने से ज्यादा
उर्वरक क्षेत्र के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्त 2026 के दौरान भारत ने करीब 47.5 लाख टन यूरिया आयात किया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में आयात करीब 20.4 लाख टन था। यानी एक साल में आयात दोगुने से भी अधिक हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि इसी अवधि में देश का घरेलू यूरिया उत्पादन भी बढ़ा है। अप्रैल-अगस्त 2026 में घरेलू उत्पादन करीब 125.4 लाख टन रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के लगभग 120.1 लाख टन के मुकाबले करीब 4.4 प्रतिशत अधिक है।
इससे साफ है कि आयात में वृद्धि केवल घरेलू उत्पादन में कमी के कारण नहीं हुई है। सरकार रबी सीजन की संभावित मांग, बफर स्टॉक और अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए पहले से उर्वरक जुटाने की रणनीति अपना रही है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद आयात पर निर्भरता
भारत दुनिया में यूरिया के बड़े उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में पिछले कुछ वर्षों में घरेलू यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके बावजूद कुल मांग को पूरी तरह घरेलू उत्पादन से पूरा करना अभी संभव नहीं है।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में देश में यूरिया की मांग 381.45 लाख टन थी, जबकि उपलब्धता करीब 450.79 लाख टन रही। इस दौरान यूरिया की बिक्री 396.60 लाख टन रही। इससे पता चलता है कि सरकार घरेलू उत्पादन के साथ आयात के जरिए भी पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने पर जोर देती है।
इस व्यवस्था में आयात की भूमिका खास तौर पर उस समय महत्वपूर्ण हो जाती है, जब किसी सीजन में मांग अनुमान से अधिक हो या अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण आपूर्ति में अनिश्चितता पैदा हो।
सरकार पहले से बना रही है स्टॉक
रबी सीजन से पहले आयात का फैसला अचानक लिया गया कदम नहीं है। सरकार पिछले कई महीनों से उर्वरक उपलब्धता को लेकर राज्यों और कंपनियों के साथ समन्वय कर रही है।
जुलाई 2026 में सरकार ने बताया था कि खरीफ 2026 के दौरान 14 जुलाई तक देश में यूरिया की उपलब्धता 157.98 लाख टन थी, जबकि उस अवधि के लिए मांग 102.68 लाख टन आंकी गई थी। इस दौरान यूरिया की खपत 88.04 लाख टन रही।
इस तरह उपलब्धता को मांग से ऊपर रखने की कोशिश की गई थी। अब रबी सीजन की ओर बढ़ते हुए सरकार आयात के जरिए आगे की जरूरत के लिए भी आपूर्ति सुरक्षित करना चाहती है।
वैश्विक बाजार भी महत्वपूर्ण
यूरिया आयात का फैसला केवल घरेलू मांग और उत्पादन पर निर्भर नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय कीमतें, प्राकृतिक गैस की लागत, समुद्री मालभाड़ा, उत्पादन करने वाले देशों की निर्यात नीति और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी आयात की लागत और उपलब्धता को प्रभावित करती हैं।
2026 में पश्चिम एशिया और अन्य क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बना है। यूरिया के साथ-साथ सल्फर जैसे उर्वरक कच्चे माल की उपलब्धता और कीमतों को लेकर भी चिंता बनी हुई है। भारतीय उद्योग के लिए आयातित कच्चे माल और तैयार उर्वरकों की कीमतों में बदलाव महत्वपूर्ण है।
ऐसे माहौल में सरकार के लिए समय पर आयात करना इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों या माल ढुलाई लागत में अचानक बदलाव से बाद में खरीद महंगी पड़ सकती है।
किसानों पर यूरिया कीमत का सीधा असर सीमित
भारत में यूरिया की खुदरा कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित है। किसानों को यूरिया निर्धारित अधिकतम खुदरा मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है और उत्पादन तथा आयात लागत में अंतर को सरकार सब्सिडी व्यवस्था के जरिए वहन करती है।
इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत बढ़ने का सीधा बोझ किसान पर उसी अनुपात में नहीं पड़ता। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का असर सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च पर पड़ सकता है।
इसी वजह से यूरिया की खरीद में कीमत के साथ-साथ उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होती है। सरकार के सामने चुनौती यह रहती है कि किसानों के लिए उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए आयात लागत और सब्सिडी खर्च को भी नियंत्रित रखा जाए।
पहले भी बढ़ा है आयात का इस्तेमाल
भारत ने पिछले वर्षों में भी घरेलू उत्पादन और खपत के बीच अंतर को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया आयात किया है। मार्च 2026 में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच यूरिया का घरेलू उत्पादन 251.26 लाख टन था, जबकि आयात 89.30 लाख टन रहा। इससे एक बार फिर स्पष्ट होता है कि देश की उर्वरक सुरक्षा व्यवस्था में आयात महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने कुल करीब 112 लाख टन यूरिया आयात किया था, जबकि पूरे उर्वरक आयात में यूरिया की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही।
रबी में गेहूं की मांग अहम
रबी सीजन में यूरिया की मांग का बड़ा हिस्सा गेहूं की खेती से आता है। गेहूं की फसल में शुरुआती विकास के बाद पौधों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता बनाए रखने के लिए नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा सरसों, मक्का, जौ और अन्य फसलों में भी किसान यूरिया का इस्तेमाल करते हैं।
इसलिए रबी की बुवाई से पहले यदि राज्यों में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहता है तो किसानों को सीजन के दौरान अचानक होने वाली कमी और आपूर्ति दबाव से बचाया जा सकता है।
सरकार की कोशिश रहती है कि उर्वरक को बंदरगाहों से राज्यों तक और फिर जिला स्तर पर बिक्री केंद्रों तक समय पर पहुंचाया जाए। केवल आयात कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके बाद परिवहन, भंडारण और राज्यवार वितरण भी महत्वपूर्ण है।
आयात बढ़ा, लेकिन उत्पादन भी जारी
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत एक तरफ बड़े पैमाने पर यूरिया आयात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू उत्पादन को भी बढ़ाने की कोशिश जारी है। अप्रैल-अगस्त 2026 में उत्पादन में करीब 4.4 प्रतिशत की वृद्धि इसका संकेत है।
हालांकि अगस्त 2026 में भारत के कुल उर्वरक उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई और उर्वरक क्षेत्र का उत्पादन सालाना आधार पर 12.4 प्रतिशत घटा। इससे यह भी संकेत मिलता है कि घरेलू उत्पादन और आयात दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है
17 लाख टन के नए आयात टेंडर का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य रबी सीजन में किसानों के लिए यूरिया की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। यदि टेंडर के तहत समय पर आपूर्ति होती है और बंदरगाहों से राज्यों तक वितरण सुचारु रहता है, तो रबी के शुरुआती महीनों में यूरिया की उपलब्धता को मजबूत किया जा सकता है।
किसानों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वे अपनी फसल की जरूरत के अनुसार ही यूरिया का इस्तेमाल करें। अत्यधिक नाइट्रोजन उपयोग से लागत बढ़ने के साथ मिट्टी के पोषक संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञ सामान्य तौर पर मिट्टी परीक्षण और फसल की अनुशंसित पोषक जरूरत के आधार पर उर्वरक इस्तेमाल की सलाह देते हैं।
आगे क्या रहेगा सरकार का फोकस
आने वाले महीनों में सरकार के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां रहेंगी—रबी सीजन के लिए पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना, अंतरराष्ट्रीय बाजार से प्रतिस्पर्धी कीमत पर यूरिया खरीदना और देश के विभिन्न राज्यों तक समय पर वितरण सुनिश्चित करना।
सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि उर्वरक की जरूरत का आकलन राज्यों के साथ मिलकर किया जाता है और घरेलू उत्पादन तथा आयात के संयोजन से आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है।
ऐसे में 17 लाख टन का नया टेंडर रबी सीजन से पहले भारत की उर्वरक सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अप्रैल-अगस्त में आयात के तेजी से बढ़ने और घरेलू उत्पादन में भी वृद्धि के बीच सरकार का लक्ष्य स्पष्ट दिखाई देता है—रबी की बुवाई शुरू होने से पहले देश में पर्याप्त यूरिया उपलब्ध रखना और किसानों को सीजन के दौरान आपूर्ति संकट से बचाना।

