2026-27 Super El Nino: भारत के 180 से अधिक पारिस्थितिकी विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की एक सामूहिक अपील ने 2026-27 के बेहद शक्तिशाली अल-नीनो को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले महीनों में असामान्य गर्मी, सूखे और बदलते वर्षा पैटर्न का प्रभाव केवल इंसानों और खेती तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के जंगल, नदियां, झीलें, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, पहाड़, प्रवाल भित्तियां और वन्यजीव भी इसके गंभीर प्रभावों का सामना कर सकते हैं।
16 सितंबर 2026 को प्रकाशित India Ecology Collective की अपील पर 188 लोगों ने हस्ताक्षर किए। इसमें भारतीय वैज्ञानिक समुदाय, सरकारी एजेंसियों और शोध संस्थानों से प्राकृतिक तथा सामाजिक-पर्यावरणीय प्रणालियों की निगरानी तेज करने का आह्वान किया गया है। इसका उद्देश्य केवल आपदा के बाद उसके प्रभावों का अध्ययन करना नहीं, बल्कि घटना के दौरान व्यवस्थित वैज्ञानिक डेटा जुटाना भी है।
इस चिंता को वैश्विक मौसम एजेंसियों के पूर्वानुमान भी गंभीर बनाते हैं। विश्व मौसम संगठन यानी World Meteorological Organization (WMO) के अनुसार, अल-नीनो 2026 के दौरान स्थापित हो चुका है और इसके आने वाले महीनों में बहुत मजबूत होने की आशंका है। WMO ने इसके फरवरी 2027 तक जारी रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत बताई है।
आखिर क्या El Nino है?
अल-नीनो यानी El Niño प्रशांत महासागर से जुड़ी प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएं गर्म सतही पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। लेकिन अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं और मध्य तथा पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है।
समुद्र का तापमान बदलना मामूली घटना जैसा लग सकता है, लेकिन महासागर और वायुमंडल एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। इसलिए प्रशांत महासागर के तापमान में बड़ा बदलाव दुनिया के कई हिस्सों में बारिश, तापमान, हवा और तूफानी गतिविधियों के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। इसी व्यापक प्रणाली को El Niño-Southern Oscillation या ENSO कहा जाता है। इसके तीन मुख्य चरण होते हैं: El Niño, La Niña और ENSO-neutral।
भारत के लिए अल-नीनो विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से कई El Niño वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर रहा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर अल-नीनो वर्ष में भारत में सूखा निश्चित रूप से पड़ेगा। भारतीय मानसून पर Indian Ocean Dipole (IOD), Madden-Julian Oscillation, हिमालयी स्थितियों और भारतीय महासागर के तापमान जैसे कई अन्य कारक भी असर डालते हैं। भारत सरकार ने भी अगस्त 2026 में संसद में इसी बात पर जोर दिया था।
2026-27 का अल-नीनो इतना चर्चा में क्यों है?
इस बार चिंता केवल अल-नीनो बनने की नहीं बल्कि इसकी संभावित तीव्रता की है। NOAA के Climate Prediction Center ने 10 सितंबर 2026 को बताया कि El Niño लगातार मजबूत हो रहा है और उत्तरी गोलार्ध की 2026-27 की शरद तथा सर्दियों के दौरान इसके very strong El Niño बनने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक है। अगस्त 2026 में Niño-3.4 क्षेत्र का समुद्री सतह तापमान विचलन लगभग +1.8°C तक पहुंच चुका था। WMO ने भी सितंबर 2026 में कहा कि यह घटना आने वाले महीनों में और तेज हो सकती है और इससे दुनियाभर में वर्षा एवं तापमान के पैटर्न में बड़े बदलाव हो सकते हैं।
NOAA के आधिकारिक आकलन में अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान इस घटना के ऐतिहासिक रूप से अत्यंत मजबूत स्तर तक पहुंचने की संभावना भी जताई गई है। हालांकि वैज्ञानिक पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित होते हैं और किसी विशेष क्षेत्र में वास्तविक प्रभाव की तीव्रता पहले से पूरी निश्चितता के साथ तय नहीं की जा सकती। इसी वजह से 2026-27 El Niño impact on India अब मौसम विज्ञान के साथ-साथ पारिस्थितिकी, कृषि, जल संसाधन और आपदा प्रबंधन से जुड़ा बड़ा विषय बन गया है।
क्या इसे सच में ‘Super El Niño’ कहा जा सकता है?
मीडिया और कुछ वैज्ञानिक चर्चाओं में 2026-27 के संभावित अत्यंत शक्तिशाली El Niño के लिए Super El Nino शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह कोई सार्वभौमिक आधिकारिक मौसम वैज्ञानिक श्रेणी नहीं है। भारत सरकार और IMD की आधिकारिक वर्गीकरण व्यवस्था में El Niño घटनाओं को उनकी तीव्रता के आधार पर weak, moderate, strong और very strong जैसे शब्दों से वर्णित किया जाता है। इसलिए “Super El Niño” को वैज्ञानिक रूप से स्थापित औपचारिक श्रेणी मानने के बजाय बेहद शक्तिशाली El Niño को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द मानना ज्यादा उचित होगा। इसके बावजूद मौजूदा संकेतों को हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां वास्तव में very strong El Niño की संभावना जता रही हैं।

188 वैज्ञानिकों ने क्यों जताई चिंता?
India Ecology Collective द्वारा प्रकाशित अपील का प्रमुख उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तैयारी बढ़ाना है। अपील में कहा गया है कि 2026/27 El Niño भारत के marine, freshwater और terrestrial ecosystems यानी समुद्री, मीठे पानी और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए असाधारण परिस्थितियां पैदा कर सकता है। वैज्ञानिक चाहते हैं कि शोधकर्ता अभी से अपने पुराने अध्ययन क्षेत्रों में वापस जाएं, जंगलों और जल स्रोतों की निगरानी बढ़ाएं, वन्यजीव आबादी में बदलाव दर्ज करें और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले परिवर्तन को व्यवस्थित तरीके से रिकॉर्ड करें। इस सामूहिक अपील पर 188 लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं।
इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि अत्यधिक मौसम घटनाओं के दौरान जुटाया गया वास्तविक डेटा आने वाले दशकों में यह समझने में मदद कर सकता है कि जलवायु परिवर्तन और ENSO जैसी प्राकृतिक जलवायु प्रक्रियाएं मिलकर भारत के पर्यावरण को किस प्रकार बदल रही हैं।
भारतीय मानसून पर क्या असर पड़ सकता है?
Super El Niño effects on Indian monsoon सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक है।
https://fasalkranti.in/अल-नीनो और कमजोर भारतीय मानसून के बीच ऐतिहासिक संबंध है। प्रशांत महासागर में असामान्य गर्मी बड़े पैमाने की वायुमंडलीय परिसंचरण प्रणाली को बदल सकती है, जिससे भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाओं पर असर पड़ता है। 2026 का मानसून पहले ही कई क्षेत्रों में कमजोर रहा है। सितंबर के मध्य तक देश के कई हिस्सों में वर्षा की कमी दर्ज की गई थी।
यदि आने वाले महीनों में गर्म और शुष्क परिस्थितियां बनी रहती हैं तो इसका असर केवल बारिश की कुल मात्रा पर नहीं बल्कि मिट्टी की नमी, जलाशयों, भूजल पुनर्भरण और रबी की खेती पर भी पड़ सकता है।
हालांकि अल-नीनो को अकेले मानसून का भविष्य तय करने वाला कारक मानना गलत होगा। Positive Indian Ocean Dipole कई बार El Niño के नकारात्मक मानसूनी प्रभाव को कुछ हद तक बदल सकता है। इस बार भी वैज्ञानिक प्रशांत और हिंद महासागर में एक साथ बदलती परिस्थितियों पर नजर रख रहे हैं।
जंगलों में बढ़ सकता है आग का खतरा
El Niño impact on Indian forests and wildlife वैज्ञानिकों की बड़ी चिंताओं में शामिल है। लंबे समय तक बारिश कम रहने और तापमान बढ़ने से मिट्टी, सूखे पत्ते, घास तथा जंगल की अन्य वनस्पतियां तेजी से नमी खो सकती हैं। ऐसे में जंगलों में आग फैलने की संभावना बढ़ सकती है।
भारत के कई जंगल पहले ही मानवीय गतिविधियों, अतिक्रमण, बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा चक्र के दबाव में हैं। यदि मजबूत El Niño लंबे शुष्क दौर को बढ़ाता है तो वनस्पतियों के लिए तनाव ज्यादा गंभीर हो सकता है।
आग केवल पेड़ों को नष्ट नहीं करती। इससे कीट, पक्षी, छोटे स्तनधारी और मिट्टी के भीतर रहने वाले जीव भी प्रभावित होते हैं। बड़े पैमाने की वनाग्नि जंगल की मिट्टी की संरचना तथा पानी रोकने की क्षमता भी बदल सकती है। इसलिए वैज्ञानिक केवल forest fire की संख्या रिकॉर्ड करने के बजाय यह समझना चाहते हैं कि लंबे समय में पूरा ecosystem किस प्रकार प्रतिक्रिया करता है।
वन्यजीवों के सामने भोजन और पानी की चुनौती
जंगलों में जल स्रोत सूखने या वनस्पति कम होने का सीधा असर वन्यजीवों पर पड़ सकता है।हाथी, हिरण, गौर और कई दूसरे वन्यजीव पानी और भोजन के लिए बड़े क्षेत्र में घूमने लग सकते हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में इंसानों और वन्यजीवों का आमना-सामना बढ़ने की संभावना रहती है।
छोटे जीवों के लिए समस्या अलग हो सकती है। Amphibians यानी उभयचर जीवों की कई प्रजातियों का जीवन चक्र मानसूनी बारिश से जुड़ा होता है। असामान्य वर्षा उनके breeding season को प्रभावित कर सकती है। पक्षियों की migration, nesting और food availability भी तापमान तथा बारिश के बदलाव के प्रति संवेदनशील होती है।इसलिए El Niño impact on wildlife in India का वास्तविक प्रभाव केवल किसी एक वर्ष की मृत्यु दर से नहीं बल्कि प्रजनन, प्रवास और आबादी के लंबे समय के बदलाव से समझना होगा।
नदियों और मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट
El Niño से संबंधित शुष्क परिस्थितियां नदियों और झीलों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।कम बारिश होने से छोटी नदियों का प्रवाह घट सकता है। तालाब, wetlands और seasonal streams जल्दी सूख सकती हैं। इससे मछलियों, कछुओं, उभयचरों और पानी पर निर्भर पक्षियों के लिए उपलब्ध habitat कम हो सकता है।
El Niño effect on rivers in India का सामाजिक प्रभाव भी बड़ा है क्योंकि भारत की नदियां केवल ecosystems नहीं हैं। करोड़ों लोगों की खेती, पेयजल, उद्योग और आजीविका इन पर निर्भर करती है। कम प्रवाह का एक दूसरा परिणाम पानी की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। जब नदी में पानी कम होता है तो उसमें मौजूद प्रदूषकों के घुलने की क्षमता भी कम हो सकती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में pollution concentration बढ़ सकती है।
हिमालय भी हो सकता है प्रभावित
हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति पहले से संवेदनशील माना जाता है। मजबूत El Niño के दौरान तापमान और precipitation pattern में बदलाव ऊंचाई वाले ecosystems को अतिरिक्त दबाव में डाल सकता है। बर्फबारी का समय और मात्रा बदलने से alpine vegetation प्रभावित हो सकती है। इसका असर उन जीवों तक जा सकता है जो सीमित ऊंचाई वाले habitats पर निर्भर हैं हिमालय भारत की कई बड़ी नदियों का स्रोत भी है। इसलिए वहां होने वाला तापमान और बर्फबारी का बदलाव दूर मैदानी क्षेत्रों की जल व्यवस्था से भी जुड़ा है।
लेकिन हिमालय पर किसी विशेष El Niño के प्रभावों का पूर्वानुमान बेहद जटिल है। स्थानीय स्थलाकृति, पश्चिमी विक्षोभ और अन्य atmospheric systems इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसलिए वैज्ञानिक लगातार monitoring को महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
समुद्र और Coral Reefs पर बड़ा खतरा
अल-नीनो का संबंध समुद्र के तापमान से शुरू होता है, इसलिए समुद्री ecosystem इसके सबसे प्रत्यक्ष प्रभावों में शामिल होते हैं।समुद्री तापमान अत्यधिक बढ़ने पर coral bleaching की घटनाएं हो सकती हैं। Coral यानी प्रवाल छोटे जीव होते हैं जिनका microscopic algae के साथ सहजीवी संबंध होता है। ज्यादा तापमान के तनाव में ये algae coral से अलग हो सकते हैं, जिससे प्रवाल सफेद दिखाई देने लगते हैं। यदि गर्मी का तनाव लंबे समय तक बना रहे तो coral की मृत्यु तक हो सकती है।
भारत में अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, मन्नार की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण coral ecosystems मौजूद हैं। वैज्ञानिकों की अपील में भी बड़े पैमाने पर coral bleaching और marine ecosystems के नुकसान को संभावित चिंताओं में शामिल किया गया है।
Coral reefs केवल सुंदर प्राकृतिक संरचनाएं नहीं हैं। वे अनेक समुद्री जीवों को habitat देते हैं, fisheries को सहारा देते हैं और तटीय इलाकों को समुद्री लहरों से कुछ हद तक प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। इसीलिए El Niño impact on Indian Ocean ecosystems का असर मछुआरों और तटीय समुदायों तक पहुंच सकता है।
खेती पर क्या असर हो सकता है?
भारत में मौसम और कृषि के बीच सीधा संबंध है। इसलिए El Niño impact on Indian agriculture आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। कम मानसूनी बारिश से खरीफ फसल प्रभावित हो सकती है। वहीं मानसून के बाद मिट्टी में पर्याप्त नमी न होने पर गेहूं, सरसों और चना जैसी रबी फसलों की बुवाई तथा उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।
सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार देश के बड़े हिस्से में सूखे जैसी परिस्थितियां कृषि के लिए पहले ही चिंता पैदा कर रही थीं। यदि उत्पादन घटता है तो इसके प्रभाव खेत से आगे बाजार तक पहुंच सकते हैं। खाद्यान्न, सब्जियां, दाल और पशुचारे की उपलब्धता प्रभावित होने पर कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि सिंचाई, जलाशयों में पानी, स्थानीय वर्षा और सरकारी नीतियों के कारण अलग-अलग राज्यों में प्रभाव काफी अलग हो सकता है।
Extreme Heat का खतरा क्यों बढ़ता है?
अल-नीनो वर्षों के दौरान वैश्विक औसत तापमान अक्सर बढ़ा हुआ दिखाई देता है क्योंकि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर वातावरण को अतिरिक्त गर्मी देता है।इस बार चिंता इसलिए अधिक है क्योंकि प्राकृतिक El Niño ऐसे समय पर हो रहा है जब मानव-जनित climate change के कारण पृथ्वी का baseline temperature पहले ही ऊंचा है।WMO के सितंबर 2026 के outlook में दुनिया के लगभग सभी भूभागों पर सामान्य से अधिक तापमान की संभावना बढ़ी हुई बताई गई है।भारत में इसका अर्थ अधिक गर्म दिन, गर्म रातें और कुछ क्षेत्रों में लंबी heatwave जैसी परिस्थितियों का बढ़ा जोखिम हो सकता है।
लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि किसी पूरे मौसम या शहर के वास्तविक तापमान को केवल El Niño से निर्धारित नहीं किया जा सकता। स्थानीय मौसम प्रणालियां और क्षेत्रीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
El Niño और Climate Change में क्या संबंध है?
El Niño प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसे climate change पैदा नहीं करता। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि गर्म होती दुनिया में El Niño के प्रभाव कैसे बदल रहे हैं। पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ने के साथ extreme heat events के लिए शुरुआती आधार पहले से गर्म होता जा रहा है। महासागरों में भी असामान्य गर्मी दर्ज की जा रही है।
ऐसे में प्राकृतिक climate variability और human-caused global warming एक ही समय में काम कर सकते हैं। इसी कारण climate change and El Niño in India भविष्य के climate research का अहम विषय है। हर extreme weather event को सीधे El Niño या climate change से जोड़ देना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। किसी विशिष्ट घटना के कारणों को समझने के लिए attribution studies और विस्तृत डेटा की जरूरत होती है।
वैज्ञानिक अभी से Monitoring क्यों चाहते हैं?
वैज्ञानिकों की हालिया अपील का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। किसी बड़ी जलवायु घटना के गुजर जाने के बाद उसके प्रभावों को यादों या अधूरे रिकॉर्ड के आधार पर समझना मुश्किल हो जाता है। यदि 2026-27 वास्तव में अत्यंत शक्तिशाली El Niño बनता है तो वैज्ञानिकों के पास दुर्लभ अवसर होगा कि वे घटना के पहले, दौरान और बाद में ecological changes का व्यवस्थित अध्ययन करें।
इसमें पेड़ों की मृत्यु दर, जंगल की आग, flowering और fruiting cycles, नदी प्रवाह, wetland levels, coral bleaching, fish populations, वन्यजीव behavior और स्थानीय समुदायों की आजीविका जैसे संकेतकों की निगरानी शामिल हो सकती है।India Ecology Collective ने इसी उद्देश्य से research और monitoring networks को मजबूत करने की अपील की है।
भारत को किन क्षेत्रों में तैयारी बढ़ानी होगी?
Strong El Niño का मुकाबला किसी एक मंत्रालय या विभाग के जरिए नहीं किया जा सकता।मौसम विभाग और वैज्ञानिक एजेंसियों को high-resolution forecasts और early warnings मजबूत करने होंगे। कृषि विभागों को कम बारिश वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए crop advisories तेजी से उपलब्ध करानी होंगी।जल प्रबंधन एजेंसियों को reservoir levels, groundwater और drinking-water demand पर लगातार निगरानी रखनी होगी। Forest departments को fire alerts और vulnerable forest zones पर विशेष नजर रखनी पड़ सकती है। Coastal और marine research institutions को coral reefs, fisheries और sea surface temperature की monitoring बढ़ानी होगी।इसके साथ राज्यों और केंद्र के बीच real-time climate data sharing भी महत्वपूर्ण होगा। तैयारी का उद्देश्य यह मान लेना नहीं है कि हर सबसे खराब संभावना निश्चित रूप से सच होगी। इसका उद्देश्य यह है कि यदि extreme conditions विकसित होती हैं तो प्रशासन और समुदाय बिना तैयारी के न रहें।
क्या आम लोगों को घबराने की जरूरत है?
नहीं। मजबूत El Niño की चेतावनी को घबराहट के बजाय preparedness के संकेत के रूप में देखना चाहिए।Seasonal climate forecast यह नहीं बताता कि किसी शहर में किसी खास तारीख को क्या होगा। यह बड़े क्षेत्र और लंबे समय के लिए किसी परिस्थिति की संभावना बताता है।उदाहरण के लिए “भारत में सामान्य से अधिक गर्मी की संभावना” का मतलब यह नहीं है कि देश का हर शहर हर दिन रिकॉर्ड तापमान देखेगा।ठीक इसी तरह मजबूत El Niño का मतलब पूरे भारत में निश्चित सूखा नहीं है।
इसके बावजूद यदि वैज्ञानिक संस्थाएं कई महीने पहले खतरे की ओर इशारा कर रही हैं तो जल संरक्षण, खेती की तैयारी, forest-fire management और ecosystem monitoring जैसे कदम पहले से शुरू करना ज्यादा समझदारी है।
आने वाले महीनों पर दुनिया की नजर
सितंबर 2026 की स्थिति में वैज्ञानिक संकेत साफ हैं कि प्रशांत महासागर में El Niño मजबूत हो रहा है।NOAA के मुताबिक 2026-27 की उत्तरी गोलार्ध की शरद और सर्दियों में इसके very strong स्तर तक पहुंचने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक है। WMO के अनुसार इसके फरवरी 2027 तक जारी रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है।इतनी शक्तिशाली घटना भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधन और biodiversity का बड़ा हिस्सा मौसम पर निर्भर है।इसके प्रभाव भी एक जैसे नहीं होंगे। कहीं सूखा गंभीर हो सकता है, कहीं तापमान बड़ी चुनौती बनेगा और कहीं स्थानीय atmospheric conditions अलग परिणाम पैदा कर सकती हैं।इसीलिए आने वाले महीनों में IMD, INCOIS, WMO और NOAA के अपडेट महत्वपूर्ण होंगे।
निष्कर्ष: 2026-27 का अल-नीनो भारत के लिए बड़ी पर्यावरणीय परीक्षा
2026-27 Super El Niño in India को लेकर सामने आ रही चेतावनियों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि इस घटना को केवल बारिश कम होने या तापमान बढ़ने तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।इसके संभावित प्रभाव जंगलों से समुद्र तक और खेतों से शहरों तक फैल सकते हैं। भारत के 188 पारिस्थितिकी विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की अपील इस बात पर जोर देती है कि ऐसी घटना को केवल संकट की तरह नहीं, बल्कि प्रकृति में होने वाले बदलावों को बेहतर तरीके से समझने के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। इसके लिए समय रहते monitoring, research और documentation शुरू करना जरूरी है।
मौजूदा अंतरराष्ट्रीय पूर्वानुमान एक अत्यंत मजबूत El Niño की ओर संकेत कर रहे हैं, लेकिन उसके हर स्थानीय प्रभाव की सटीक भविष्यवाणी अभी संभव नहीं है।इसलिए सबसे सही रास्ता दो अतियों के बीच है। न तो खतरे को नजरअंदाज किया जाए और न ही हर संभावित प्रभाव को निश्चित आपदा मान लिया जाए।
जलवायु विज्ञान संभावनाओं की चेतावनी दे रहा है। अब चुनौती है कि भारत अपने जंगलों, नदियों, समुद्रों, खेती, वन्यजीवों और लोगों को बदलती जलवायु के प्रति ज्यादा resilient बनाने के लिए इन चेतावनियों का इस्तेमाल कितनी प्रभावी तरीके से करता है।

